
धीरेन्द्र शुक्ला/चित्रकूट. भगवान राम 14 वर्ष के वनवास काल में साढ़े 11 वर्ष चित्रकूट में रहे थे. महंत दिव्य जीवनदास महाराज बताते हैं कि भगवान राम, सीता और लक्ष्मण वनवास के समय वन में फलों, कंदमूलों को खाकर अपनी भूख मिटाते थे. कंदमूल और बेर चित्रकूट के जंगलों में आज भी पाए जाते हैं. चित्रकूट आने वाले पर्यटकों को आज भी यह कंदमूल खाने को मिल जाता है.
कंदमूल और बेर के फायदे
महंत दिव्य जीवनदास जी का मनाना है कि बेर स्वाद में खट्टे मीठे और पोषण से भरपूर होते हैं. इसे स्वाद से ज्यादा स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद माना जाता है. इस बात का जिक्र कई वैज्ञानिक अध्ययनों में हो चुका है. कंदमूल को कई जगहों पर रामफल भी कहा जाता है. कंदमूल एक जंगली फल है. इस पेड़ को लोग अपने खेतों में नहीं लगाते हैं, पर कहीं कहीं इसका पेड़ अपने आप ही उग जाता है. यह फल चित्रकूट के जंगलों में आज भी पाया जाता है. कंदमूल विटामिन सी, कैल्शियम, आयरन, से भरपूर होता है. साथ ही इससे जोड़ों में दर्द और गठिया जैसी बीमारी से छुटकारा मिलता है. इसके अलावा कंदमूल को सर्दी-जुखाम में खाया जा सकता है.
कंदमूल खाने से मिलती है मन को शांति
जीवनदास जी बताते हैं कि प्रभु राम ने जिन फलों को खाया है. उनकी मान्यता आज भी लोग मानते हैं. चित्रकूट में जो भी भक्त सच्चे मन से आते हैं वो कंदमूल और राम घाट के पास बेर जरूर खाते हैं, क्योंकि प्रभु राम का सबसे महत्वपूर्ण फल यही माना जाता है, इसीलिए चित्रकूट में इन फलों का महत्व आज भी देखा जा सकता है. चित्रकूट के परिक्रमा मार्ग में आज भी कंदमूल के फल देखे जाते हैं. चित्रकूट के संतों का मानना है कि इसे खाने के बाद आपके मन को शांति मिलती है.
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FIRST PUBLISHED : May 18, 2023, 17:26 IST








