परिवार न्यायालय में नहीं है कोई फर्नीचर
मुकदमे की पैरवी के लिए आई महिलाएं ज़मीन पर बैठ करती है अपनी पुकार का इंतजार
अधिवक्ताओं के बैठने के लिए न्यायालय कक्ष में नहीं है कोई कुर्सी
हरिणांक द्विवेदी/विधि संवाददाता।
परिवार न्यायालय की स्थापना हुए एक दशक बीत चुके हैं। इसके बाद भी अब तक न्यायालय कक्ष व उसके बाहर अधिवक्ताओं और वादकारियों के बैठने के लिए कोई भी इंतजाम नहीं है। इसके चलते अधिवक्ताओं को खड़े रह कर अपने मुकदमे का इंतजार करना पड़ता है। वहीं दूसरी ओर वादकारी महिलाओं और पुरुषों को कोर्टरूम के बाहर बरामदे में जमीन पर बैठकर अपनी पुकार का इंतजार करना पड़ रहा है। चिलचिलाती गर्मी में जमीन पर बैठे वादकारी दोपहर के वक्त बिलबिला उठते हैं।
जिले में सर्व प्रथम परिवार न्यायालय की स्थापना बर्ष २०१३ में हुई थी। उच्च न्यायालय ने परिवार न्यायालय के स्थापना की अधिसूचना जारी करके परमानंद शुक्ल को प्रधान न्यायाधीश नियुक्त किया था। शुरुआत के दिनों इस कोर्ट को जनपद न्यायालय भवन के एक कोर्टरूम में शिफ्ट किया गया था। कालांतर में ब्लाक परिसर में बनी पुरानी सीजेएम कोर्ट वाली विल्डिंग में परिवार न्यायालय स्थानांतरित कर दी गई। वर्तमान में इसी पुराने भवन में परिवार न्यायालय संचालित हो रहा है। इस भवन में एक कोर्टरूम के अलावा एक रिटायरिंग रूम, एक स्टेनो रूम तथा एक कमरा कार्यालय के लिए है।
जिसमें सिविल और क्रिमिनल केस की सभी पत्रावलियां रखी जाती है, और इसी में न्यायालय के सभी कर्मचारी बैठते हैं। परिवार न्यायालय में मुकदमे की अधिकता होने के कारण प्रतिदिन वादकारियों की भीड़ लगी रहती है। बैठने की व्यवस्था नहीं होने से बहुत परेशानी हो रही है।








