
सच्चिदानन्द/पटना. आज भले ही बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र शास्त्री की हनुमंत कथा के कारण तरेत पाली मठ देशभर में चर्चा में आया हो, लेकिन इस मठ का इतिहास बहुत पुराना है. 400 साल प्राचीन यह मठ अपने आप में इतिहास को संजोय हुए है. गरीब और अनाथ बच्चों के लिए यह मठ स्वर्ग से कम नहीं है. जो गरीब बच्चे हैं, जिनके माता-पिता बच्चे को पढ़ाने में सक्षम नहीं हैं, उन्हें इस मठ में रख कर पढ़ाया जा सकता है. यहां कोई भी शुल्क उनसे नहीं लिया जाता है. यह सिलसिला दशकों से चला आ रहा है. इसके आलावा 50 से भी ज्यादा गायों और भैंसों की सेवा की जाती है. बच्चों के छात्रावास, तालाब, यज्ञशाला समेत कई खासियतों से यह मठ अपनी मौजूदगी दर्ज करवाता रहा है.
सनातन संस्कृति में आचार, विचार और व्यवहार का सर्वोच्च स्थान है. राजधानी से सटे नौबतपुर का तरेत पाली मठ इस संस्कृति को आगे बढ़ा रहा है. मठ के वर्तमान मठाधीश स्वामी सुदर्शनाचार्य जी महाराज के अनुसार यह मठ 400 साल पुराना है. नींव के समय यह इलाका परेत पाली यानी प्रेत पाली के नाम से जाना जाता था. इलाका एकदम घनघोर जंगल से घिरा हुआ था. यहां दूर-दूर तक कोई आबादी नहीं थी. धीरे-धीरे इसका नाम तरेत पाली हो गया. इस मंदिर में भगवान श्री राम, मां जानकी और लक्ष्मण के साथ बजरंगबली की मूर्ति विराजमान है. इस मठ में 100 के करीब विधार्थी शिक्षा ग्रहण करते हैं. साथ ही 50 से ज्यादा गायों की भी सेवा होती है. इसके आलावा तालाब और मठ परिसर में बत्तख भी देखने को मिल जाते हैं, जो आम लोगों की तरह मंदिर में विचरते रहते हैं.
इस मठ का मुख्य कार्य जरूरतमंदों को मुफ्त शिक्षा प्रदान करना है. यहां गुरुकुल है, जिसमें हर आयु वर्ग के विद्यार्थियों को शिक्षा दी जाती है. यह सारी शिक्षा संस्कृत में होती है. यहां शिक्षा ग्रहण करने वाला छोटे से छोटा बच्चा भी धाराप्रवाह संस्कृत बोलता है. साथ ही स्कूल, कॉलेज भी मठ का ही है, जहां निःशुल्क पढ़ाई होती है. इसके आलावा अगर कोई बच्चा बीमार पड़ जाता है, तो उसकी इलाज का खर्च मंदिर ही उठाता है. चाहे जितनी भी संख्या में लोग इस मठ में आ जाएं, उनके मुफ्त में रहने और खाने की व्यवस्था मठ की तरफ से की जाती है.
मठ में प्रत्येक दिन सुबह 8:00 बजे से लेकर दिन में 12:00 बजे तक मुफ्त चिकित्सा सुविधा भी आयुर्वेदिक पद्धति से दी जाती है. इलाज के लिए हर रोज लोग आते हैं. उसमें अगर कोई दूर से आता है, तो उसके रहने की भी व्यवस्था मठ की तरफ से की जाती है, जो निःशुल्क होती है. हजारों की संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं. जानवरों के लिए भी यह मठ किसी स्वर्ग से कम नहीं है.
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FIRST PUBLISHED : May 15, 2023, 11:38 IST









