हर किसी की चाहत थी ये कार, अब कबाड़ में भी नहीं बिक रही, 60 साल में अर्श से फर्श पर पहुंची कंपनी

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हाइलाइट्स

1958 में पहली बार लाॅन्च हुई थी एंबेसडर.
2014 में आखिरी बार हुआ उत्पादन.
2017 में फ्रेंच कंपनी को बिक गई एंबेसडर.

नई दिल्ली. भारतीय बाजार में हिंदुस्तान एंबेसडर (Hindustan Ambassador) ने जो प्यार और रुतबा हासिल किया वो शायद ही किसी और कार ने किया होगा। यही वजह है कि आज भी इस कार का नाम लेते हुए लोगों के चहरे पर मुस्कान आ जाती है. लेकिन 60 सालों तक सड़कों पर राज करने वाली ये कार ब्रांड अब अपनी पहचान खो चुकी है.

एंबेसडर को 1958 में पहली बार भारत में लाया गया था और 2014 में बंद होने से पहले इसने 56 साल का लंबा सफर तय किया है. हालांकि, समय की मांग के अनुसार नहीं बदलने के वजह से आज कंपनी पूरी तरह बंद हो चुकी है. आज कुछ गिने चुने शहरों में एंबेसडर के तौर पर किया जा रहा है. वहीं इसकी डिमांड इतनी कम हो चुकी है कि इसे कबाड़ी वाले भी खरीदने से कतराते हैं.

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भारत में एंबेसडर शुरूआत
एंबेसडर को बनाने वाले कंपनी हिंदुस्तान मोटर्स की शुरूआत तब हुई थी जब देश गुलाम था. 1942 में ब्रिज मोहन बिड़ला ने पश्चिम बंगाल के कोलकाता शहर में हिंदुस्तान मोटर्स की स्थापना की थी. 1954 में कंपनी ने भारत में कारों को बनाने के लिए ब्रिटेन की कंपनी मॉरिस मोटर्स से साझेदारी की. एंबेसडर मॉरिस ऑक्सफोर्ड सीरीज 3 मॉडल पर आधारित थी, जिसे पहली बार 1956 से 1959 तक यूनाइटेड किंगडम के काउली, ऑक्सफोर्ड में मॉरिस मोटर्स लिमिटेड द्वारा बनाया गया था. भारत में एंबेसडर की पहली मॉडल एंबेसडर लैंडमास्टर थी जो कुछ साल में ही देश की पसंदीदा कार बन गई थी.

‘लाल बत्ती’ के नाम से थी फेमस
हिंदुस्तान एंबेसडर सरकारी अधिकारियों और अफसरों की आधिकारिक गाड़ी हुआ करती थी. इन गाड़ियों का रंग सफेद होता था और बड़े अधिकारियों की आधिकारिक वाहन होने के वजह से इसमें लाल बत्ती का इस्तेमाल किया जाता था. इस वजह से इसे ‘लाल बत्ती’ वाली गाड़ी भी कहा जाने लगा था. 1980 आते-आते यह कार आम लोगों के बीच भी काफी लोकप्रिय हो गई थी. फिल्मी सितारों समेत कई मशहूर हस्तियों के पास एंबेसडर के होने के वजह से यह और भी लोकप्रिय हो गई थी. भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी ने भी अपने कार्यकाल में एंबेसडर की सवारी की थी.

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यूं शुरू हुए एंबेसडर के बुरे दिन
बात दें कि 1980 के दशक के अंत में भारतीय बाजार में मारुति सुजुकी और फिएट के आने से एंबेसडर की मुश्किलें बढ़ने लगी थी. हालांकि, एंबेसडर के लिए सबसे बड़ी चुनौती मारुति सुजुकी थी, जिसकी गाड़ियां बेहतर डिजाइन और मॉडर्न फीचर्स से लैस होने के साथ ज्यादा माइलेज भी देती थी. 10 साल बाद आर्थिक सुधार करते हुए भारत के दरवाजे बाहर की कार कंपनियों के लिए खोल दिए गए, जिसके बाद कई मॉडर्न कारें सड़कों पर उतरने लगीं। इससे पुराने तौर तरीकों पर चल रही एंबेसडर की चमक फीकी पड़ने लगी.

हालांकि, इस दौरान कंपनी एंबेसडर के कई नए मॉडलों को लॉन्च कर रही थी. लेकिन ज्यादातर मॉडलों के डिजाइन एक दूसरे से मिलते जुलते थे और सभी मॉडलों को लगभग एक जैसे ही फीचर्स और इंजन के साथ उतारा जा रहा था. एंबेसडर की कुछ पॉपुलर मॉडल्स की बात करें तो इनमें एंबेसडर की पहली मॉडल लैंडमास्टर के साथ एंबेसडर एमके1, एंबेसडर एमके2, एंबेसडर एमके3, एंबेसडर नोवा, एंबेसडर क्लासिक और एंबेसडर ग्रैंड जैसी कारें शामिल थी. एंबेसडर की सबसे आखिरी मॉडल एंबेसडर एनकोर थी जैसे 2013-2014 में बनाया गया था.

विदेशी कंपनी को बिक गई एंबेसडर
लगातार घट रही बिक्री और वित्तीय घाटे के वजह से कंपनी ने आखिरकार 24 मई 2014 को एंबेसडर का प्रोडक्शन लाइन बंद कर दिया। साल 2017 में फ्रेंच कार निर्माता पीएसए ग्रुप ने सी.के. बिड़ला समूह से हिंदुस्तान एंबेसडर का मालिकाना अधिकार 80 करोड़ रुपये में खरीद लिया। खबरें यह भी हैं कि नए ओनरशिप के तहत पीएसए ग्रुप बहुत जल्द एंबेसडर ब्रांड के तहत नई कार का खुलासा कर सकती है.

Tags: Ambassador, Auto News, Car, Passenger Vehicles

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Up Head Line
Author: Up Head Line

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