संत सल्वातोर चर्च की बुर्जी पर टंगा बैनर हवा में हिलता है— ‘पुतिन, यूक्रेन छोड़ दो.’ ओल्ड टाउन हॉल के एक बार में आर्सेनल और चेल्सी का मैच देर रात देखते क्राएमिया के युवक आपको अपने पलायन के भावुक किस्से सुनाते हैं. म्युनिसिपल लाइब्रेरी में पढ़ती एक चेक लड़की को 1968 के सोवियत आक्रमण के किस्से जुबानी याद हैं, मानो ये किस्से शीत युद्ध ख़त्म होने के कई बरस बाद जन्मी इस लड़की के परिवार की दैनिक कथाओं का हिस्सा हों.
इन सबसे बढ़कर, किसी सुबह आप व्लतावा नदी के किनारे रेस्तरां में कॉफ़ी पी रहे हैं, मेज पर नोटबुक और रिकॉर्डर रखे हैं कि एक वेटर हौले से आकर आपको अपना विजिटिंग कार्ड देता है— ‘आप रूस पर लिख रहे हैं? मैं आपको काफ़ी कुछ बता सकता हूँ. आज शाम छह बजे मिलेंगे?’
कार्ड पर लिखा है—अलेक्सान्दर ज़ोलोतारेव, कोर्डिनेटिंग काउंसिल ऑफ़ कोस्सैक नेशनल अवां-गार्द मूवमेंट. कोस्सैक रूस में रहता एक समुदाय है, रूस से स्वतंत्रता की मांग कर रहा है. यह काउंसिल उन तमाम संस्थाओं में से है जो ‘रूस के विघटन के बाद स्वतंत्र हुए राष्ट्रों’ को एकत्र कर रही हैं. इनके नक्शों में वर्तमान रूस ‘राष्ट्रों का बंदीगृह’ है, इसलिए इसे इकतालीस स्वतंत्र राष्ट्रों में बंट जाना चाहिये. ये संस्थायें रूस को कई टुकड़ों में तोड़ देने के बाद उसके नागरिकों का भविष्य रचने का स्वप्न देख रही हैं.
प्राग में उतरते ही जिन चीज़ों से मेरा वास्ता हुआ, कतई वे नहीं थीं जिनके लिये यह शहर अमूमन मशहूर है. मुझे आये चौबीस घंटे नहीं हुए थे, मैं मध्ययुगीन गलियों और हसीन नदी से संवाद जोड़ ही रहा था कि एक शाम काफ्का हाउस से थोड़ा पहले मुझे दो युवक मिले—आरिफ़ इब्राहिमोव और उनके भाई ज़ीखान इब्राहिमोव. दोनों ततार समुदाय के सदस्य थे, जोर देकर कहते थे : “हमारा मजहब भले इस्लाम है, लेकिन हम पहले क्राएमिया के ततार हैं, उसके बाद यूक्रेनियन, और अंत में मुसलमान.”
आरिफ़ अपने को अफ़ग़ान और अरब मुसलमानों से अलग कर देखने का आग्रह करते हैं, जिनकी अमरीका और पश्चिम से लम्बी लड़ाई रही है. आरिफ़ के लिये अमरीका अंतिम उम्मीद है. ‘हमारा पहला शत्रु रूस है.’
‘फरवरी 2022 में रूस ने यूक्रेन पर दूसरी बार आक्रमण किया था. पहला आक्रमण 2014 में हुआ था, जब रूस ने क्राएमिया को हड़प लिया था.’
क्राएमिया तब यूक्रेन का हिस्सा हुआ करता था.

यह दो मई है. रात के बारह बज रहे हैं. हम आयरिश टाइम्स बार में बैठे हैं. प्रीमियर लीग का फुटबाल मैच 3-1 पर ख़त्म होकर चुका है. थोड़ी देर पहले आरिफ़ ने बीयर का मेनू मेरी ओर बढ़ा दिया था. मेनू से अक्सर बुरी तरह जूझता मैं इस बार एकदम परास्त हो गया था. मैं अपने परिचित नामों को खोज रहा था कि आरिफ़ मेरे संकट को समझ गये. “इसे देखिये—यह बेल्जियम की है, यह हंगरी की, यह चेक.” मुझे झट से रास्ता मिल गया. “आज की रात लोकल होनी चाहिये,” मैंने कहा.
2014 में रूस के आक्रमण के बाद ज़ीखान यूक्रेन के लीव शहर चले गये. आज वे जर्मनी में रहते हैं, आरिफ़ स्पेन में. पीछे छूट गये माता-पिता बेटों के लौटने का इंतजार कर रहे हैं. दोनों बेटे भी वापसी चाहते हैं, लेकिन रूसी कब्जे वाले इलाके में नहीं. सिग्नल मैसेंजर के जरिये माँ-पिता के संपर्क में रहते हैं. ‘सिग्नल सबसे सुरक्षित है. रूसी एजेंसी भी इसे हैक नहीं कर सकतीं,’ आरिफ़ कहते हैं.
मैं मुस्कुराना चाहता हूं. भारतीय एजेंसियां सिग्नल में भी सेंध मार चुकी हैं.
आरिफ़ बताते हैं कि उनका नाम सिर्फ़ इब्राहिम होना चाहिये था, लेकिन सोवियत शासन ने सभी नामों का रूसीकरण अनिवार्य कर दिया, ‘ओव’ जोड़ दिया—आरिफ़ इब्राहिमोव.
मैं नोट्स ले रहा हूँ, रिकॉर्डर भी चालू है. वे दावा करते हैं कि यूक्रेन के लड़ाके इन गर्मियों में उस समुद्री पुल को उड़ा देंगे जो पुतिन ने क्राएमिया पर कब्जे के बाद उसे रूस से जोड़ने के लिये बनवाया है. पिछले बरस अक्टूबर में इस पुल पर धमाका हुआ था, इसके कुछ हिस्से नष्ट हो गये थे. मरम्मत के बाद इस बरस यह पुल फिर से चालू हो गया.
रूस के प्रति इनका आक्रोश समझा जा सकता है, हालाँकि इनमें से कोई यह समझने को तैयार नहीं कि नाटो रूस की दहलीज पर बढ़ा चला आ रहा है. अगर पश्चिम रूस को घेरने और तोड़ने का व्यूह रचता रहेगा, पुतिन को अपने देशवासियों के सामने दुहाई देने का मौका मिलता रहेगा. यूक्रेन पर आक्रमण का निश्चित ही विरोध होना चाहिये, लेकिन क्या रूस से झगड़े की एक वजह यह भी है कि पश्चिम का एक वर्ग अभी भी रूस को शीत युद्ध के सशंकित आईने से देखता है?
आरिफ़ स्वीकारते हैं कि केजीबी के अत्याचार के बावजूद सोवियत संघ के कुछ आदर्श थे, मर्यादाएं थीं, मूल्य थे, लेकिन पुतिन का रूस आततायी है. मैं यह भी जोड़ता हूँ कि सोवियत संघ वैश्विक महाशक्ति सिर्फ़ एटम बम से नहीं बना था. विज्ञान और प्रोद्योगिकी में निवेश करता था. अन्तरिक्ष पर फ़तह की थी. शतरंज पर बादशाहत थी. बौद्धिक शक्ति थी. दुनिया भर के तमाम लेखकों और कलाकारों का समर्थन था.
पुतिन का रूस सिर्फ़ तेल, गैस और परमाणु हथियार के दम पर उछल रहा है. तकनीक और प्रोद्योगिकी में अन्य देशों ने इसे कबका पछाड़ दिया है, और अब शतरंज में भी वर्चस्व नहीं रहा. सोवियत संघ की एक बड़ी उपलब्धि आय की समानता थी, लेकिन रूस में चंद लोगों के पास आर्थिक ताकत सिमट गयी है. थॉमस पिकेटी ने ‘कैपिटल एंड आइडियोलॉजी’ में लिखा है कि सोवियत संघ के विघटन के बाद जब उत्तर-साम्यवादी रूस चंद रईसों की मिल्कियत बन गया, सिर्फ़ एक दशक के भीतर यह आर्थिक समानता के उच्चतम स्तर से गिर कर दुनिया के सबसे असमान देशों में शामिल हो गया.
रूस के तमाम समुदाय स्वतंत्रता की मांग करते वक्त इन कारकों का उल्लेख करते हैं. एक शाम बीसेक बरस के अलेक्सान्दर मेरे साथ देर तक घूमते हैं. हम पेत्रिन की पहाड़ी पर चढ़ते जाते हैं. वे अपने संगठनों की कार्य-योजना साझा करते हैं. उनकी प्रेमिका भी रूसी है. प्राग में पढ़ती है. हमारे नीचे व्लतावा और चार्ल्स ब्रिज, जिसके इस छोर पर अमरीकी दूतावास है.
रूस ने 2022 में यूक्रेन पर दूसरी बार आक्रमण किया. पहला आक्रमण 2014 में हुआ था.
‘आपको पता है अमरीकी दूतावास को यह जगह क्यों दी गयी?’
मैं सर हिला देता हूँ.
‘चार्ल्स ब्रिज के टावर देख रहे हैं आप? वहाँ से अमरीकी दूतावास पर बढ़िया निगरानी रखी जा सकती है. शीत युद्ध के दौरान केजीबी के ख़ुफ़िया यहाँ तैनात रहते थे.’
व्लतावा की शाम आपको पुकार रही है. आप सब कुछ भुला कर डूब जाना चाहते हैं. लेकिन अगर कातिल इमारतों का यह शहर अपने अतीत से मुक्त नहीं हो पाया है, तो अजनबी यात्री कैसे इस परछाईं से दगा करेगा? हम अभी भी पहाड़ी पर हैं. अलेक्सान्दर उँगली से इशारा करते हैं—नीचे ओल्ड टाउन हॉल से थोड़ा आगे ‘म्यूजियम ऑफ़ कम्युनिज्म’ है. मैं दो दिन बाद यहाँ जाता हूँ. आप तीन सौ अस्सी चेक क्राउन का टिकिट लेकर चेक रिपब्लिक में सोवियत संघ के अत्याचार की कथा देख सकते हैं.
Museum of Communism
अच्छी बात है. इस दमन का पुख्ता रिकॉर्ड होना चाहिये. लेकिन गौर करें, यह म्यूजियम सरकारी नहीं है. एक अमरीकी ने इसे बनवाया है. दूसरे, इसके मुख्य द्वार पर और फिर प्रदर्शनी शुरू होने से ठीक पहले मार्क्स की बड़ी-सी मूर्तियाँ लगी हैं—सिर्फ़ मार्क्स, कोई और नहीं. क्या मार्क्स के बजाय यहाँ उन चेक नेताओं की मूर्तियाँ नहीं होनी चाहिये थीं जिन्होंने अपने देश को सोवियत संघ के पास गिरवी रख दिया? इसी तरह इसे ‘म्यूजियम ऑफ़ कम्युनिज्म’ के बजाय स्टालिन युग या सोवियत दमन का अजायबघर कहना उचित नहीं होता? लेकिन नहीं, आपको भय एक विचारक से है, मानो 1968 में टैंक पर चढ़कर मार्क्स आ रहे थे.
इसलिए अमरीका को हमेशा एक शत्रु चाहिए. पूरी दुनिया में बहुदलीय लोकतंत्र के प्रसार का अमरीकी दावा उतना ही फ़रेबी है जितना पुतिन का अपने देशवासियों को यूरोप का डर दिखाना. इराक और अफ़ग़ानिस्तान तो भूल जाइए, क्या ऐसा कोई म्यूजियम नाटो के यूगोस्लाविया पर हमले का भी हो सकता है?
प्राग की गलियों में घूमते यूरोपीय नागरिकों से बात कर आप जान सकते हैं कि जबकि रूस साम्यवाद को बहुत पीछे छोड़ आया है, पश्चिम के एक वर्ग के लिये रूस आज भी कहीं सोवियत संघ का उत्तराधिकारी है, जिस तरह नोआम चोमस्की से लेकर भारत के एन राम जैसे बुद्धिजीवी आज भी रूस को पश्चिम के बरक्स रखते हैं. इसलिए भले ही रूस की वर्तमान स्थिति के लिये पुतिन जिम्मेदार हैं, लेकिन अगर रूस को उनके बजाय कोई लोकतान्त्रिक नेता भी मिला होता, नाटो की शंकायें शायद मिट नहीं पातीं.
मार्क्स की परछाईं यूरोप पर आज भी मंडरा रही है.








