
मनमोहन सेजू/ बाड़मेर. सरहदी बाड़मेर शहर के तिलक नगर निवासी एक बेटे ने अपने पिता की याद को चिरस्थाई बनाने के लिए फ़लो का बगीचा तैयार किया है. पिता के निधन के बाद बेटे ने ही इस बगीचे को तैयार किया है और करीब 13 साल से इस बगीचे की सार सम्भाल कर रहे हैं. भीषण गर्मी में यहां चीकू, पपीता, निम्बू और मौसमी के पौधे लहलहा रहे हैं.
पश्चिम राजस्थान के सीमांत बाड़मेर जिले में सदियों से ही शुष्क मौसम और खारे भूजल ने यहां होने वाली फसलों की प्रकृति तय कर दी थी. यहां की रेगिस्तानी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ज्यादातर बाजरा, चना और जीरा जैसी फसलें ही उगाई जाती थीं. लेकिन बदलते परिवेश व कृषि विज्ञान की मदद से बाड़मेर में किसानों ने एक नई इबारत लिखी है.
सरहदी बाड़मेर में किसान अब जीरे और अरंडी की फसल छोड़कर फलों का बगीचा लगा रहे है. बाड़मेर शहर के तिलक नगर निवासी युवा सुरेश कुमार कोडेचा ने एक बगीचा तैयार किया है. सबसे खास बात यह है कि सुरेश कुमार ने इसमें देशी खाद का प्रयोग किया है. दरअसल सुरेश कुमार के पिता छोगाराम कोडेचा बीएसएनएल कार्यालय में कार्यरत थे और उन्होंने इस बगीचे की नींव रखी और उसके 5 माह बाद ही छोगाराम का निधन हो गया. इसके बाद बेटे सुरेश कुमार ने पिता की याद को चिरस्थाई करने के लिए बगीचे की सार सम्भाल की और आज यहां चीकू,मौसमी, पपीता और नींबू के पौधे लहलहा रहे हैं.
सुरेश कुमार ने बताया कि 13 साल से इस बगीचे को सींचने का काम कर रहा हूं. इसमें देशी खाद का प्रयोग किया गया है और अब इन पेड़ो पर अच्छी पैदावार हो गई है. वह बताते है कि उनके पिता ने इन पौधों को लगाया था जोकि आज विशाल पेड़ बन गए है और इन्हें उनके पिता ने 250 रुपये प्रति पौधे के हिसाब से खरीदे थे. वह बताते है कि वह और उसका भाई श्रवण कुमार सहित पूरा परिवार इसकी देखरेख करते है.
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FIRST PUBLISHED : May 08, 2023, 18:34 IST








