
वो एक चेहरा दिलनशीं, आवाज ऐसी कि मिश्री घुली जाए. अदा ऐसी कि उफ्फ, उफ्फ और दर्द ऐसा कि आह, आह. ऐसा लिखा कि बरसों बीते मगर आज भी लोक गीत की तरह गुनगुनाए जाते हैं, उन गीतों के लेखक का नाम जाने बगैर. जो मात्र 36 बरस ही जिया लेकिन कितना भरपूर जिया! ऐसे शायर का नाम है शिव कुमार बटावली. वही शायर जिसे विरह का सुल्तान कहा जाता है, जिसने लिखा है, हमें तो जवानी की ऋतु में मर जाना है क्योंकि जवानी में जो मरता है वो या तो फूल बनता है या तारा और जवानी में या तो आशिक मरते है या वो जो बहुत कर्मों वाले होते है:
असां तां जोबन रुत्ते मरना, मुड़ जाना असां भरे भराए
हजर तेरे दी कर परकरमा, असां तां जोबन रुत्ते मरना.
शिव कुमार बटावली को जानने के लिए हमारे पास कुछ झूठे-सच्चे किस्से हैं, एक बहुचर्चित वीडियो है और इन सबसे बड़े मोहब्बत और जुदाई के नग्मे हैं. उनकी रचनाओं को पढ़ कर लोग मोहब्बत जी लेते हैं और विरह के नग्मे सुन आंसूओं से भीग जाते हैं. इस शायर का एक इंटरव्यू खासा चर्चित है. इस इंटरव्यू में वे कवि बनने की अपनी यात्रा पर कहते हैं कि कविता एक हादसे से पैदा नहीं होती. कुछ का ख्याल है कि शायद कविता मोहब्बत से पैदा होती है. कुछ का ख्याल है कि उदासी से पैदा होती है. मेरा ख्याल है कि मुझमें जो कविता पैदा हुई उसमें सबकुछ था. मुझे नहीं पता कि मैं शायर कैसे बना.
यह कह रहे शायर शिवकुमार से जब एंकर पूछता है कि कोई ठेस लगी हो… तो शायर शिवकुमार साफ करते हैं, काहें कि ठेस? मुझे मोहब्बत का कोई दु:ख नहीं. क्या किसी व्यक्ति से या किसी तस्वीर से प्यार किया है पूछने पर वे कहते हैं, वह तस्वीर बनी ही नहीं. हजारों औरतें आईं मगर स्वीकार ही नहीं किया. यह कहते हुए वे मोहब्बत पर एक रोमांटिक गीत गा कर सुनाते हैं:
की पुछदेओ हाल फकीरां दा
साडा नदियों बिछड़े नीरां दा
साडा हंझ दी जूने आयां दा
साडा दिल जल्या दिलगीरां दा
(फकीरों का हाल क्या पूछते हो, हम तो नदियों से बिछड़े पानी की तरह हैं. हम आंसूओं से निकले हैं और हमारा दिल जलता है.)
इह जाणद्यां कुझ शोख़ जहे
रंगां दा ही नां तसवीरां है
जद हट्ट गए असीं इशके दी
मुल्ल कर बैठे तसवीरां दा
(हम जानते हैं कि कुछ रंगों का नाम ही तस्वीर है लेकिन जब हम इश्क के मेले में गए तो तस्वीर का मोल कर बैठे)
इस गीत को सुनते-सुनते श्रोता कह उठते हैं, इंटरव्यू में शायर झूठ कह रहा है. झूठ कह रहा है कि उसे मोहब्बत हुई नहीं और उसे हिज्र नहीं सहना पड़ा. अगर शायर जो कह रहा है वह सच है तो उसका लिखा झूठ है. लेकिन उसका लिखा झूठ कैसे हो सकता है? मोहब्बत के वो नग्मे कैसे झूठे हो सकते हैं जिन्हें आज भी जमाना गाता है? वो दर्द कैसे झूठ हो सकता है जिसे सुन कर आज भी मन रो उठता है?
एक रचना की बात नहीं, यहां तो सारी रचनाएं ऐसी है जो शायर के कहे पर सवाल उठाती है कि उसे कभी मोहब्बत हुई ही नहीं, मन की तस्वीर कभी बनी ही नहीं. जैसे बहुत प्रसिद्ध कविता ‘इश्तिहार’. इस रचना में शिवकुमार लिखते हैं:
इक कुड़ी जिहदा नाम मोहब्बत
गुम है गुम है गुम है
साद मुरादी सोहणी फब्बत
गुम है गुम है गुम है
सूरत उसदी परियां वरगी
सीरत दी ओह मरियम लगदी
हसदी है तां फुल्ल झड़दे ने.
(एक लड़की जिसका नाम मोहब्बत है, गुम है. सूरत उसकी परियों जैसी, सीरत उसकी मरियम जैसी, हंसती है तो फूल झड़ते हैं, चलती है तो गजल लगती है. छोटी उम्र है पर आंखों की बात समझती है, उसे गुम हुए कई जनम बीत चुके पर लगता है जैसे अभी की बात है.)
कौन मानेगा कि ऐसे मोहब्बत को जीने वाले, ऐसे विरह को गाने वाले शायर ने कभी मोहब्बत ही नहीं की है? इन नग्मों को सुन कर दिल कहता है कि मोहब्बत ऐसी थी, हिज्र का दु:ख ऐसा था कि लिखा गया शब्द लोकगीत की तरह हर जुबां पर चढ़ गया और इसीलिए इस शायर से जुड़े हर सच्चे-झूठे किस्से पर यकीं होने लगता है.
किशोर उम्र का एक किस्सा है. कहते है कि किशोरवय शिवकुमार को गांव के मेले में एक लड़की से प्यार हो गया. मैना नाम की इस लड़की को खोजते हुए शिवकुमार उसके गांव तक गए और उसके भाई से दोस्ती गांठी ली थी. दोस्त से मिलने के नाम पर वे रोज मैना के गांव जाते थे. मोहब्बत परवान चढ़ रही थी कि बुखार के बाद मैना की मृत्यु हो गई। इस प्रेम के टूटने ने उन्हें कवि बना दिया. अपने प्यार के गम में शिवकुमार बटालवी ने ‘मैना’ शीर्षक से एक लंबी कविता लिखी थी. कहते हैं कि कुछ समय बाद उन्हें पंजाबी लेखक गुरबख्श सिंह प्रीतलड़ी की बेटी से प्यार हुआ लेकिन जाति भेद होने के कारण उनका विवाह नहीं हो पाया. लड़की विवाह कर विदेश चली गई. तभी एक नज्म आई, जिसमें शिव ने अपनी प्रेमिका को शिकरा कहा है:
माए नी माए मैं इक शिकरा यार बनाया
चूरी कुट्टां तां ओह खाओंदा नाहीं
वे असां दिल दा मास खवाया
इक उड़ारी ऐसी मारी
इक उड़ारी ऐसी मारी
ओह मुड़ वतनीं ना आया, ओ माये नी!
मैं इक शिकरा यार बना.
शिकरा एक पक्षी है जो दूर से अपने शिकार को देखकर सीधे उसका मांस नोंच कर ले उड़ता है. शिवकुमार लिखते हैं उन्होंने शिकरा को दिल का मांस खिलाया है. वह ऐसा उड़ा है कि वापिस अपने वतन नहीं आया. शोक और दुःख के समय इन्होंने अपनी सबसे लोकप्रिय कविता में से एक ‘आज दिन चढ़ेया तेरे रंग वरगा’ लिखी. इन रचनाओं के बाद भी इंटरव्यू में कही गई बात को सच माना जाए?
विरह में खुद को खत्म करते शिवकुमार ने आखिरकार परिवार के दबाव आ कर 1967 में एक ब्राह्मण युवती अरुणा से शादी की. उनकी दो बेटियां भी हुई लेकिन उनके गीतों में विरह का दर्द बना रहा. विरह में वे पीने भी बहुत लगे थे और इसी कारण लिवर बिगड़ता गया. अंतत: 23 जुलाई 1936 को जन्मे इस शायर का 6 मई, 1973 को सिर्फ 36 साल की उम्र में निधन हो गया.
आज जमाना शिवकुमार बटावली के लिखे गीतों को गाता है. कई गायकों ने इन गीतों को गाकर लोकप्रियता और सफलता की सीढि़यां चढ़ीं. फिर चाहे वह गायक गुलाम अली हो, नुसरत फतेह अली हो या जगजीत-चित्रा सिंह, भूपिंदर और मिताली सिंह, रब्बी शेरगिल हो. उनके गीत पंजाब में शादियों और लोकोत्सव में गाए गए जैसे वारिस शाह को गाया जाता है.
मगर, शिवकुमार बटावली को मोहब्बत और हिज्र का शायर कहना उनके नजरिए को जरा छोटा करना होगा. मोहब्बत और हिज्र को गाने से आगे जा कर शिवकुमार के चिंतन को समझना है तो ‘लूणा’ को पढ़ना व जानना चाहिए. वही पद्य नाटक ‘लूणा’ जिसे 1967 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था. आजादी के बाद का यह वह दौर था जब देश कई तरह के दायरों को तोड़ रहा था, बंधनों से मुक्त हो रहा था. ऐसे समय में शिवकुमार बटावली स्त्री चेतना, गरिमा और स्वाभिमान की बात करते हैं, पुरूषवादी मानसिकता वाले समाज में यह प्रगतिशील कदम कहा जाना चाहिए जो महिला की गरिमा और आजादी की बात करता है.
पंजाब में सदियों से कादिर यार द्वारा लिखी ‘पूरन भगत’ की कथा कही जाती है. कथा यूं है कि सियालकोट सलवान अपनी पहली पत्नी इछिरा को छोड़ कर नीची जाति की बेटी की उम्र की कन्या लूणा से शादी कर लेते हैं. जब राजा का युवा बेटा पूरन निर्वासित जीवन जी कर महल में आता है तो युवा लूणा उसकी ओर आकर्षित हो जाती है. राजकुमार पूरन उसे मां समान मान कर प्रेम प्रस्ताव ठुकरा देता है. इससे नाराज लूणा उसपर दुर्व्यवहार का आरोप लगा देती है. सजा के तौर पर राजा पूरन को अपंग बनवा कर सूखे कुएं में फेंकने का आदेश दे देता है. एक साधु कुंए से आ रही अपाहिज पूरन की आवाज सुन कर उसे बचाते हैं और इस तरह साधना कर राजकुमार पूरन भगत पूरन में बदल जाता है. वर्षों बाद, निःसंतान लूणा और राजा सलवान संतान की चाह में प्रसिद्ध भगत पूरन से मिलने आते हैं. जब लूणा को पूरन भगत की पहचान का पता चलता है तो वह अपनी गलती स्वीकार करती है. पूरन उसे और राजा सलवान को माफ कर देता है, और बाद में लूणा एक बच्चे को जन्म देती है.
कादिर यार ने स्त्रियों के लिए समाज में व्याप्त तमाम चारित्रिक पैमानों का पालन करते हुए पुरूष को श्रेष्ठ और लूणा के चरित्र को निम्न बताया है. लोककथा में लूणा के लिए अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल होता है जैसे नरक का द्वार, काम की वस्तु आदि. मगर शिवकुमार बटावली ने पूरे कथानक को लूणा की दृष्टि से देखा. उन्होंने इसे एक ऐसी कहानी में बदल दिया है जो किंवदंती पर सवाल उठाती है. शिवकुमार ने ऐतिहासिक कथा का खंडन करते हुए कहा कि लूणा कहानी की खलनायिका नहीं थी. वास्तव में खलनायक तो राजा सलवान है. लूणा ने तो पुरूष कामना के आगे आत्मसमर्पण किया. उन्होंने बेटी की उम्र की युवती से राजा के विवाह को ही गलत ठहराया. मूल कथा का अंत पुरूष को त्याग की मूर्ति बनाते हुए भगवान का दर्जा देता है और स्त्री लूणा को अपने कार्य के लिए शर्मिंदा, पश्चाताप से भरी हुई चित्रित करता है. जबकि शिवकुमार बटावली के नाटक के अंत में पूरन भगत स्त्री के लिए स्वतंत्रता की पैरवी करता है और प्रार्थना करता है कि उसके बलिदान के फलस्वरूप एक ऐसे समाज का निर्माण होगा जहां बेटी की उम्र की लूणा को बूढ़े सलवान से शादी न करनी पड़े. इतनी ही नहीं स्त्री अधिकारों और चेतना की पैरवी करते हुए शिवकुमार बटावली के नाटक ‘लूणा’ में राजा सलवान द्वारा दूसरी शादी कर लेने पर पहली रानी इछिरा महल छोड़ कर चली जाती है. वह अपमानित हो कर महल में रहना स्वीकार नहीं करती है.
अपने इसी कथानक के कारण 30 वर्ष की उम्र में शिवकुमार बटावली को साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया. इतनी कम उम्र में यह शीर्ष पुरस्कार पाने वाले वे प्रथम साहित्यकार हैं. जवानी की रूत में मौत की चाह रखने वाला यह शायर जरूर उजला तारा बन चमचमा रहा होगा. साहित्य में तो उनकी रचनाएं दमक ही रही हैं.








