
कौशाम्बी
माहे मोहर्रम की 10 तारीख हजरत इमाम हुसैन से मंसूब है। जोकि हजरत रसूल अल्लाह के प्यारे नवासे हैं। जिनको जालिमों ने तीन दिनों का भूखा प्यासा शहीद कर दिया। इसी गम को आगे बढ़ाते हुए अंजुमने मोहम्मदिया की सर परस्ती में ताजिया का जूलूस शनिवार को दिन में दो बजे बरामद हुआ। मर्सिया ख्वानी जनाब आफताब हैदर ने की। उन्होंने पढ़ा-अय अजीजों दहुमे माहे मोहर्रम है आज, दफ्तरे दीने खुदा दिरहमो बरहम है आज।
मजलिस को खेताब मौलाना जफर अब्बास गोरखपुरी ने किया। उन्होंने पढ़ा-अजादारों आज आशूर का दिन है सुबह हो गई है जैनब के परदे का आखिरी दिन, फातिमा की आल आज करबला में अकेली है। अजादारों 28 रजब सन् 60 हिजरी को हुसैन ने मदीना छोड़ा, मां की कब्र छोड़ी, नाना का रौजा छोड़ा तीन शाबान को मक्का पहुंचे और आठ जिलहिज्ज को मक्का भी छोड़ दिया यह कह कर कि अय अल्लाह के घर तेरी हुरमत सलामत रहे मैं जा रहा हूं। दो मोहर्रम सन् 61 हिजरी को करबला पहुंचे, सात मोहर्रम से पानी बंद हो गया और दस मोहर्रम को सुबह से शाम तक बुतूल के घर से 72 जनाजे निकल गए। अजादारों कयामत आ गई थी जब फातिमा के घर से एक छह महीने का जनाजा गले पर तीर खाकर निकला था। आखिर में इमाम हुसैन आए कहा अम्मा फिज्जा, मेरा पुराना संदूक उठा लाओ उसमें हमारा बोसीदा लेबास है। इमाम रूखसत हुए मैदान में पहुंचे। यजीदी फौजों ने घेरे में लेना शुरू किया। गैब से आवाज आई बस हुसैन बस अब सब्र के जौहर दिखाओ, हुसैन ने तलवार को म्यान में रखा। यजीदी लशकर से तीन हजार कमानों से तीर निकले। वक्ते शहादत इमाम का जिस्म न जीन पर था न जमीन पर था तीरों पर मुअल्लक हो गया था। इमाम के मसायब सुनकर अजादार अपनी आंखों से अश्क न रोक पाए और जारो कतार रोने लगे। उसके बाद अंजुमने मोहम्मदिया के साहबे बयाज जनाब शैजी, सोनू, शमशेर, शब्बर अली और जफर अब्बास ने नौहाख्वानी की। उन्होंने पढ़ा-सारी दुनिया खा रही है तेरा सदका या हुसैन……..। जुलूस अपने कदीमी रास्ते से होता हुआ पंचायती करबला कलां में जाकर शाम को अलविदाई नौहा के साथ तमाम हुआ। पंचायती बड़ा ताजिया के साथ ग्राम मादपुर, महमूदपुर और फतेहपुर गांव का भी ताजिया पंचायती करबला में दफन हुआ।








