‘इंतज़ार’ एक साधना है, पढ़ें मोहब्बत में इंतज़ार पर खूबसूरत शायरियां


उर्दू साहित्य में ‘इंतज़ार’, इच्छापूर्ति और उम्मीद की एक अंतहीन उदास यात्रा जैसा है. शायरों ने यदि किसी विषय को बहुत गहराई से छुआ है, तो वो ‘मोहब्बत’ और ‘मोहब्बत में इंतज़ार’ ही है. मोहब्बत और इंतज़ार का गहरा नाता है. काव्य के माध्यम से यदि शायर की मोहब्बत की गहराई का पता लगाना हो, तो इंतज़ार पर उनके शेर पढ़ लेने भर से उस गहराई में उतरा जा सकता है. इंतज़ार बहुत सारे जज़्बातों की उठी हुई वो पीड़ा है, जिसमें इच्छापूर्ति, उम्मीद और सब्र एक साथ मौजूद होता है. ये एक व्यापक भाव है, जो बेचैनी और तकलीफ के लिए नया रास्ता अख्तियार करती है और इंतज़ार के रूप में उम्मीद को एक और मौका देती है.

गज़लों-शायरियों में इंतज़ार अक्सर एक अनुभव के रूप में चित्रित होता है. आशा और निराशा के बीच झूलता एक एहसास, जहां मन प्रियतम की उपस्थिति की आकांक्षा करता है, और वहीं दूसरी तरफ शब्दों के माध्यम से उसके आगमन की आशा में खुद से ही सांत्वना पाने की कोशिश करता है. फिर बात चाहे मिर्ज़ा ग़ालिब की हो या फिर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की.

“इंतज़ार शायद मोहब्बत का नसीब है, लेकिन मोहब्बत जब इंतज़ार करती है- समय थम जाता है, ज़माने रुक जाते है… मोहब्बत ज़िद्दी है… आखिरी सांस, आखिरी धड़कन, आखिरी पल तक इंतज़ार कर सकती है और कभी-कभी उसके बाद भी…” ये पंक्तियां जावेद अख़्तर की हैं. ऐसे ही मोहब्बत और मोहब्बत पर इंतज़ार में अनगिनत शेर लिखे गए हैं, जिन्हें पढ़ कर मन चाहे कितना भी उदास हो, इंतज़ार को भी इंतज़ार करने की ताकत मिल जाती है. मोहब्बत का असली उसूल ही है इंतज़ार करना, फिर प्यार करने वाले दो दिल इससे कैसे दूर रह सकते हैं भला. आइए पढ़ते हैं कुछ ऐसे ही चुनिंदा शेर, जिन्हें हमारे शायरों ने इंतज़ार में लिखा है-

“नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तुजू ही सही
नहीं विसाल मयस्सर तो आरज़ू ही सही”
-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

“गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौ-बहार चले
चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले”
-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

“वो दिन कि कोई भी जब वज्ह-ए-इन्तिज़ार न थी
हम उन में तेरा सिवा इंतिज़ार करते रहे”
-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

“दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है
लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है”
-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

“ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता”
-मिर्ज़ा ग़ालिब

“न कोई वा’दा न कोई यक़ीं न कोई उमीद
मगर हमें तो तिरा इंतिज़ार करना था”
-फ़िराक़ गोरखपुरी

“रिश्तों का ए’तिबार वफ़ाओं का इंतिज़ार
हम भी चराग़ ले के हवाओं में आए हैं”
-निदा फ़ाज़ली

“न जी भर के देखा न कुछ बात की
बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की”
-बशीर बद्र

“तेरे आने की जब ख़बर महके
तेरी ख़ुशबू से सारा घर महके”
-नवाज़ देवबंदी

“वो न आएगा हमें मालूम था इस शाम भी
इंतिज़ार उस का मगर कुछ सोच कर करते रहे”
-परवीन शाकिर

“कहीं वो आ के मिटा दें न इंतिज़ार का लुत्फ़
कहीं क़ुबूल न हो जाए इल्तिजा मेरी”
-हसरत जयपुरी

“कमाल-ए-इश्क़ तो देखो वो आ गए लेकिन
वही है शौक़ वही इंतिज़ार बाक़ी है”
-जलील मानिकपूरी

“अब कौन मुंतज़िर है हमारे लिए वहाँ
शाम आ गई है लौट के घर जाएँ हम तो क्या”
-मुनीर नियाज़ी

“इसी ख़याल में हर शाम-ए-इंतिज़ार कटी
वो आ रहे हैं वो आए वो आए जाते हैं”
-नज़र हैदराबादी

“हमें भी आज ही करना था इंतिज़ार उस का
उसे भी आज ही सब वादे भूल जाने थे”
-आशुफ़्ता चंगेज़ी

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Author: Jagran Times

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