शिकारी औरतों के किस्से : सआदत हसन मंटो की कहानी ‘शिकारी औरतें’

उर्दू के सर्वाधिक महत्वपूर्ण, चर्चित और विवादास्पद लेखक सआदत हसन मंटो की हर कहानी अपने में ख़ास है और बड़ी सहजता से कड़वी बात कहने का साहस रखती है. उन्होंने सिर्फ नये विषयों पर ही नहीं लिखा बल्कि नये अंदाज़ और नये नज़रिये से भी लिखा, जिसने उन्हें एक बड़ा कहानीकार बनाया. उनकी उन्हीं कहानियों में से एक कहानी है ‘शिकारी औरतें’. ये कुछ ख़ास तरह की औरतों को लेकर बुनी गई कहानी है. समाज उन्हें किस तरह देखता है, वो खुद को समाज को कैसा दिखाना चाहती हैं या फिर समाज से क्या चाहती हैं और उनकी असलियत क्या होती है, इन सभी सवालों का जवाब मंटो ने इस छोटी-सी कहानी में बड़ी बेबाकी से दिया है. कहानी में गहरी मानवीय दृष्टि के साथ-साथ तीव्र आक्रोश और प्रतिकार भी है.

मंटो की कहानी ‘शिकारी औरतें’ ‘सआदत हसन मंटों की कहानियां’ किताब से ली गई है, जिसका संपादन नरेंद्र मोहन ने किया है और किताब का प्रकाशन ‘किताब घर’ ने. इस संकलन में मंटों की अधिकतर कहानियां मौजूद हैं. सभी कहानियां पाठकों की अन्तश्चेतना को बुरी तर झकझोरने और तिलमिला देने वाले विचारों तक ले जाती हैं. आपको बता दें कि नरेंद्र मोहन हिंदी के उन गिने-चुने लेखकों में से एक हैं, जिन्होंने रचना और आलोचना में एक अंतर्वर्ती संबंध माना ही नहीं, बल्कि अपने सृजन-धर्म और आलोचना-कर्म में उसे झलकाया भी. ‘सआदत हसन मंटो के नाटक’ और ‘सआदत हसन मंटो की कहानियां’ पुस्तकें नरेंद्र मोहन की संपादन-प्रतिभा में नए आयाम जोड़ती है. आइए पढ़ते हैं ‘सआदत हसन मंटो की कहानियां’ पुस्तक से लघुकथा ‘शिकारी औरतें’-

शिकारी औरतें : सआदत हसन मंटो
मैं आज आप को चंद शिकारी औरतों के क़िस्से सुनाऊंगा. मेरा ख़याल है कि आपको भी कभी उनसे वास्ता पड़ा होगा.

मैं बंबई में था. फ़िल्मिस्तान से आमतौर पर बर्क़ी ट्रेन से छः बजे घर पहुंच जाया करता था. लेकिन उस रोज़ मुझे देर हो गई. उसलिए कि शिकारी की कहानी पर बहस वाद-विवाद होता रहा.

मैं जब बंबई सेंट्रल के स्टेशन पर उतरा, तो मैंने एक लड़की को देखा जो थर्ड क्लास कम्पार्टमंट से बाहर निकली. उस का रंग गहरा सांवला था. नाक नक़्शा ठीक था. उस की चाल बड़ी अनोखी सी थी. ऐसा लगता था कि फिल्म का दृश्य लिख रही है.

मैं स्टेशन से बाहर आया और पोल पर विक्टोरिया गाड़ी का इंतिज़ार करने लगा. मैं तेज़ चलने का आदी हूं उसलिए में दूसरे मुसाफ़िरों से बहुत पहले बाहर निकल आया था.

विक्टोरिया आई और मैं उस में बैठ गया. मैंने कोचवान से कहा कि आहिस्ता-आहिस्ता चले इसलिए कि फ़िल्मिस्तान में कहानी पर बहस करते करते मेरी तबीयत परेशान हो गई थी. मौसम सुहावना था. विक्टोरिया वाला आहिस्ता-आहिस्ता पुल पर से उतरने लगा.

जब हम सीधी सड़क पर पहुंचे तो एक आदमी सिर पर टाट से ढका हुआ मटका उठाए सदा लगा रहा था. “क़ुल्फ़ी… क़ुल्फ़ी!”

जाने क्यों मैंने कोचवान से विक्टोरिया रोक लेने के लिए कहा, और उस क़ुल्फ़ी बेचने वाले से कहा एक क़ुल्फ़ी दो. मैं असल में अपनी तबीयत की परेशानी किसी न किसी तरह दूर करना चाहता था.

उसने मुझे एक दोने में क़ुल्फ़ी दी. मैं खाने ही वाला था कि अचानक कोई धम्म से विक्टोरिया में आन घुसा. काफ़ी अंधेरा था. मैंने देखा तो वही गहरे रंग की सांवली लड़की थी.

मैं बहुत घबराया. वो मुस्कुरा रही थी. दोने में मेरी क़ुल्फ़ी पिघलना शुरू हो गई.

उस ने क़ुल्फ़ी वाले से बड़े बे-तकल्लुफ़ अंदाज़ में कहा,”एक मुझे भी दो.”

उसने दे दी.

गहरे सांवले रंग की लड़की ने उसे एक मिनट में चट कर दिया और विक्टोरिया वाले से कहा “चलो.”

मैंने उससे पूछा “कहां?”

“जहां भी तुम चाहते हो.”

“मुझे तो अपने घर जाना है.”

“तो घर ही चलो.”

“तुम हो कौन?”

“कितने भोले बनते हो.”

मैं समझ गया कि वो किस कमाश की लड़की है. चुनांचे मैंने उस से कहा. “घर जाना ठीक नहीं. और ये विक्टोरिया भी ग़लत है. कोई टैक्सी ले लेते हैं.”

वो मेरे उस मश्वरे से बहुत ख़ुश हुई. मेरी समझ में नहीं आता था कि उस से नजात कैसे हासिल करूं. उसे धक्का दे कर बाहर निकालता तो ऊधम मच जाता. फिर मैंने ये सोचा कि औरत ज़ात है. उससे फ़ायदा उठा कर कहीं वह यह बावेला न मचा दे कि मैंने उससे अभद्र मज़ाक़ किया है.

विक्टोरिया चलती रही और मैं सोचता रहा कि ये मुसीबत कैसे टल सकती है. आख़िर हम बेबी अस्पताल के पास पहुंच गए. वहां टैक्सियों का अड्डा था. मैंने विक्टोरिया वाले को उसका किराया अदा किया और एक टैक्सी ले ली. हम दोनों उस पर बैठ गए.

ड्राइवर ने पूछा,”किधर जाना है साहब?”

मैं अगली सीट पर बैठा था. थोड़ी देर सोचने के बाद मैंने उससे फुसफुसा कर कहा. “मुझे कहीं भी नहीं जाना है. ये लो दस रुपए. उस लड़की को तुम जहां भी ले जाना चाहो ले जाओ.”

वो बहुत ख़ुश हुआ.

दूसरे मोड़ पर उस ने गाड़ी ठहराई और मुझ से कहा,”साहब आपको सिगरेट लेने थे. उस ईरानी के होटल से सस्ते मिल जाएंगे.”

मैं फ़ौरन दरवाज़ा खोल कर बाहर निकला. गहरे रंग की लड़की ने कहा. “दो पैकेट लाना.”

ड्राइवर उस से मुख़ातिब हुआ, “तीन ले आएंगे.” और उसने मोटर स्टार्ट की और यह जा वह जा.

बम्बई का वाकया है, मैं अपने फ़्लैट में अकेला बैठा था. मेरी बीवी शॉपिंग के लिए गई हुई थी कि एक घाटन, जो बड़े तीखे नक़्शों वाली थी, बे-धड़क अन्दर चली आई. मैंने सोचा शायद नौकरी की तलाश में आई है. मगर वो आते ही कुर्सी पर बैठ गई. मेरे सिगरेट केस से एक सिगरेट निकाला और उसे सुलगा कर मुस्कराने लगी.

मैंने उस से पूछा,”कौन हो तुम?”

“तुम पहचानते नहीं.”

“मैंने आज पहली दफ़ा तुम्हें देखा है.”

“साला झूठ मत बोलो. दो रोज़ देखता है.”

मैं बड़ी उलझन में गिरफ़्तार हो गया, लेकिन थोड़ी देर के बाद मेरा नौकर फ़ज़लदीन आ गया. उसने उस तीखे नक़्शों वाली घाटन को अपने कब्ज़े में ले लिया.

यह वाकया लाहौर का है.

मैं और मेरा एक दोस्त रेडियो स्टेशन जा रहे थे. जब हमारा तांगा असेंबली हाल के पास पहुंचा तो एक तांगा हमारे अक़्ब से निकल कर आगे आ गया. उसमें एक बुर्कापोश औरत थी जिस की नक़ाब नीमवा थी.

मैंने जब उसकी तरफ़ देखा तो उस की आंखों में अजीब क़िस्म की शरारत नाचने लगी. मैंने अपने दोस्त से जो पिछली नशिस्त पर बैठा था, कहा. “ये औरत बद-चलन मालूम होती है.”

“तुम ऐसे फ़ैसले एक दम मत दिया करो.”

“बहुत अच्छा जनाब- मैं आइन्दा एहतियात से काम लूंगा.”

बुर्क़ापोश औरत का तांगा हमारे तांगे के आगे आगे था. वो टिकटिकी लगाए हमें देख रही थी. मैं बड़ा बुज़दिल हूं, लेकिन उस वक़्त मुझे शरारत सूझी और मैंने उसे हाथ के इशारे से आदाब अर्ज़ कर दिया.

उसके आधे ढके चेहरे पर मुझे कोई प्रतिक्रिया नज़र न आयी, जिस से मुझे बड़ी मायूसी हुई.

मेरा दोस्त कटने लगा. उसको मेरी उस नाकामी से बड़ी खुशी हुई. लेकिन जब हमारा तांगा शिमला पहाड़ी के पास पहुंच रहा था तो बुर्कापोश औरत ने अपना तांगा ठहरा लिया और (मैं ज़्यादा विस्तार में नहीं जाना चाहता) वो नीम उठी हुई निक़ाब के अंदर मुस्कुराती हुई आई और हमारे तांगे में बैठ गई– मेरे दोस्त के साथ.
मेरी समझ में न आया क्या किया जाये. मैंने उस बुर्कापोश औरत से कोई बात न की, और टांगे वाले से कहा कि,”वो रेडियो स्टेशन का रुख़ करे.”

मैं उसे अंदर ले गया. डायरेक्टर साहब से मेरे दोस्ताना मरासिम थे. मैंने उस से कहा. “ये ख़ातून हमें रस्ते में पड़ी हुई मिल गई. आपके पास ले आया हूं, और दरख़ास्त करता हूं कि उन्हें यहां कोई काम दिलवा दीजिए.”

उन्होंने उसकी आवाज़ का इम्तहान कराया जो काफ़ी इत्मिनान-बख़्श था. जब वो ऑडिशन दे कर आई तो उस ने बुर्क़ा उतारा हुआ था. मैंने उसे ग़ौर से देखा. उस की उम्र पच्चीस के क़रीब होगी. रंग गोरा आंखें बड़ी बड़ी. लेकिन उसका जिस्म ऐसा मालूम होता था, जैसे शकरकंदी की तरह भूबल में डाल कर बाहर निकाला गया है.

हम बातें कर रहे थे कि इतने में चपरासी आया. उसने कहा कि “बाहर एक तांगा वाला खड़ा है, वो किराया मांगता है.” मैंने सोचा शायद ज़्यादा अर्सा गुज़रने पर वो तंग आ गया है, चुनांचे मैं बाहर निकला. मैंने अपने तांगे वाले से पूछा,”भई क्या बात है. हम कहीं भाग तो नहीं गए.”

वो बड़ा हैरान हुआ,”क्या बात है सरकार.”

“तुम ने कहला भेजा है कि मेरा किराया अदा करो.”

“मैंने जनाब किसी से कुछ भी नहीं कहा.”

उसके तांगे के साथ ही एक दूसरा तांगा खड़ा था. उस का कोचवान जो घोड़े को घास खिला रहा था, मेरे पास आया और कहा,”वो औरत जो आपके साथ गई थी, कहां है?”

“अंदर है… क्यों?”

“जी उसने दो घंटे मुझे ख़राब किया है. कभी उधर जाती थी, कभी इधर. मैं तो समझता हूं कि उसको मालूम ही नहीं कि उसे कहां जाना है.”

“अब तुम क्या चाहते हो?”

“जी मैं अपना किराया चाहता हूं.”

“मैं उसे लेकर आता हूं.”

“मैं अंदर गया. उस बुर्कापोश औरत से जो अपना बुर्क़ा उतार चुकी थी, कहा,”तुम्हारा तांगे वाला किराया मांगता है.”

वो मुस्कुराई, “मैं दे दूंगी.”

मैंने उस का पर्स जो सोफे पर पड़ा था, उठाया. उसको खोला. मगर उस में एक पैसा भी नहीं था. बस के चंद टिकट थे और दो बालों की पिनें…और एक वाहियात क़िस्म की लिपस्टिक.

मैंने वहां डायरेक्टर के दफ़्तर में कुछ कहना मुनासिब न समझा. उनसे रुख़स्त तलब की. बाहर आकर उसके तांगे वाले को दो घंटों का किराया अदा किया, और उस औरत को अपने दोस्त की मौजूदगी में कहा,”तुम्हें इतना तो ख़याल होना चाहिए था कि तुम ने तांगा ले लिया है और तुम्हारे पास एक कौड़ी भी नहीं.”

वो खिसियानी हो गई “मैं… मैं… आप बड़े अच्छे आदमी हैं.”

“मैं बहुत बुरा हूं… तुम बड़ी अच्छी हो… कल से रेडियो स्टेशन आना शुरू कर दो… तुम्हारी आमदन की सूरत पैदा हो जाएगी. ये बकवास जो तुमने शुरू कर रखी है, उसे छोड़ दो.”

मैंने उसे मज़ंग के पास छोड़ दिया… मेरा दोस्त वापस चला गया… इत्तिफ़ाक़न मुझे एक काम से वहां जाना पड़ा. देखा कि मेरा दोस्त और वो औरत इकट्ठे जा रहे थे.

ये भी लाहौर ही का वाक़िया है. चंद रोज़ हुए, मैंने अपने दोस्त को मजबूर किया कि वो मुझे दस रुपय दे. उस दिन बैंक बंद थे. उस ने मजबूरी का इज़हार किया. लेकिन जब मैंने उस पर ज़ोर दिया कि वो किसी न किसी तरह ये दस रुपय पैदा करे. इसलिए कि मुझे अपनी एक इल्लत पूरी करना है, जिससे तुम ब-ख़ूबी वाक़िफ़ हो, तो उस ने कहा,”अच्छा मेरा एक दोस्त है. वह शायद इस वक़्त कॉफ़ी हाऊस में होगा. वहां चलते हैं, उम्मीद है, काम बन जाएगा.”

हम दोनों तांगे में बैठ कर काफ़ी हाऊस पहुंचे. माल रोड पर बड़े डाकख़ाने के क़रीब एक तांगा जा रहा था. उसमें एक निसवारी रंग का बुर्क़ा पहने एक औरत बैठी थी. उस की नक़ाब पूरी की पूरी उठी हुई थी.

वह तांगे वाले से बड़े बे-तकल्लुफ़ अंदाज़ में गुफ़्तुगू कर रही थी. हमें उसके अल्फ़ाज़ सुनाई नहीं दिए. लेकिन उसके होंठों की जुंबिश से जो कुछ मुझे मालूम होना था हो गया.

हम कॉफ़ी हाऊस पहुंचे तो औरत का तांगा भी वहीं रुक गया. मेरे दोस्त ने अंदर जा के दस रुपयों का बंद-ओ-बस्त किया और बाहर निकला. वो औरत निसवारी बुर्के में जाने किसकी इंतज़ार कर रही थी.

हम वापस घर आने लगे तो रस्ते में ख़रबूज़ों के ढेर नज़र आए. हम दोनों तांगे से उतर कर ख़रबूज़े परखने लगे.

हम ने बाहम फ़ैसला किया कि अच्छे नहीं निकलेंगे क्योंकि उन की शक्ल-ओ-सूरत बड़ी बेढंगी थी. जब उठे तो क्या देखते हैं कि वो निसवारी बुर्क़ा तांगे में बैठा ख़रबूज़े देख रहा है.

मैंने अपने दोस्त से कहा “ख़रबूज़ा ख़रबूज़े को देख कर रंग पकड़ता है. आप ने अभी तक ये निसवारी रंग नहीं पकड़ा.”

उस ने कहा “हटाओ जी… ये सब बकवास है.”

हम वहां से उठ कर तांगे में बैठे. मेरे दोस्त को क़रीब ही एक कैमिस्ट के पास जाना था. वहां दस मिनट लगे. बाहर निकले तो देखा कि निसवारी बुर्क़ा उसी तांगे में बैठा जा रहा था.

मेरे दोस्त को बड़ी हैरत हुई “ये क्या बात है? ये औरत क्यों बेकार घूम रही है?”

मैंने कहा “कोई न कोई बात तो ज़रूर होगी.”

हमारा तांगा हाल रोड को मुड़ने ही वाला था कि वो निसवारी बुर्क़ा फिर नज़र आया. मेरे दोस्त यद्यपि कुंवारे हैं, लेकिन बड़े ज़ाहिद. उन को जाने क्यों उकसाहट पैदा हुई कि उस निसवारी बुर्के से बड़ी बुलंद आवाज़ में कहा. “आप क्यों आवारा फिर रही हैं– आइए हमारे साथ.”

उसके तांगे ने फ़ौरन रुख़ बदला और मेरा दोस्त सख़्त परेशान हो गया. जब वो निसवारी बुर्क़ा हम-कलाम हुआ तो उसने उससे कहा “आप को तांगे में आवारागर्दी करने की क्या ज़रूरत है. मैं आपसे शादी करने के लिए तैय्यार हूं.”

मेरे दोस्त ने उस निसवारी बुर्के से शादी कर ली.

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Author: Jagran Times

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