सुपरिचित कवयित्री कात्यायनी की लोकप्रिय कविता ‘हॉकी खेलती लड़कियां’

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कवयित्री, लेखक, एक्टिविस्ट और प्रकाशक के तौर पर काम करते हुए कात्यायनी ने थोड़े समय पत्रकारिता भी की और फिर पूरी तरह स्वतंत्र लेखन की ओर रुख कर लिया. सांस्कृतिक-राजनीतिक और नारी मोर्चों पर उनकी सक्रियता हमेशा से रही है. कात्यायनी की कविताएं हिंदी की अधिकांश पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं. उनकी कई कविताओं को अंग्रेज़ी, पंजाबी और मराठी में अनूदित और प्रकाशित भी किया गया है. पाश के लोकप्रिय काव्य-संकलन ‘लहू है कि तब भी गाता है’ का संपादन कात्यायनी द्वारा ही किया गया है.

साल 1994 में प्रकाशित कात्यायनी के पहले कविता संग्रह ‘सात भाइयों के बीच चम्पा’ ने हिंदी में एक ऐसी कविता की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य घोषित नारीवाद और नारीत्ववाद दोनों से कुछ अलग या फिर दोनों को शामिल करते हुए एक ऐसे विमर्श को बताना था, जिसमें समाज के बीच संघर्ष करती स्त्री दिखती है. इस संग्रह की कविताओं में सिर्फ स्त्री जीवन के रूपक और प्रतीक ही नहीं हैं, बल्कि उनका ग़ैर मिथकीकरण भी है. स्त्रीयों के बंधनों और आज़ादी पर कात्यायनी का लेखन उस समय में साहसिक प्रयास था, जिस समय में इस तरह की कविताएं नहीं लिखी जा रही थीं. उसके बाद तो ऐसी कविताओं की बाढ़ सी आ गई, जिसकी प्रेरणा शायद कात्यायनी की कविताओं से ही मिली होगी.

‘हॉकी खेलती लड़कियां’ कात्यायनी की लंबी कविताओं में से एक कविता है, जिसे उन्होंने लड़कियों पर लिखा है. लंबी होने के बावजूद कविता अपनी किसी भी पंक्ति में न तो गैर-ज़रूरी लगती है, न ही किसी को धिक्कारती हुई प्रतीत होती है और न ही उबाऊ होती है. शुरू से लेकर खत्म होने तक पूरी कविता एक कहानी की तरह अपना प्रभाव छोड़ती है और इसे पढ़ते हुए मस्तिष्क में सबकुछ चित्र की तरह उभरता है. कविता में हॉकी खेलने को संबोधन के तौर पर भी लिया जा सकता है, जिसका अर्थ बदलते वक्त के साथ औरत की स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता के बीच भी समाज को एक तरफ न रख पाने की छटपटाहट है. क्योंकि ये सच है, औरत चाहे कुछ भी कर ले, अपनी ज़िम्मेदारियों और दुनिया-समाज के बनाए रिश्ते-नातों को उसे हमेशा साथ लेकर चलना पड़ता है. ऐसा नहीं करेगी, तो गैरज़िम्मेदार घोषित कर दी जाएगी, फिर वो हवाई जहाज चलाए, किसी दफ्तर में बाबू हो जाए या फिर हॉकी ही क्यों न खेले…

कविता ‘हॉकी खेलती लड़कियां’ कात्यायनी के कविता-संग्रह ‘सात भाइयों के बीच चम्पा’ से ली गई है. इस संग्रह को ‘परिकल्पना प्रकाशन’ ने साल 2019 में प्रकाशित किया. ये किताब सबसे पहले 1994 में ‘वाणी प्रकाशन’ से भी आ चुकी है, जो कात्यायनी का पहला कविता-संग्रह है. आइए पढ़ते हैं पूरी कविता-

हॉकी खेलती लड़कियां : कात्यायनी
आज शुक्रवार का दिन है
और इस छोटे से शहर की ये लड़कियां
खेल रही हैं हॉकी.
खुश हैं लड़कियां
फिलहाल
खेल रही हैं हॉकी
कोई डर नहीं.

बॉल के साथ दौड़ती हुई
हाथों में साधे स्टिक
वे हरी घास पर तैरती हैं
चूल्हे की आंच से
मूसल की धमक से
दौड़ती हुई
बहुत दूर आ जाती हैं.

वहां इन्तज़ार कर रहे हैं
उन्हें देखने आए हुए वर पक्ष के लोग
वहां अम्मा बैठी राह तकती है
कि बेटियां आएं तो
सन्तोषी माता की कथा सुनाएं
और
वे अपना व्रत तोड़ें.

वहां बाबूजी प्रतीक्षा कर रहे हैं
दफ़्तर से लौटकर
पकौड़ी और चाय की
वहां भाई घूम-घूम कर लौट आ रहा है
चौराहे से
जहां खड़े हैं मुहल्ले के शोहदे
रोज़ की तरह
लड़कियां हैं कि हॉकी खेल रही हैं.

लड़कियां
पेनाल्टी कार्नर मार रही हैं
लड़कियां
पास दे रही हैं
लड़कियां
‘गो…ल- गो…ल’ चिल्लाती हुई
बीच मैदान की ओर भाग रही हैं.
लड़कियां
एक-दूसरे पर ढह रही हैं
एक-दूसरे को चूम रही हैं
और हंस रही हैं.

लड़कियां फाउल खेल रही हैं
लड़कियों को चेतावनी दी जा रही है
और वे हंस रही हैं
कि यह ज़िन्दगी नहीं है
— इस बात से निश्चिंत हैं लड़कियां
हंस रही हैं
रेफ़री की चेतावनी पर.

लड़कियां
बारिश के बाद की
नम घास पर फिसल रही हैं
और गिर रही हैं
और उठ रही हैं

वे लहरा रही हैं
चमक रही हैं
और मैदान के अलग-अलग मोर्चों में
रह-रहकर उमड़-घुमड़ रही हैं.

वे चीख़ रही हैं
सीटी मार रही हैं
और बिना रुके भाग रही हैं
एक छोर से दूसरे छोर तक.

उनकी पुष्ट टांगें चमक रही हैं
नृत्य की लयबद्ध गति के साथ
और लड़कियां हैं कि निर्द्वन्द्व निश्चिन्त हैं
बिना यह सोचे कि
मुंह दिखाई की रस्म करते समय
सास क्या सोचेगी.

इसी तरह खेलती रहती लड़कियां
निस्संकोच-निर्भीक
दौड़ती-भागती और हंसती रहतीं
इसी तरह
और हम देखते रहते उन्हें.

पर शाम है कि होगी ही
रेफ़री है कि बाज नहीं आएगा
सीटी बजाने से
और स्टिक लटकाए हाथों में
एक भीषण जंग से निपटने की
तैयारी करती लड़कियां लौटेंगी घर.

अगर ऐसा न हो तो
समय रुक जाएगा
इन्द्र-मरुत-वरुण सब कुपित हो जाएंगे
वज्रपात हो जाएगा, चक्रवात आ जाएगा
घर पर बैठे
देखने आए वर पक्ष के लोग
पैर पटकते चले जाएंगे
बाबूजी घुस आएंगे गरज़ते हुए मैदान में
भाई दौड़ता हुआ आएगा
और झोंट पकड़कर घसीट ले जाएगा
अम्मा कोसेगी —
‘किस घड़ी में पैदा किया था
ऐसी कुलच्छनी बेटी को !’
बाबूजी चीख़ेंगे —
‘सब तुम्हारा बिगाड़ा हुआ है !’
घर फिर एक अंधेरे में डूब जाएगा
सब सो जाएंगे
लड़कियां घूरेंगी अंधेरे में
खटिया पर चित्त लेटी हुईं
अम्मा की लम्बी सांसें सुनतीं
इन्तज़ार करती हुईं
कि अभी वे आकर उनका सिर सहलाएंगी
सो जाएंगी लड़कियां
सपने में दौड़ती हुई बॉल के पीछे
स्टिक को साधे हुए हाथों में
पृथ्वी के छोर पर पहुंच जाएंगी
और ‘गोल-गोल’ चिल्लाती हुईं
एक दूसरे को चूमती हुईं
लिपटकर धरती पर गिर जाएंगी !

Tags: Book, Hindi Literature, Hindi poetry, Hindi Writer, Literature

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Up Head Line
Author: Up Head Line

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