अपनों को याद करने का तरीका और सलीका ‘उजाले उनकी यादों के’

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”अब जब सब मराहिल से पीछे छूट गए हैं. उनकी याद में ‘स्मृति ग्रंथ’ तक छप चुका है. उनकी खुदमिजाजी और खुशमिजाजी के करीब रहे दोस्त उनकी गीतमालाओं के पुष्प स्मृतियों के वरकों पर बिखरा कर, लौट गए हैं. नवगीतों के उस वलीअहद की छन्दस-रचनाओं की बानगी के बिंब ही मेरी शेष-पूंजी हैं.”

ये वो पंक्तियां हैं, जिन्हें पढ़ते हुए आप संस्मरण विधा की नई रचना ‘उजाले उनकी यादों के’ साथ खुद को जोड़ लेते हैं. हालांकि, किताब के दर्जनों पन्ने पलट जाने या पढ़ जाने के बाद आपका साक्षात्कार उक्त पंक्तियों से होता है और ऐसे तमाम पैरा आपकी नजरों से गुजर चुके होते हैं, लेकिन प्रताप सिंह की शैली आपको मुग्ध किए रहती है. ‘उजाले उनकी यादों के’ किसी एक व्यक्ति पर केंद्रित हो सकती है, किसी एक विशिष्ट गुण को लक्ष्य कर पूरी की जा सकती थी, संस्मरणों की अनगिनत शृंखलाओं से खुद को जोड़ते हुए पाठक को संतुष्ट कर सकती थी, लेकिन ऐसा अनुभव आपको पूरी किताब में कहीं नहीं मिलता. यही इसकी खूबसूरती है.

आप आवाज की मल्लिका रेशमा से मिलते हैं, पत्रकारिता के प्रखर-पुरुष प्रभाष जोशी के साथ बिताए गए दिनों में खो जाते हैं, डॉ. कृष्णदत्त पालीवाल की रचनाधर्मिता से साक्षात्कार करते हैं, फिर सूरज घई, विष्णु खरे, जगदीश चंद्र, राजेंद्र पांडे जैसे कई जाने-पहचाने चेहरों से मिलते-मिलाते हुए आखिर में प्रताप सिंह आपको मेलविल डि-मेलो पर लाकर दम लेते हैं. आदि से अंत तक आपको यह किताब बांधे रखती है. इस दौरान आप एक व्यक्ति के जीवन-चर्या से साम्य स्थापित कर चुके होते हैं. ‘उजाले उनकी यादों के’ कथात्मक नहीं है, इसमें कहानियां रची-बसी हैं. यह किसी की या बहुतों की जीवनी-नुमा प्रस्तुति नहीं है, शख्सियतों के साथ बिताए पलों का दस्तावेज है.

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इन्हीं दस्तावेजों में छोटे-छोटे रोचक संस्मरण पिरोए गए हैं, जो पाठक की जिज्ञासा बनाए रखते हैं. लोक गायिका और हिंदी फिल्मों में पार्श्वगायन से मशहूर हुईं रेशमा को याद करते हुए लेखक राजस्थान से लेकर अफगानिस्तान तक के उनके सफर को रेखांकित करते हैं. रेशमा के संघर्ष, उनकी गायकी, लोक गायन में उनकी सिद्धहस्तता, सब कुछ. मास्टर चंदगीराम की कहानी सुनाने के दौरान पुरुषप्रधान कुश्ती के खेल में बेटियों के प्रवेश की हिम्मतभरी पहल बयां कर जाते हैं. उत्तराखंड के पंडित खिमानंद शर्मा (जिन्हें लोग क्षितिज शर्मा के नाम से जानते-पहचानते हैं) की जिंदगी की परतें दिखाते हुए, प्रताप सिंह हमें प्रभाष जोशी के पत्रकारिता संसार से रूबरू कराते हैं. इन सभी संस्मरणों में लेखक इस बात का बारीकी से ध्यान रखते हैं कि पाठक उनकी स्मृतियों से बाबस्ता होता रहे, उससे कभी बिछड़े नहीं. इसलिए जब आप ‘उजाले उनकी यादों के’ के आखिरी पाठ तक आते-आते मेलविल डि-मेलो तक पहुंचते हैं, तो आपको रेडियो-जगत के बेमिसाल शख्स के बारे में जानने-समझने को बहुत कुछ मिल जाता है.

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प्रताप सिंह की कलम का स्वाद जिन पाठकों ने ‘इन जैसा कोई दूसरा नहीं’ में लिया होगा, उन्हें यह बताने की जरूरत नहीं कि लेखक को घटनाओं, शख्सियतों और उनसे जुड़े संस्मरणों को बखूबी कलमबद्ध करने में महारथ हासिल है. इसलिए सिंह की नई रचना ‘उजाले…’ को पढ़ते हुए एक बार फिर आप इसी लेखन शैली का लुत्फ उठा सकते हैं. ‘उजाले उनकी यादों के’ का अद्भुत शिल्प, भाषाई कौशल और कहन, इसे स्पेशल बना देता है. प्रताप सिंह की यह प्रयोगात्मक प्रस्तुति उनकी पहली रचना है. इस रचना की सबसे खास बात जो आपको आकर्षित करती है, वह है इसकी भाषा. हालांकि कई बार कई मुहावरे और कुछ कठिन शब्द पढ़ते हुए बाधक बनते हैं, लेकिन रोचक प्रसंग इस कठिनाई से आपको उबार ले जाते हैं. हिंदी और उर्दू मिश्रित भाषाई प्रवाह को पहले पन्ने से आखिरी पन्ने तक प्रताप सिंह ने बरकरार रखा है.

पुस्तक – उजाले उनकी यादों के
लेखक – प्रताप सिंह
प्रकाशक – विजया बुक्स

Tags: Hindi Literature

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Up Head Line
Author: Up Head Line

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