
शहीद रामप्रसाद बिस्मिल बेहतरीन क्रांतिकारी और स्वतंत्रता आंदोलन के अग्रणी नेता व संगठनकर्ता ही नहीं थे, वे बेहतरीन इंसान भी थे. वे बेजोड़ कवि, लेखक व अनुवादक भी थे. मैनपुरी षड्यंत्र और काकोरी कांड के बाद जब उन्हें 30 वर्ष की उम्र में फांसी की सजा सुना दी गई थी. अपनी शहादत के ठीक पहले क्रांतिवीर रामप्रसाद बिस्मिल ने जेल में अत्यंत कठिन परिस्थितियों में अपनी आत्मकथा लिखी. रामप्रसाद बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा गोरखपुर जेल में 19 दिसंबर 1927 को हुई अपनी फांसी से दो दिन पहले पूरी की. बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा ए 4 आकार के कागजों पर पेंसिल से लिखकर तीन खेप में किसी तरह गुप्त रूप से गोरखपुर के सुप्रसिद्ध कांग्रेसी नेता दशरथ प्रसाद द्विवेदी को भिजवाई थी. अंतिम खेप तो फांसी से ठीक एक दिन पहले ही पहुंची थी. दशरथ द्विवेदी ने यह मूल आत्मकथा गणेश शंकर विद्यार्थी को दिया था. विद्यार्थी ने इस आत्मकथा को ‘काकोरी के शहीद’ नामक पुस्तक के रूप में प्रकाशित करवाया था.
11 जून 1897 को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में जन्मे बिस्मिल की आत्मकथा ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है. इसमें रामप्रसाद बिस्मिल ने अपने पारिवारिक जीवन उसकी गरीबी, जीवनयापन के कष्ट, देशप्रेम व बलिदान की भावना तथा आम आदमी के सुख और दु:खों को बताया है. इसमें देश के क्रांतिकारी आंदोलन, उसकी विचारधारा, शक्ति और कमजोरियों का भी वर्णन है. खासबात यह है कि बिस्मिल जैसे क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश पुलिस नहीं अपनों की दगाबाजी से खामियाजा भोगा है. जिन्हें अपना मित्र और भाई माना, जिनके लिए अपना सबकुछ लूटा दिया, जिनके लिए अपनी जान की बाजी लगा दी, वे ही लोग गवाही से पलट गए. रामप्रसाद बिस्मिल को पहचानने से ही इंकार नहीं किया बल्कि उनके खिलाफ झूठी गवाही तक दी. एक ने तो यह तक कह दिया कि बिस्मिल डकैती के धन से अपने परिवार का जीवनयापन करते हैं. साथी के इस बयान से बिस्मिल के दिल को गहरी ठेस लगी थी.
बिस्मिल की आत्मकथा में लिखा है कि काकोरी कांड के बाद छत्तीस व्यक्ति गिरफ्तार हुए थे. अट्ठाईस पर मजिस्ट्रेट की अदालत में मुकदमा चला. तीन व्यक्ति शचींद्रनाथ बख्शी, चंद्रशेखर आजाद और अशफाकउल्ला खां फरार रहे. बाकी सब मुकदमा अदालत में आने से पहले छोड़ दिए गए. अट्ठाईस में दो पर से मजिस्ट्रेट की अदालत में मुकदमा उठा लिया गया. दो को सरकारी गवाह बनाकर उन्हें माफी दी गई. इस मामले में अपनों की बेरूखी और दगाबाजी ने रामप्रसाद बिस्मिल को आहत किया था. अपनी पीड़ा को बिस्मिल ने कुछ यूं व्यक्त किया है:
बनवारीलाल इकबाली मुलजिम हो गए. वे रायबरेली जिला कांग्रेस कमेटी के मंत्री भी रह चुके थे. उन्होंने असहयोग आंदोलन में छह मास का कारावास भी भोगा था. पुलिस की धमकी से प्राण संकट में देख कर वे समर्पण कर गए. बनवारी लाल ही ऐसे सदस्य थे कि जिन पर समिति का सबसे अधिक धन व्यय किया गया. प्रत्येक माह आपको पर्याप्त धन भेजा जाता था. मर्यादा की रक्षा के लिए सभी साथी बनवारीलाल को मासिक शुल्क दिया करते थे. अपने पेट काटकर इनको मासिक व्यय दिया गया. फिर भी इन्होंने अपने सहायकों की गर्दन पर छुरी चलाई.
बिस्मिल का मानना था कि बनवारीलाल के विरूद्ध जितने सबूत थे उन आधार पर उन्हें अधिक-से-अधिक दस वर्ष की सजा हो जाती लेकिन वे डर गए और पुलिस के बहकावे पर सेशन कोर्ट में बयान दिया कि रामप्रसाद बिस्मिल डकैती के पैसों से अपने परिवार का निर्वाह करता है. इस बात को सुनकर बिस्मिल को हँसी जरूर आई मगर उनके हृदय को बड़ा आघात लगा कि जिनका पेट भरने के लिए अपने प्राणों को संकट में डाला, दिनों को दिन और रात को रात न समझा, बुरी तरह से मार खाई, माता-पिता का कुछ भी ख्याल न किया, वही इस प्रकार आरोप लगा रहा है.
अन्य लोगों के व्यवहार से भी बिस्मिल को पीड़ा हुई. वे लिखते हें, एक ठाकुर साहब के पास काकोरी डकैती का नोट मिल गया था. वह कहीं शहर में पा गए थे. जब गिरफ्तारी हुई, मजिस्ट्रेट के यहां जमानत नामंजूर हुई, जज साहब ने चार हजार रूपए की जमानत मांगी. कोई जमानत देने वाला नहीं मिला. उनके वृद्ध भाई बिस्मिल के पास पहुंचे और पैरों पर सिर रखकर रोने लगे. बिस्मिल ने जमानत करवाने की कोशिश की. उनके माता-पिता कोर्ट में खुल कर जाने के पक्ष में नहीं थे. उन्हें डर था कि पुलिस रामप्रसाद बिस्मिल के खिलाफ हो जाएगी. लेकिन रामप्रसाद ने किसी की एक न सुनी. कचहरी जाकर जमानत करवाई. जेल जा कर स्वयं उन्हें छुड़वा कर लाए. जब बिस्मिल ने गवाही के लिए उन ठाकुर साहब का नाम दिया तो उन्होंने पुलिस को तीन बार लिखकर दे दिया कि हम रामप्रसाद को जानते भी नहीं हैं.
बिस्मिल ने लिखा है कि हिंदू-मुस्लिम झगड़े में जिनके घरों की रक्षा की थी, जिनके बाल-बच्चे मेरे सहारे मोहल्ले में निर्भयता से निवास करते रहे, उन्होंने ही मेरे खिलाफ झूठी गवाहियां बनवाकर भेजीं. कुछ मित्रों के भरोसे पर उनका नाम गवाही में दिया कि जरूर गवाही देंगे. संसार लौट जाए पर वे डिग नहीं सकते. पर वचन दे चुकने पर भी जब पुलिस का दबाव पड़ा, वे ही गवाही देने से इनकार कर गए. जिनको अपना हृदय, सहोदर तथा मित्र समझ कर हर तरह की सेवा करने को तैयार रहता था, जिस प्रकार की आवश्यकता होती यथाशक्ति उनको पूर्ण करने की कोशिश करता था, उनसे इतना भी न हुआ कि कभी जेल पर आकर मिल जाएं, फांसी की कोठरी में ही आकर संतोषदायक दो बातें कर जाएं लेकिन कोई आया ही नहीं. यह सब इसलिए कि पुलिस का आतंक छाया हुआ था कि गिरफ्तार न कर लिए जाएं.
अपनों के इस बर्ताव से स्वाभाविक है कोई भी इंसान आहत होता फिर बिस्मिल तो बेहद संवेदनशील इंसान थे. उन्हें भी कष्ट हुआ लेकिन इस व्यवहार के लिए उन्होंने लोगों को माफ ही किया. वे लिखते हैं, इस पर भी जिसने भी जो कुछ किया मैं उसी को अपना सौभाग्य समझता हूं और उनका आभारी हूं.
वह फूल चढ़ाते हैं, तुर्बत (कब्र) भी दबी जाती,
माशूक के थोड़े से भी अहसान बहुत हैं.
परमात्मा से यही प्रार्थना है कि सब प्रसन्न तथा सुखी रहें. मैंने तो सब बातों को जानकर ही इस मार्ग पर पैर रखा था. मुकदमे के पहले संसार का कोई अनुभव ही न था. न कभी जेल देखी न किसी अदालत का कोई तजुर्बा (अनुभव) था. जेल में जाकर मालूम हुआ कि किसी नई दुनिया में पहुंच गया.
असल में, यदि साथी लोग ही दगा नहीं करते और पुलिस को जानकारी नहीं देते तो मैनपुरी षड्यंत्र के बारे में पुलिस कुछ पता नहीं लगा पाती. वास्तव में पुलिस को भाग्य से कुछ ऐसे लोग हाथ लग गए जो डर गए और जिन्होंने ही पुलिस को सारा भेद बता दिया. बिस्मिल लिखते हैं कि उक्त महाशय की ओर तो ध्यान भी न जा सकता था पर गिरफ्तारी के समय पुलिस अफसर ने बिस्मिल को कुछ ऐसी बातें बताईं जो बिस्मिल और उन महाशय के अलावा कोई और जानता नहीं था. यदि ये साथी पुलिस के हाथ न आताऔर भेद न खोल देता तो पुलिस सिर पटक कर रह जाती, कुछ भी पता न चलता. इस तरह बिस्मिल अपने ही साथियों की दगाबाजी का दु:ख झेलते हुए हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ गए.
.
Tags: Freedom fighters, Freedom Struggle, Ram Prasad Bismil
FIRST PUBLISHED : June 11, 2023, 19:20 IST








