
ब्लैक होल ब्रह्माण्ड के सबसे रहस्यमयी पिंड होते हैं जिनके बारे में आज भी कई लोगों को कम जानकारी है. प्रचलित धारणाओं के मुताबिक ये बहुत बड़े आकार के होते हैं लेकिन सच तो यह है कि इनमें से अधिकांश पिंडों का आकार छोटा और चुस्त किस्म का होता है. माना जाता है कि ये प्रकाश तक को खींचने की क्षमता रखते हैं लेकिन फिर भी इनसे विकिरण होता रहता है. ऐसी ही एक धारणा यह है कि इनका निर्माण तारों के मरने के बाद होता है. इस प्रचलित मत के बाद एक सवाल बहुत ही वाजिब और जायज है कि क्या ब्लैक का निर्माण तारों के बनने के पहले भी होता होगा? इस सवाल का जवाब प्राइमोर्डियल ब्लैक होल या पीबीएच हैं.
ब्लैक होल बनने की प्रचलित धारणा
ब्लैक होल के निर्माण की सबसे प्रचलित धारणा यही है कि वे तब बनते हैं जब कि विशालकाय तारो का क्रोड़ खत्म होकर गुरुत्वाकर्षण की अस्थिरता के कारण सिकुड़ने लगता है, जिससे तारे में विस्फोट होता है जिसे सुपरनोवा कहते हैं इसके नतीजे में एक प्रकार का ब्लैकबोल बनता है जिसे तारकीय ब्लैक होल कहते हैं.
ब्लैक बनने के कई तरीके
लेकिन इनके अलावा भी एक प्रकार के ब्लैक होल होते हैं जिन्हें सुपरमासिव ब्लैक होल कहते हैं, जो गैलेक्सी के केंद्र में पाए जाते हैं. इनका निर्माण कैसे होता है इसकी पुष्टि नहीं हुई है. लेकिन वैज्ञानिकों का अनुमान है कि ये गैलेक्सी के साथ ही बने होंगे. लेकिन वैज्ञानिकों का मानाना है कि सैद्धांतिक तौर पर और भी तरीके हो सकते हैं जिनसे ब्लैक होल का निर्माण हो सकता है. इनमें से एक है प्राइमोर्डिल ब्लैक होल.
ब्लैक होल बनने की शर्त और पीबीएच की संभावना
प्राइमोर्डियल ब्लैक होल ही वे ब्लैक हैं जो ब्रह्माण्ड के निर्माण के समय तारों के बनने से भी पहले बने होंगे. तारकीय ब्लैक होल के निर्माण के दौरान तारे का क्रोड़ संकुचित होता है तो एक सीमा से ज्यादा संकुचित होने के बाद भी वह संकुचन रुकता नहीं है. इस सीमा को टोलामन ओपनहाइमर- वोलकोफलिमिट कहते हैं. यानि ब्लैक होल बनने के लिए अंतरिक्ष में एक आयतन के अंदर पदार्थ की मात्रा एक निश्चित मान से ज्यादा होना जरूरी है. तारों के क्रोड़ के अलावा भी कई जगहें ऐसी हो सकती हैं. यहीं पीबीएच की संभावना पैदा होती है









