
हबीब तनवीर ने अपना पहला लिखा नुक्कड़ नाटक ‘शांतिदूत कामगार’ का प्रदर्शन मुंबई में किया और वहां रहते हुए कई पत्र-पत्रिकाओं का संपादन भी किया. मुंबई में दिल बहुत ज्यादा लगा नहीं, इसलिए वे दिल्ली आ गए और एक स्कूल में नाटक पढ़ाने का काम करने लगे. यहीं उन्होंने अपना प्रसिद्ध नाटक ‘आगरा बाज़ार’ लिखा, जिसका पहला मंचन दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया में हुआ और फिर उन्होंने ‘शतरंज के मोहरे’ का भी निर्देशन किया. साल 1954 में तनवीर अभिनय की बारीकियां सीखने के लिए लंदन चले गए, जहां उन्होंने निर्देशन भी सीखा और भारत लौटने के बाद हिंदुस्तान थिएटर के साथ मिलकर काम करना शुरू कर दिया. हिंदुस्तान थिएटर को अलविदा कहने के बाद छत्तीसगढ़ में अपना थिएटर ग्रुप बनाया, जिससे लोक कलाकार जुड़ने लगे. दिलचस्प बात ये है, कि इन लोक कलाकारों को महीने की तन्ख्वाह भी दी जाती थी.
तनवीर ने अपनी नाटक मंडली के साथ दुनिया भर में थिएटर किया और अपना संपूर्ण जीवन रंगमंचों को समर्पित कर दिया. अपने मंचन के द्वारा हबीब तनवीर ने छत्तीसगढ़ का नाम पूरी दुनिया में फैलाया. उनकी नाट्य प्रस्तुतियों में लोकगीतों, लोक धुनों, लोक संगीत व नृत्य का सुन्दर प्रयोग देखने को मिला. उन्होंने कई सालों तक देश भर के ग्रामीण अंचलों में घूम-घूम कर लोक संस्कृति व लोक नाट्य शैलियों का गहन अध्ययन किया और साथ ही लोक गीतों का संकलन भी किया.
साल 1969 में हबीब तनवीर को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया. 1983 में उन्हें पद्मश्री से भी नवाज़ा गया. उनका नाटक ‘चरणदास चोर’ एडिनबर्ग में पुरस्कृत होने वाला पहला भारतीय नाटक था. कालिदास सम्मान के साथ-साथ तनवीर को पद्मभूषण सम्मान भी दिया गया. इन प्रतिष्ठित पुरस्कारों ने कला के प्रति उनके अटूट समर्पण को मान्यता प्रदान की. उनके शब्दों, नाटकों व कविताओं में जीवन की गहराई थी, जो सामाजिक मुद्दों पर गहरी चोट करती है. 8 जून साल 2009 को भोपाल में उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया.
हबीब तनवीर की कला और साहित्यिक विरासत हमेशा जीवित रहेगी, और आगे आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरित करती रहेगी. उन्होंने 100 से अधिक नाटकों का मंचन किया. उनका कला जीवन बहुआयामी था. उन्होंने फिल्मों व नाटकों की समीक्षाएं भी लिखीं. वे जितने अच्छे अभिनेता, निर्देशक व नाट्य लेखक थे, उतने ही श्रेष्ठ गीतकार, गायक, संगीतकार और कवि भी थे. आइए पढ़ते हैं, भारतीय रंगमंच के इस महानायक की कुछ चुनिंदा गज़लें…
1)
बे-महल है गुफ़्तुगू हैं बे-असर अशआर अभी
बे-महल है गुफ़्तुगू हैं बे-असर अशआर अभी
ज़िंदगी बे-लुत्फ़ है ना-पुख़्ता हैं अफ़्कार अभी
पूछते रहते हैं ग़ैरों से अभी तक मेरा हाल
आप तक पहुंचे नहीं शायद मिरे अशआर अभी
ज़िंदगी गुज़री अभी इस आग के गिर्दाब में
दिल से क्यूं जाने लगी हिर्स-ए-लब-ओ-रुख़्सार अभी
हां ये सच है सर-ब-सर खोए गए हैं अक़्ल-ओ-होश
दिल में धड़कन है अभी दिल तो है ख़ुद-मुख़्तार अभी
क्यूं न कर लूं और अभी सैर-ए-बहार-लाला-ज़ार
मैं नहीं महसूस करता हूं नहीफ़-ओ-ज़ार अभी
2)
ख़लिश-ओ-सोज़ दिल-फ़िगार ही दी
ख़लिश-ओ-सोज़ दिल-फ़िगार ही दी
दिल में शमशीर आब-दार ही दी
बेवफ़ा से मुआमले के लिए
इक तबीअत वफ़ा-शिआर ही दी
कैफ़ियत दिल की ब्यान करने को
एक आवाज़ दिल-फ़िगार ही दी
ख़ार को तो ज़बान-ए-गुल बख़्शी
गुल को लेकिन ज़बान-ए-ख़ार ही दी
दिल शब-ए-ज़िंदा-दार हम को दिया
हुस्न को चश्म-ए-पुर-ख़ुमार ही दी
ख़ुद रक़ीबों के वास्ते मैं ने
ज़ुल्फ़ माशूक़ की संवार ही दी
क्या नशेब-ओ-फ़राज़ थी ‘तनवीर’
ज़िंदगी आप ने गुज़ार ही दी
3)
मैं नहीं जा पाऊंगा यारो सू-ए-गुलज़ार अभी
मैं नहीं जा पाऊंगा यारो सू-ए-गुलज़ार अभी
देखनी है आब-जू-ए-ज़ीस्त की रफ़्तार अभी
कर चुका हूं पार ये दरिया न जाने कितनी बार
पार ये दरिया करूंगा और कितनी बार अभी
घूम फिर कर दश्त-ओ-सहरा फिर वहीं ले आए पांव
दिल नहीं है शायद इस नज़्ज़ारे से बे-ज़ार अभी
काविश-ए-पैहम अभी ये सिलसिला रुकने न पाए
जान अभी आंखों में है और पांव में रफ़्तार अभी
ऐ मिरे अरमान-ए-दिल बस इक ज़रा कुछ और सब्र
रात अभी कटने को है मिलने को भी है यार अभी
जज़्बा-ए-दिल देखना भटका न देना राह से
मुंतज़िर होगा मिरा भी ख़ुद मिरा दिल-दार अभी
होंगी तो इस रह-गुज़र में भी कमीं-गाहें हज़ार
फिर भी ये बार-ए-सफ़र क्यूं हो मुझे दुश्वार अभी
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Tags: Hindi Literature, Hindi poetry, Hindi Writer, Literature
FIRST PUBLISHED : June 08, 2023, 17:35 IST








