
विजय राठौड़ / ग्वालियर. क्रिकेट के कई सारे स्वरूपों में एक नया स्वरूप जोड़ने का श्रेय अगर किसी शख्स को जाता है तो वह है स्क्वाड्रन लीडर अभय प्रताप सिंह. वह वर्तमान में व्हीलचेयर क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष के साथ इसके फाउंडर भी है. तो आइए जानते हैं किस तरह से की उन्होंने अपने इस सफर की शुरुआत.
सड़क हादसे में गवाएं पैर पर हार नहीं मानी
स्क्वाड्रन लीडर अभय प्रताप सिंह (सेवा.) ने बताया कि साल 2007 में एक सड़क हादसे ने उन्हें दिव्यांगता की दहलीज पर लाकर खड़ा कर दिया था. जिसके बाद भी वह वायु सेना में किसी न किसी तरह सक्रिय रहे. उसके बाद साल 2009 में उन्होंने वायु सेना से विदा ले ली, और फिर व्यवसाय की राह पकड़ी. लेकिन इस दौरान कहीं ना कहीं मन में कुछ करने की ललक सदैव बनी रहती थी. क्योंकि जिस व्यक्ति ने आसमान की बुलंदियों को छुआ हो और अब जमीन पर भी चलने में असमर्थ हो गया हो, तो मन में कसक बाकी थी. लेकिन उन्होंने अपनी इस उदासी को सकारात्मक सोच में परवर्तित करते हुए कुछ करने की ठानी और सोचा कि क्यों ना इस व्हिलचेयर से भी क्रिकेट को खेला जा सकता है. उसके बाद फिर उन्होंने उन खिलाड़ियों का चयन किया, जिनमें खेल के प्रति अनूठी निष्ठा और गहरी भावना थी. और देश के चुनिंदा शहरों से ऐसे मोती छाटे, जिनमें क्रिकेट के प्रति काफी लगाव था और उन मोतियों से अपनी माला तैयार कर इंडियन क्रिकेट टीम बना डाली और टीम भी ऐसी बनाई जिसने आज तक देश के बाहर कभी भी हार का मुंह तक नहीं देखा.
परेशानियों में भी हमें बढ़ते रहना चाहिए
अभय प्रताप सिंह ने बताया कि दिव्यांगों के लिए कभी भी कोई चीज सुगम नहीं थी. और ना आज है और परेशानियां तो चलती रहती हैं. लेकिन हमें अपने दृढ़ निश्चय पर अडिग रहना चाहिए. फिर चाहे कैसे भी परेशानी क्यों ना हो आप उस पर जीत ही लेते हैं. उन्होंने बताया कि शुरुआत में तो काफी मुसीबतों का सामना करना पड़ता था. क्योंकि टीम को लाने और ले जाने में काफी परेशानियां होती थी. ट्रैवलिंग में काफी समस्या होती थी इतना ही नहीं कई बार लोगों को भयंकर चोट भी लग जाती थी. सबसे बड़ी दिक्कत ग्राउंड मिलने में होती थी. क्योंकि अक्सर लोग यह कहकर मना कर देते थे कि व्हीलचेयर से ग्राउंड खराब हो जाएगा.
खिलाड़ियों को इकठ्ठा करना बनी बड़ी चुनौती
उन्होेंने ने बताया कि खिलाड़ियों को इकट्ठा करना उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती थी. क्योंकि अधिकांश समय में खिलाड़ियों के पेरेंट्स ही मना कर देते थे. कि आखिर जाना ही क्यों है. वैसे ही व्हीलचेयर पर हो और कोई दिक्कत हो जाएगी, तो क्या होगा. किसी को बुलाने के लिए भी समस्या होती थी लेकिन इस दौरान सोशल मीडिया एक बड़ा सहयोगी बनकर सामने आई और सूचनाओं का आदान-प्रदान भी तेजी से होने लगा. जहां पहले एक टीम बनाना मुश्किल होता था आज वहां हर राज्य की अपनी टीम बनती जा रही है और यह हमारे लिए बड़ी बात है.
.
FIRST PUBLISHED : June 08, 2023, 09:53 IST








