
मो. सरफराज आलम/सहरसा. बिहार के मिथिलांचल को विद्वानों की नगरी कहा जाता है. विद्वान भी ऐसे वैसे नहीं, जगद्गुरु आदि शंकराचार्य को शास्त्रार्थ में पराजित करने वाली भी इसी मिथिलांचल की विदुषी थीं. सहरसा जिला मुख्यालय से तकरीबन 22 किलोमीटर की दूरी पर स्थित महिषी ही वह गांव है, जहां शंकराचार्य को एक महिला से पराजित होना पड़ा था. कहा जाता है कि निरंतर शास्त्रार्थ के कारण यहां के तोता और अन्य पक्षी भी शास्त्र की बातें संस्कृत में किया करते थे. संभव है कि इस कारण से ही मिथिलांचल के लोग अपने घरों में तोता पालने लगे और उन्हें भी भाषा सिखाने लगे.
आठवीं-नौवीं सदी में देशभर के साधु-संतों और विद्वानों से शास्त्रार्थ करते हुए जगद्गुरु शंकराचार्य अद्वैतवेदांत पर शास्त्रार्थ करने के किए मंडन मिश्र के गांव महिषी तक पहुंचे थे. यहां 42 दिनों तक लगातार शास्त्रार्थ चलता रहा. इस शास्त्रार्थ को लेकर दो कथाएं प्रचलित हैं. एक तो यह कि इस शास्त्रार्थ में शंकराचार्य ने मंडन मिश्र को जब पराजित कर दिया तो उनकी पत्नी भारती ने शंकराचार्य को शास्त्रार्थ की चुनौती दी और फिर उन्हें पराजित कर दिया. दूसरी यह कि अद्वैत वेदांत पर शास्त्रार्थ के लिए शंकराचार्य के महिषी पहुंचते ही भारती ने पहले उनसे ही शास्त्रार्थ कर लेने की चुनौती दी और पराजित किया.
एलन थ्रेसर ने हॉरवर्ड यूनिवर्सिटी से की थी मंडन मिश्र की कृति ब्रह्मसिद्धि पर पीएचडी
उद्भट विद्वान मंडन मिश्र और उनकी पत्नी उदय भारती के आश्रम में आए दिन बड़े-बड़े धर्माचार्य आते रहते हैं. धर्म और अधत्म पर चर्चा होते रहती है. यहां अभी मंडन मिश्र और उनकी पत्नी उदय भारती और शंकराचार्य की प्रतिमा स्थापित है. स्थानीय युवा गणेश चौधरी बताते हैं कि इस स्थल को संरक्षित करने की आवश्यकता है. सैकड़ों साल बीत जाने के बाद भी मंडन मिश्र के दर्शन पर शोध नहीं हो सका है. उनके ग्रंथों का प्रकाशन नहीं हो पाया था. एलन थ्रेसर ने 1972 में हॉरवर्ड यूनिवर्सिटी से मंडन मिश्र की कृति ब्रह्मसिद्धि पर पीएचडी की, जो बाद में मोतीलाल बनारसी दास प्रकाशन से प्रकाशित हुई. इसके बाद उनके छह ग्रंथ स्फोटसिद्धि, विधि-विवेक, भावना-विवेक, विभ्रम-विवेक और मीमांसानुक्रमिका प्रकाशित हुए.
विद्यापीठ के कुलपति थे मंडन मिश्र
महिषी में एक टीले की शक्ल के भग्नावशेष को पुरातत्व विभाग ने कागजी तौर पर अपने संरक्षण ले रखा है. इसके बारे में कहा जाता है कि यहां कभी विद्यापीठ था. जिसके कुलपति मंडन मिश्र थे. यहां ज्ञान की सभी प्रचलित धारणाओं का अध्ययन-अध्यापन होता था. बताया जाता है कि बीते वर्ष केन्द्रीय पर्यटन टीम यहां पहुंची थी और इस धाम की विकास की बातें कही थी. लेकिन ना तो आज तक इस धाम का विकास हो सका और ना ही कोई व्यवस्था की गई.
.
FIRST PUBLISHED : June 07, 2023, 15:06 IST








