संपत सरल की 5 लघु कथाएं- ‘बेटा बिजली की चोरी करता है और बाप पानी की’

Share Now:

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें


संपत सरल हिंदी के चर्चित व्यंग्यकार हैं. अपने तीखे वैचारिक व्यंग्यों के माध्यम से संपत सरल सामाजिक और राजनीतिक विसंगतियों को उजागर करते हैं. लेखन और वाचन, दोनों ही माध्यमों में हिंदी व्यंग्य को वैश्विक मंच पर पहुंचाने वाले हास्य कवि संपत सरल का नया व्यंग्य संग्रह ‘एक मंजिला मकान में लिफ्ट’ राजकमल प्रकाशन से छपकर आया है. प्रस्तुत है इस संग्रह से 5 लघु कथाएं-

सदाचार
पिता बिजली विभाग में है और पुत्र जलदाय विभाग में. दोनों ने शहर की एक कॉलोनी में बराबर ही में अपना-अपना नया मकान बनवाया है. पिता को मकान में नल कनेक्शन चाहिए और पुत्र को बिजली कनेक्शन. जबतक पिता घूस नहीं देगा, बेटा उसके यहां नल नहीं लगने देगा. जबतक बेटा घूस नहीं देगा, पिता उसके यहां बिजली कनेक्शन नहीं होने देगा.

पिता-पुत्र में जूतम-पैजार चाहे हजार होती हो, किन्तु भारतीय संस्कारों में अभी इतनी गिरावट नहीं आई है कि पिता-पुत्र ही परस्पर रिश्वत मांगने लगें. सो, बेटा बिजली की चोरी करता है और बाप पानी की.

ग्लोबलाइजेशन
महल के मुख्यद्वार की दिशा में अपार जनसमूह का शोर सुन कर राजा राम ने लक्ष्मण से प्रश्न किया, “ये कैसी आवाजें आ रही हैं अनुज? कौन लोग होंगे?”

उत्तर मिला, “भगवन, सब अयोध्यावासी ही हैं. जब से राज्य में ग्लोबलाइजेशन आया है, प्रत्येक नागरिक धनुष-बाण खरीदने को लोन लेना चाहता है, ताकि वह भी सोने का हिरण मार सके.”

सुन्दरवन में चुनाव
सुन्दरवन में लोकतंत्र था, भले ही कहने को लोकतंत्र था. आम चुनाव की घोषणा हुई. यों तो कई वन्य प्राणी चुनावी अखाड़े में थे, लेकिन मुख्य मुकाबला मुखियापद पर आसीन लकड़बग्घा तथा उसके धुर विरोधी हिरण के मध्य था. लकड़बग्घा का चुनाव चिह्न था— ‘जबड़ा’ और हिरण का— ‘आंख’. लकड़बग्घा पुनः मुखियापद पर काबिज रहने के मूड में था. उसने चुनाव प्रभारी सियार को बुलाकर पूछा, “तुझे चुनाव प्रभारी किसने बनाया था?”

सियार बुदबुदाया, “हूजूर, आप ही ने.”

लकड़बग्घा ने कहा, “तो अब तेरी जिम्मेदारी है कि सुन्दरवन में चुनाव की रस्म भी हो और फिर से मुखिया भी मैं ही चुना जाऊं.”

सियार ने शीश झुका कर आश्वस्त किया, “आप निश्चिन्त रहें मालिक.”

गरीब लोकतंत्र में खर्च कम करने के पवित्र उद्देश्य से चुनाव बजाय मतदान के पाषाण का सिक्का उछालकर कराया गया.

परिणाम घोषित हुए. लकड़बग्घा भारी मतों से विजयी हुआ. हिरण ने अपनी हार के कारणों की पड़ताल के बाद सियार से शिकायत की कि पाषाण के सिक्के के दोनों ओर ‘जबड़ा’ ही क्यों छापा गया? लेकिन लकड़बग्घा की जीत के नगाड़ों के बीच हारे हुए सियार की चीख कौन सुनता?

जागरण
उसने सादा फुलस्केप कागज पर थाना प्रभारी के नाम शिकायत लिखी और सुबह ही सुबह थाने पहुंचा.

दरअसल, आसपास ही कहीं रात नौ बजे शुरू हुआ जागरण सुबह पांच बजे तक चला और माइक की तेज आवाज ने उसे रातभर सोने नहीं दिया. उसने रात में कई बार पुलिस नियंत्रण कक्ष को वन डबल जीरो पर फोन किया, लेकिन हर बार नतीजा डबल जीरो निकला. उसने गार्ड को शिकायती पत्र दिखाते हुए थाना प्रभारी से मिलने की अनुमति मांगी.

गार्ड ने झिड़का, “बाद में आना. साहब सो रहे हैं और ग्यारहेक बजे के बाद ही उठेंगे.”

उसने झल्लाते हुए आश्चर्य प्रकट किया, “साहब सो रहे हैं और ग्यारहेक बजे के बाद ही उठेंगे?”

गार्ड बोला, “और नहीं तो क्या? साहब सुबह पांचेक बजे तो जागरण से लौटे हैं.”

हें हें हें हें
ज्योंही मुगल सम्राट जलाल-उद्दीन मोहम्मद अकबर हिन्दुस्तान के अधिकतम भूभाग का अधिपति हुआ, त्योंही कवि कुम्भनदास ने अब्दुर्रहीम खानखाना को फोन मिलाया.

रहीम ने पहली ही घंटी में फोन उठाया, “कहो कुम्भनदास जी, आज हमारी याद कैसे आई?”

फारसी, संस्कृत, हिंदी के उद्भट विद्वान व कवि, आलमपनाह अकबर मुख्य सेना नायक और नवरत्नों में से एक, रहीम के मुख से बिना किसी पूर्व परिचय के यों अपना नाम सुनकर कुम्भनदास को विस्फोटक आश्वस्ति हुई कि जब रहीम की फोनबुक में नाम फीड है तो गुडबुक में भी हुआ ही समझो.

कुम्भनदास ने पूछा, “आजकल बादशाह सलामत दिल्ली में हैं, आगरा में हैं कि फतेहपुर सीकरी में हैं?”

रहीम, “जी, फतेहपुर सीकरी में हैं.”

कुम्भनदास, “तो आलमताब के सानिध्य में जमाओ शीघ्र ही सीकरी में कवि सम्मेलन?”

रहीम, “लेकिन कुम्भनदास जी, जहांपनाह तो कविता वगैरह समझते ही नहीं हैं?”

कुम्भनदास, “यह तो और अच्छी बात हुई।… हैलो, सीकरी में कवि सम्मेलनों का सिलसिला सदैव के लिए चल पड़ेगा. बस, आप तो शहंशाह हुजूर तक यह रहस्य पहुंचा दो कि काठ से बँधकर ही पत्थर तैर सकता है. कवि ही की कलम में वह धार होती है कि जघन्य जन संहारों को भी दुनिया धर्मयुद्ध मानने लगती है. कवि ही की वाणी में वह जादू होता है कि राजा की प्रत्येक मूर्खता को उसकी ‘लीला’ सिद्ध कर दे.”

रहीम, “लेकिन कुम्भनदास जी, आप तो कभी अपने एक पद में ‘सन्तन को कहा सीकरी सों काम’ कह चुके हैं?”

कुम्भनदास, “वह तो मेवाड़ के महाराणा ने एक कविसम्मेलन में बुला लिया था, सो कहना पड़ा. हें हें हें हें.”

Tags: Books, Hindi Literature, Hindi Writer, Literature

Source link

Up Head Line
Author: Up Head Line

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

और पढ़ें