अशोक यादव/कुरुक्षेत्र. कुरुक्षेत्र के पिहोवा को पृथुदक तीर्थ के नाम से विश्वभर में जाना जाता है. जिसे हिन्दू और सिख एकता के प्रतीक के तौर पर भी अलग पहचान मिली है. चैत्र अमावस्या पर लगने वाले मेले देश के विभिन्न हिस्सों से लाखों श्रद्धालु आते हैं. श्रद्धालु पावन सरस्वती तीर्थ में स्नान, पूजा और पिंडदान कर अपने पितरों की मोक्ष की कामना करते हैं
कुरुक्षेत्र के 48 कोस की इस परिधि में पिहोवा सरस्वती तीर्थ या पृथुदक तीर्थ पर हर वर्ष चैत्र अमावस्या का मेला लगता है. इस मेले के पौराणिक पहलुओं का महाभारत और पुराणों में बारीकी से उल्लेख किया गया है. पुराणों में स्पष्ट किया गया है कि पिहोवा शब्द पृथुदक शब्द से अलग होकर बना है. महाराज पृथु द्वारा बसाया गया प्राचीन शहर पृथुदक जो वर्तमान समय में पिहोवा के नाम से विश्व विख्यात तीर्थ स्थल है. महाभारत सहित अनेक पुराणों और धार्मिक ग्रन्थों में पिहोवा को कुरुक्षेत्र, हरिद्वार, पुष्कर और गया से भी अधिक महत्व दिया है.
क्यों किया जाता है पिंडदान?
यहां पर चैत्र चौदस और अमावस्या पर पिंडदान करने का विशेष महत्व माना जाता है. मान्यता है कि पितृ पक्ष के दौरान पितर परलोक से धरती पर वास करने के लिए आते हैं और यहां पर जो भी श्रद्धालु अपने पितरों का पिंडदान करते हैं. उनके पितर प्रसन्न होकर परिवार में सुख समृद्धि की वर्षा करते हैं. साथ ही पिंडदान के बाद श्रद्धालु प्रेत पीपल पर जल भी चढ़ाते हैं.
पिहोवा सरस्वती तीर्थ का धार्मिक ग्रंथों में है उल्लेख
भगवान कृष्ण के कथन पर महाराजा युधिष्ठिर ने महाभारत युद्ध में अपने परिजनों और मारे गए वीरों की आत्मिक शांति के लिए यहीं पर और पिंडदान किया था. माना जाता है कि जिससे उनके परिजनों की आत्मा को शांति मिली. इसी वजह से देश-विदेश से लाखों लोग अपने मृतक रिश्तेदारों की आत्मिक शान्ति तथा मोक्ष प्राप्ति के लिए पिंडदान करवाने यहां आते हैं. विश्व प्रसिद्ध इस मेले का धार्मिक और पौराणिक दृष्टि से एक विशेष महत्व माना जाता है. चैत्र चौदस मेले पर पंजाब, हिमाचल, राज्यस्थान, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, चंडीगढ़ सहित देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालु पहुंचते है.लेकिन सबसे ज्यादा संख्या पंजाब से आने वाले सिख श्रद्धालुओं की रहती है.
चैत्र अमावस्या पर पिंडदान का विशेष महत्व
इतना ही नहीं ये भी माना जाता है कि यहां स्नान करने से सारे पाप नष्ट हो जाते है तथा व्यक्ति को अश्वमेध यज्ञ की फल की प्राप्ति के साथ-साथ स्वर्गलोक भी प्राप्त हो जाता है. वैसे तो इस स्थल पर साल भर लोग अपने पितरों की आत्मा की शान्ति के निमित पिंडदान व स्नान करने आते हैं. लेकिन चैत्र अमावस्या को यहां स्नान करने का विशेष महत्व माना गया है. इसी दिन यहां विशाल मेला लगता है जिसमें देश के कोने-कोने से लाखों लोग पहुंच कर अपने पितरों की आत्मिक शांति के लिए पिंडदान व कर्मकांड करते हैं.
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FIRST PUBLISHED : June 04, 2023, 13:16 IST








