
10 दिसम्बर 2020 को जिस संसद भवन की आधारशिला मोदी जी द्वारा रखी गयी वह ढाई साल से भी कम समय की प्रतीक्षा के बाद अन्ततः पूर्ण हो ही गया. देश के लोग अपने संसद भवन का नवीनतम रूप देख रहे हैं, राजनैतिक सरगर्मियों के बीच, विपक्षी दलों की आलोचना और कड़ी सुरक्षा के पश्चात् 28 मई 2023 का खूबसूरत दिन इतिहास में अपना नाम दर्ज करा गया, भव्य भवन की सुन्दरता देखते ही बनती है, जिसने अपने आकर्षण से सबके मन को मोह लिया, वैभव और समृद्धि के प्रतीक इस भवन में लोकसभा सदन के 888 और राज्य सभा के 384 सदस्य बैठ सकते हैं. लोकसभा हाल में 1272 सदस्यों के बैठने की जगह है.
त्रिभुजाकार आकार में 64,500 वर्ग मीटर में विस्तृत संसद भवन पहले संसद भवन से काफी अलग और विशाल है, तकनीकी दृष्टि से आधुनिक है, हमारे देश की अन्य इमारतें जो कुछ तो मुगलों द्वारा बनाई गयी हैं और कुछ अंग्रेजों द्वारा निर्मित हैं, जिन्हें हम बड़े उत्साह से देखने जाते हैं, उन पर गर्व भी करते हैं कि ये हमारे देश की शान हैं, पर आज हमने अपने देश की खूबसूरत इमारत हमारा संसद भवन है, जो हर भारतीय नागरिक के लिए गौरव और गर्व का प्रतीक है, उसकी शानो शौकत के लिए सबको एकजुट होना चाहिए था, लेकिन नहीं यहां भी राजनीति कहती है कि कोई भी काम हो, व्यवधान पैदा करना जरूरी है.
कहते हैं ना जीवन में, जब भी कुछ नया होने वाला हो, अटकलों का बाजार गरम हो जाता है. अच्छा है, ऐसा मन में कहकर नजर लगाने वाली बात सदियों से चली आ रही है. संसद के विषय में भी यही कहेंगें कि विरोधियों ने पहले से ही नजर लगा दी पर किसी की रूकावटों के बाद भी काम रूकते नहीं हैं, जिसमें मोदी जी की सहभागिता हो वो काम आसानी से कैसे करने दे सकते हैं, मोदी नाम से ही परहेज है, निर्विघ्न कार्य सम्पन्न हो जाए, अटकलें ना लगायी जाएं ऐसी तो विपक्ष की सोच ही नहीं है. कुछ को तो संसद भवन के निर्माण से भी आपत्ति है, इसे पैसों की फिजूल खर्ची माना जा रहा है, जबकि सभी नया संसद भवन चाहते थे, राष्ट्रपति से उद्घाटन क्यों नहीं कराया गया, मोदी जी ने क्यों किया इस हेतू काफी सरगर्मियां रही, 19 विपक्षी दलों ने उद्घाटन का विरोध किया, बहिष्कार किया.
स्मृति ईरानी जी ने कहा भी कि ये संसद का नहीं देश के नागरिकों का बहिष्कार है. कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और टीएमसी इन कुछ मुख्य पार्टियों को तो भाजपा और मोदी जी फूटी आंख भी नहीं सुहाते, जिस नेता को विश्व पटल पर सराहा जाता हो उसके कामों की निन्दा और कमी ही, इनके जीवन का ध्येय है. विदेश के सम्मानित व्यक्ति भी जिनको चरण स्पर्श करके सम्मान दे रहें हों, उन्हीं प्रधानमन्त्री के हाथों संसद भवन का उद्घाटन इन्हें पसन्द नहीं, ऐसा पहली बार नहीं हुआ कि कोई प्रधानमन्त्री संसद भवन का उद्घाटन कर रहा हो, इससे पहले भी इन्दिरा गांधी 1975 में संसद का उद्घाटन कर चुकी हैं, तब भी राष्ट्रपति ने नहीं किया था.
1987 में राजीव गांधी ने नयी संसद के पुस्तकालय का शिलान्यास किया था, विरोध की आवाजें तब तो नहीं आयीं, स्वयं कुछ भी कर लें पर मोदी जी के करने पर आपत्ति है, वाह री दोहरी नीति के पक्षधर लेकिन चाहे लाख अड़चनें आईं, देश के लोगों ने देश की सम्प्रभुता के दर्शन कर लिए, कुशल कारीगरों के द्वारा बनकर तैयार हुई यह इमारत कोई भवन नहीं, बल्कि हर भारतीय के सपनों और इच्छाओं का प्रतिफल है, समस्त संसार को भारत की इच्छाशक्ति और दृढ़ससंकल्प का परिचय देता है, आजादी से आज तक अंग्रेजों के बनाए भवन में देश की संसद चलती थी.
आधुनिक तकनीक, भव्यता, कला और विविधताओं से भरे भारत का आज अपना सुन्दर, भव्य, आकर्षक संसद भवन भारत की आत्मनिर्भरता की कड़ी का प्रतीक है, लेकिन इस कड़ी के कुछ लोगों को एकता की बातें अच्छी ही नहीं लगती और वे आपस में टकरा कर भारत की एकजुटता और अखण्डता को बार बार चोट पहुंचाने की कोशिश करते हैं. विनायक दामोदर सावरकर की 140वीं जयन्ती और भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री जवाहर लाल नेहरू के अन्तिम संस्कार की तिथि भी इसी दिन है.
विपक्षी विचारधारा के चलते शुभ मुहुर्त में सर्वधर्म सभा के साथ विभिन्न मन्त्रोच्चार से भारत के सभी धर्मों के अनुसार, नीतियों के तहत पूजा सम्पन्न होकर किया गया उद्घाटन ऐतिहासिक रहेगा, जिसमें 11 धर्मों के धर्म गुरु शामिल थे, जिन्होंने देश की प्रगति और खुशहाली की प्रार्थना की, जिसमें दुआ थी, जो बोले सो निहाल की भक्ति थी, बौद्ध, इस्लाम, सिक्ख ईसाई, पारसी, जैन सभी धर्मों की पावनता और पवित्रता के दर्शन हुए, यह दिन अविस्मरणीय रहेगा.
जहां गरीब और श्रम करने वाले श्रमिकों को भी महत्व दिया गया, अपने खून पसीने से एक-एक ईंट को रखकर भव्य भवन को तैयार करने वाले श्रद्धा व सम्मान के पात्र हैं, जिन्हें हमारे देश के प्रधानमन्त्री जी ने याद रखा और उनके योगदान को सराहा उन्हें सम्मानित किया, देश सर्वोपरि है, इस भावना से ओत प्रोत होकर सुश्री मायावती, गुलाम नबी आजाद और उमर अब्दुल्ला आदि ने अपनी विचारधारा का सकारात्मक पहलू सबके सामने रखा और उद्घाटन का समर्थन किया.
संसद भवन हमारी सांस्कृतिक धरोहर और मूल्यों का प्रतीक है, लोकसभा कक्ष मोर की आकृति और राज्य सभा कक्ष कमल की आकृति के रूप में सुसज्जित हैं. गुलामी की कठोर यादों से मुक्त कराता आजादी के अमृतकाल में सुखद असंख्य स्वर्णिम सपनों को आकार देता देश का नया संसद भवन हर नागरिक की उम्मीदों का सहारा बने, यहां से देश के कोने-कोने में शान्ति सुविचार, सद्भावना का सन्देश पहुंचे, देश को चलाने के लिए प्रभावी और पारदर्शी कार्य हों, ये संसद हमारा अभिमान बने, जंग का अखाड़ा नहीं, जहां से सारे विश्व को भारत का गरिमा मण्डित रूप देखने को मिले, विरोधियों और विरोध के स्वर प्रमुख ना हों, सब एकजुट होकर देश की अखण्डता का पाठ पढ़ें और अपना आदर्श प्रस्तुत करें, तभी हमारा बहुमूल्य लोकतन्त्र, जो हमारी विरासत है, अपने सही स्वरुप में प्रदीप्त हो सकेगा.








