What does Science say why some comets are green

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अंतरिक्ष में कई तरह के पिंड हैं और कई जगहों पर विभिन्न रंगों के पिंड दिखाई देते हैं. इनमें तारे और उनके समूह अलग- अलग रंगों के दिखते हैं. तारों में भी लाल पीले और सफेद रंग से लेकर नीले रंग के भी दिखाई देते हैं. लेकिन अंतरिक्ष में शायद ही कोई पिंड हरा रंग का दिखाई देता है. हरा रंग कई बार ऑरोर में दिखाई देता है तो कभी कोई ग्रह हरे रंग दिखाई देता है. लेकिन तारों में ऐसा कभी नहीं हुआ कि वह हरा रंग दिखा हो. इसी तरह से धूमकेतु भी अमूमन हरे रंग के नहीं दिखते हैं, लेकिन कई बार कुछ धूमकेतु हरे रंग के दिख जाते हैं. ऐसा इसी साल फरवरी में सूर्य के सबसे पास आए धूमकेतु केसाथ हुआ था. आखिर धूमकेतु का रंग हरा कैसे हो जाता है जबकि अंतरिक्ष में हरियाली तो लगभग दिखती ही नहीं है. इस पर क्या कहता है विज्ञान (What does Science Say)?

क्या होते है धूमकेतु
धूमकेतु तारे नहीं होते हैं और वे गैस बर्फ के कणों आदि से मिलकर विशाल पिंड होते हैं जो सूर्य का चक्कर लगाते हैं. इनकी कक्षा अंडाकार होती है  और वे सूर्य का एक चक्कर लागने में दशकों से लेकर कई सदियां तक लगा देते हैं. जैसे जैसे ये सूर्य के पास आते हैं इनकी पूंछ बड़ी होती  जाती है जिसका असर कई बार पृथ्वी पर भी देखा जाता है. सामान्य तौर पर ये सफेद या चांदी के रंग ही दिखते हैं, लेकिन इनका रंग लाल से लेकर हरा तक भी हो सकता है.

इस साल बहुत पास आया था हरा धूमकेतु
धूमकेत सौरमंडल के बाहर की ओर स्थित क्षेत्र काइपर बेल्ट में बने होते हैं. C/2022 E3 (ZTF) नाम का धूमकेतु पिछले साल मार्च में कैलिफोर्निया की ज्विकी ट्रांजिट फैसिलिटी में खोजा गया था. यह एक फरवरी 2023 को सूर्य के सबसे नजदीक था जो कि हर 5000 साल में एक बार हो पाता है. इस धूमकेतु की सबसे खास बात यही थी की यह हरे रंग का दिखाई दे रहा था.

धूमकेतु के खास हिस्से
धूमकेतु के हिस्सों सबसे प्रमुख हिस्सा उसका केंद्र या न्यूक्लियस होता है. केंद्र में चट्टानें, धूल, बर्फ और जमी हुई कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनो ऑक्साइड, मीथेन और अमोनिया होते हैं. केंद्र के आसपास के हिस्से को कोमा कहते हैं जो एक वायुमंडल  की तरह होता है. जिसमें पानी, धूल और गैस के बादल होते हैं. इसी हिस्से पर सूर्य के विकिरण दबाव और सौर पवन के कारण धूमकेतु के पूंछ बनती है जो सूर्य के पास आने पर बढ़ती जाती है. इसी में से अलग दिशा में धूल  की भी पूंछ निकलती है.

हरे रंग की वजह
धूमकेतु का रंग उसके कोमा के कारण ही होता है. C/2022 E3 (ZTF) जैसे धूमकेतुओं के केंद्र में द्वि अणु वाले कार्बन और कैनोजन होते हैं. कैनोजन कार्बन और नाइट्रोजन के बंध से बनता है. यही पदार्थ सूर्य की किरणों के कारण चमकता है और दूर से हरे रंग का दिखाई देता है. इसी वजह से C/2022 E3 (ZTF) को हरे रंग का धूमकेतु कहा जाता है. इस हरे रंग के पीछे धूमकेतु के और भी पदार्थों की भूमिका होती है.

सूर्य के पास आने पर
कोमा का निर्माण तब तक नहीं होता है जब तक कि धूमकेतु मंगल ग्रह की कक्षा के आसपास तक नहीं पहुंच जाता है. यहां तक पहुंचने पर धूमकेतु की पथरीले हिस्से की शरीर पिघलने लगता है और केंद्र के आसपास एक वायुमंडल बनने लगता है जिसमें धूल और गैस होते है. जैसे जैसे धूमकेतु सूर्य के पास आता जाता है, सूर्य की किरणों की वजह से कोमा की गैसो में परमाणु स्तर का बदलाव देखने को मिलता है.

रंगों के दिखने के कारण
C/2022 E3 (ZTF) के मामले में सूर्य की रोशनी के धूमकेतु के द्विपरमाणु कार्बन अणु को कोमा के वायुमंडल में तोड़ कर एकल परमाणु वाले कार्बन में बदल रही थी इससे धूमकेतु के केंद्र के आसपास हरे रंग का प्रभाव देखने को मिला और पृथ्वी से धूमकेतु हरे रंग का दिखने लगा था. वहीं दूसरी ओर धूमकेतु की पूंछ हमेशा की तरह सफेद ही दिखती रही और उसकी धंधली गैसे  नीले रंग का प्रभाव दे रही थी.

इसी तरह से C/2007 N3 ल्यूलिन, C/2014 Q2 लवजॉय, C/2021 A1 लियानार्ड भी ऐसे ही प्रभाव के कारण  हरे रंग के दिखाई दिए थे. कोमा में गैसों की संरचना बदलने से उसके रंगों में भी बदलाव देखने को मिल सकता है. इसलिए कभी कोई धूमकेतु नीला तो कोई लाल तक दिखाई देता है. धूमकेतु सूर्य के पास आने पर किस रंग का दिखेगा यह सब कुछ द्विपरमाणु कार्बन और अन्य रासायनिक संरचना पर निर्भर करेगा.

Tags: Research, Science, Solar system, Space

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Up Head Line
Author: Up Head Line

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