कासिम ख़ान/नूंह. नूंह जिले के पल्ला गांव में अरावली पर्वत के दामन में बनी हजरत शेख मूसा की दरगाह अपने इतिहास के कई अध्याय अपने आंचल में छिपाए बैठी है. इस दरगाह पर दो मीनार हैं जिनमें से एक को हिलाने पर दूसरी अपने आप हिलने लगती है. इस अजूबे को देखने कई दशक पहले हजारों लोग दूर-दराज से यहां आते थे. मीनार में दरारें आई तो पर्यटकों की संख्या भी बेहद कम हो गई. इसके बाद मीनारों के हिलने में भी कमी आ गई. लोगों का विश्वास है कि शेख मूसा की कब्र के पास बने गड्ढे का पानी शरीर के मस्सों पर लगाने से मस्से हमेशा के लिए समाप्त हो जाते हैं.
गौरतलब है कि हजरत शेख मूसा ख्वाजा निजामुद्दीन औलिया के खलीफा थे. उन्हीं के कहने से मेवात में इस्लाम धर्म के प्रचार के लिए निकल पड़े थे. जब वे अरावली पर्वत के साथ से गुज़र रहे थे तो एक कांटेदार झाड़ी ने उनका पल्लू थाम लिया. बार-बार सुलझाने के बाद भी पल्लू नहीं सुलझा तो सारी स्थिति अपने आप भांप गये और वहीं पर अपना डेरा डाल लिया. हजरत शेख मूसा इस्लाम धर्म का प्रचार करने लगे और अपनी लगन,मेहनत और काबिलियत के चलते बहुत जल्दी दूर-दूर तक उनको लोग जानने लगे. उन्होनें पूरा जीवन मेवात में इस्लाम धर्म का प्रचार और प्रसार किया. जिस जगह पर हजरत शेख मूसा का पल्ला झाड़ी ने थामा वहां पर आज भी पल्ला गांव बसा हुआ है. जो देश के बंटवारे से पहले शेख समाज ka गांव था. और अब उस गांव में सभी समुदाय के लोग रहते हैं.
मीनारों का रहस्य अभी भी कायम
दरगाह करीब 800 वर्ष पुरानी है. इस के मुख्य द्वार पर बनी दो ऊंची विशाल मीनारें हैं जिनमें आज भी एक मीनार को हिलाने के बाद दूसरी मीनार चंद सैकेंड के बाद स्वंय हिलने लगती है . जो 800 वर्ष बाद भी लोगों के लिए एक पहेली बनी हुई है. हजरत शेख मूसा की कब्र पर पुखराज पत्थर की करीब दो दर्जन जालियां लगाई गई थी. जिनकी कीमत करोड़ों रुपये में बताई जाती है. लेकिन आज से करीब 20 वर्ष पहले इन जालियों को चोर उड़ा कर ले गये . जिनका आज तक कुछ अता-पता नहीं चल पाया.
1957 में उर्स हो गया बंद
लोगों का विश्वास है कि हजरत शेख मूसा की दरगाह में बनी उस कब्र पर एक झाडू चढ़ाने के बाद शरीर पर पैदा हुए मस्से अपने आप कुछ दिन बाद खत्म हो जाते हैं. आजादी से पहले यहां पर उन की याद में उर्स मेले का आयोजन किया जाता था .जो 1957 के बाद से बंद हो गया. नूंह के जाने-माने मौलाना नियाज मोहम्मद साहब ने 1956 में दरगाह में नमाज पढाने और अजान देने के लिऐ एक इमाम रखा जो बदस्तूर चल रहा है और हजरत ख्वाजा शेख मूसा की दरगाह वगैरह की देख-रेख करता है. परंतु दुख की बात है कि केन्द्र और राज्य सरकार से लेकर प्रशासन ने इस दरगाह की कोई सुध नहीं ली.
निजामुद्दीन औलिया ने की थी परवरिश
हजरत ख्वाजा शेख मूसा दिल्ली से ताल्लुक रखते थे. उनके पिता का नाम मौलाना बदरूदीन इशाक था. जो जाने-माने आलिम थे. मौलाना बदरूदीन इशाक व ख्वाजा निजामूदीन औलिया बाबा फरीद गंज रहमतुल्ला के मुरीद थे. बाबा फरीद गंज ने अपनी लड़की की शादी मौलाना बदरूदीन इशाक से की जिससे हजरत ख्वाजा शेख मूसा व हजरत ख्वाजा मोहम्मद इमाम पैदा हुए.बचपन में ही पहले पिता और बाद में माता का देहांत हो गया. जिसके बाद दोनों भाईयों की परवरिश निजामुदीन औलिया ने की और देशभर में हिन्दू-मुस्लिम एकता और इस्लाम धर्म को बढावा देने के लिऐ उन्हें भ्रमण पर भेज दिया. उसी दौरान नूंह शहर से करीब तीन किलोमीटर अरावली की वादियों में पल्ला गांव में उनका पल्लू कांटेदार झाडियों से अटक गया. जिसके बाद ना केवल एतिहासिक हजरत ख्वाजा शेख मूसा की दरगाह वजूद में आई बल्कि उसी दिन से पल्ला गांव बस गया. इस्लाम धर्म का प्रचार करते-करते 733 हिजरी में उनका देहांत हो गया. फिलहाल 1432 हिजरी चल रही है. कुल मिलाकर हजरत ख्वाजा शेख मूसा की मौत करीब 700 वर्ष पूर्व हुई थी.
पुखराज के पत्थरों का नहीं मिला सुराग
हजरत ख्वाजा शेख मूसा की कब्र की रौनक बढ़ाने वाला पुखराज पत्थर कहां गया. इसका आज तक कोई पता नहीं चल पाया. जानकारों की मानें तो पत्थर की कीमत करोड़ों रुपये में थी , जिसे किसी ने चुराकर बेच दिया. बताया तो यहां तक जाता है कि मजार पर लगा पुखराज पत्थर रात को मजार पर रौशनी करता था.
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FIRST PUBLISHED : June 02, 2023, 16:16 IST








