
(विमल कुमार/ Vimal Kumar)
यदि तुम्हारे घर के / एक कमरे में आग लगी हो / तो क्या तुम / दूसरे कमरे में सो सकते हो? यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में लाशें सड़ रहीं हों / तो क्या तुम / दूसरे कमरे में प्रार्थना कर सकते हो?’
हिंदी के मशहूर कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता “देश कागज पर बना नक्शा नहीं होता” से ये काव्य पंक्तियां उदधृत की गई हैं. यह कविता पिछले दिनों काफी वायरल हुई थी. हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि अशोक वाजपेयी ने सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की स्मृति में आयोजित कार्यक्रम में इस कविता के वायरल होने का जिक्र किया और सर्वेश्वर जी के “कुआनो नदी” की भूमिका में लिखे गए एक अंश को पढ़कर भी सुनाया.
“मैं यह जानता हूं कि कविता से समाज नहीं बदला जा सकता. जिससे बदला जा सकता है वह क्षमता मुझमें नहीं है. फिर में क्या करूं? चुप रहूं? उसे खुश करने का नाटक करूं, भड़ैती करूं? … सच तो यह है कि मैं कविता लिखकर केवल अपना होना प्रमाणित करता हूं. मैं यह मानता हूं कि हम जिस समाज में हैं, जिस दुनिया में हैं वहां हमें अपना होना प्रमाणित करना है.”
अशोक वाजपेयी ने तीसरे सप्तक के चर्चित कवि और अपने समय की महत्वपूर्ण एवम् अनूठी पत्रिका “दिनमान” के पत्रकार सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की स्मृति में आयोजित कार्यक्रम में इन पंक्तियों को उद्धृत करते हुए उन्हें आज के समय का एक जरूरी और प्रासंगिक कवि बताया, लेकिन उनकी कविता के सपाट होने का भी जिक्र किया.
रज़ा फाउंडेशन द्वारा आयोजित “आज की कविता” कार्यक्रम में सर्वेश्वर दयाल सक्सेना को उनके निधन के 40 वर्ष बाद याद करने का एक उपक्रम किया गया.
हिंदी के प्रख्यात कवि एवम आलोचक अशोक वाजपेयी ने तीसरे सप्तक के चर्चित कवि एवं अपने समय की महत्वपूर्ण एवम अनूठी पत्रिका “दिनमान” के पत्रकार सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की स्मृति में आयोजित कार्यक्रम में उनकी पंक्तियों को उद्धृत करते हुए उन्हें आज के समय को देखते हुए उन्हें एक जरूरी और प्रासंगिक कवि बताया.
रज़ा फाउंडेशन द्वारा आयोजित “आज की कविता” कार्यक्रम में सर्वेश्वर दयाल सक्सेना को उनके निधन के 40 वर्ष बाद याद करने का एक उपक्रम किया गया. इस अवसर पर “दिनमान” में सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के सहयोगी रहे कवि विनोद भारद्वाज, दिल्ली विश्विद्यालय में आलोचक अपूर्वानंद और युवा आलोचक आशीष मिश्र ने भाग लिया.
अशोक वाजपेई ने कहा कि “आज की कविता” कार्यक्रम के तहत अब तक 25 आयोजन हो चुके हैं जिसमें 98 कवियों का का पाठ हुआ है लेकिन अब इस कार्यक्रम के तहत उन कवियों पर चर्चा हो रही है जिनके बारे में आज कम बात होती है. इस कड़ी में सबसे पहले विजय देव नारायण साही की कविता पर बातचीत हुई थी और अब सर्वेश्वर दयाल सक्सेना पर बातचीत हो रही है.
प्रसिद्ध कवि अशोक वाजपेयी ने सर्वेश्वर दयाल जी को कस्बाई भावप्रवणता का कवि बताते हुए कहा कि उनकी कविताएं बाद में सपाटबयानी का शिकार हो गयी थीं और वे कुछ तुक भी मिलाने लगे थे. लेकिन उन्होंने अपने समय में चुप रहना उचित नहीं समझा था. सक्सेना जी ने “देश नक्शे पर बना कागज़ नहीं”, “भेड़िया गुर्राता है” और “बाघ” आदि जैसी कविताएं लिखीं. ये कविताएं आज भी प्रसांगिक और अर्थवान हैं.
वाजपेयी ने सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के साथ अपने तनावपूर्ण सम्बन्धों का जिक्र करते हुए बताया कि सर्वेश्वर जी ने मेरे बारे में एक तल्ख टिप्पणी की थी पर नामवर सिंह को अचूक अवसरवादी बताया था और नामवर जी के बारे में उनकी इस राय से मैं सहमत था.
प्रसिद्ध कला समीक्षक विनोद भारद्वाज ने “दिनमान पत्रिका” में सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के साथ अपने संबंधों का जिक्र करते हुए उन्हें रघुवीर सहाय और श्रीकांत वर्मा की तुलना में कमजोर कवि बताया. उन्होंने कहा कि इन तीनों कवियों में भयानक ईर्ष्या थी और आपस में नहीं बनती थी तथा बातचीत भी नहीं होती थी.
विनोद भारद्वाज ने बताया कि, “सर्वेश्वर दयाल मधुमेह और उच्च रक्तचाप के मरीज थे. महज 56 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया था. मैंने करीब 10 वर्ष तक उनके साथ काम किया और उनके निधन के बाद उन पर मैंने एक कविता भी लिखी थी लेकिन मेरे प्रिय कवि रघुवीर सहाय थे क्योंकि उनकी कविता में सर्वेश्वरजी की तुलना में अधिक गहराई थी.”
उन्होंने कहा कि सर्वेश्वर जी के मन में साहित्य अकादमी पुरस्कार को लेकर एक “ओबसेशन” था और जब विष्णु खरे ने धूमिल को यह पुरस्कार मिलने की मुझे सूचना दी. मैंने सर्वेश्वर दयाल जी को बताया तो उन्होंने रघुवीर सहाय के कमरे से बाहर निकलते हुए कहा था -“अब मुझे जीते जी यह पुरस्कार नहीं मिलेगा.” लेकिन इसे संयोग कहा जाए कि उन्हें उनके निधन के बाद “खूंटियों पर टंगे लोग” संग्रह के लिए सर्वेश्वर दयाल जी को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला.
युवा आलोचक आशीष मिश्र ने सर्वेश्वर दयाल सक्सेना को संवाद धर्मी कवि बताते हुए कहा कि वह नागार्जुन और भवानी प्रसाद मिश्र की परंपरा के कवि थे जो जनता से संवाद करना चाहते थे. उन्होंने कहा कि सर्वेश्वर तीसरे सप्तक के कवि थे और उनकी पहली किताब 1959 में आई थी जिसमें कविता-कहानी-उपन्यास भी था. 1983 में उनका निधन हो गया था. इस तरह वे करीब तीन दशक साहित्य में सक्रिय रहे. वे तार सप्तक के कवि जरूर थे लेकिन बाद में उन्होंने नई कविता की भाव भूमि को अपनी कविता में तोड़ा था तथा “कुआनो नदी” के बाद उनकी कविता बदल गयी थी. लेकिन उनके शिल्प और शैली में परिवर्तन आया और वे अंतर्वस्तु पर अधिक जोर देने लगे.
प्रोफेसर अपूर्वानंद ने कहा कि हमें कवि का मूल्यांकन उसकी श्रेष्ठ कविता के आधार पर करना चाहिए न कि उसकी कमजोर कविताओं के आधार पर. उन्होंने कहा कि हिंदी साहित्य की दुनिया में कहां किसी कवि की अक्सर चर्चा होती है, इसलिए यह कहना उचित नहीं है कि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की चर्चा आज नहीं की जाती है.
अपूर्वानंद ने सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविताओं को कमजोर बताया लेकिन यह भी कहा कि सर्वेश्वर जी ने कविता की दुनिया में सच कहने की हिमाकत की थी. उन्होंने कहा कि जब पटना में इप्टा ने सर्वेश्वर जी का ‘बकरी’ नाटक किया तो वे निराश हुए थे और मैंने उनकी राजनीतिक दृष्टि पर एक तल्ख टिप्पणी भी लिखी थी और उसे कमजोर नाटक बताया था. इसे लेकर इप्टा के भीतर विवाद भी हुआ था क्योंकि मैं इप्टा से जुड़ा था और इप्टा से जुड़ा हुआ व्यक्ति कैसे अपने कार्यक्रम की इस तरह तीखी आलोचना कर सकता है.
अपूर्वानंद ने बताया कि सर्वेश्वर जी ने युद्ध के खिलाफ अनेक कविताएं लिखी थीं और इतनी युद्ध विरोधी कविताएं किसी ने नहीं लिखीं.
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FIRST PUBLISHED : June 01, 2023, 15:23 IST








