
धीरेन्द्र शुक्ला/चित्रकूट. भगवान राम चित्रकूट में साढ़े ग्यारह वर्ष वनवास काल पूरा करने के बाद जब अयोध्या पहुंचे तो उनको पता चला कि उनके पिता का पिंडदान नहीं हुआ है. इसके बाद पुनः प्रभु राम अयोध्या से वापस होकर चित्रकूट पहुंचे, जहां अपने पिता का पिंडदान चित्रकूट के रामघाट पर किया, ताकि राजा दशरथ को शांति प्रदान हो सके.
चित्रकूट के मंहत दिव्य जीवन दास जी बताते हैं कि प्रभु श्रीराम ने जिस जगह पर पिता की मृत्यु की खबर पाकर पिंडदान किया था. वह आज चित्रकूट में राघव प्रयाग घाट के नाम से जाना जाती है. ऐसे तो देश में हरिद्वार, गंगासागर, कुरूक्षेत्र, और पुष्कर सहित कई स्थानों में भगवान पितरों को श्रद्धापूर्वक किए गए श्राद्ध से मोक्ष प्रदान कर देते हैं, लेकिन चित्रकूट में किए गए श्राद्ध की महिमा का गुणगान तो रामचरित मानस में भी किया गया है. कहा जाता है कि भगवान राम और माता सीता ने वनवास काल में परिवार के साथ पिता दशरथ की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान धर्मनगरी में किया था.
चित्रकूत के संतों ने कुछ खास बताया
चित्रकूट के मंहत दिव्य जीवन दास ने कुछ खास बताया है कि धर्म में पितृपक्ष के दौरान पिंडदान का विशेष महत्व होता है. मान्यता है कि पुत्र ही माता-पिता का पिंडदान करता है, जो बहुत खास माना जाता है और प्रभु राम ने वनवास काल पूरा करने के बाद पुन: चित्रकूट आकर आपने पिता का पिंडदान किया था. चित्रकूट में जो भी अपने माता पिता का पिंड दान करता है, उसके माता-पिता को मोक्ष की प्राप्ति होती है, इसलिए धर्मनगरी चित्रकूट का बड़ा महत्त्व माना जाता है.
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FIRST PUBLISHED : May 29, 2023, 11:26 IST








