
28 मई, 1908 को पटियाला में जन्मे देवेंद्र सत्यार्थी जी का मूल नाम देवेंद्र बत्ता था. वे हिंदी, उर्दू और पंजाबी भाषाओं के विद्वान और साहित्यकार थे. साहित्य के प्रति समर्पण और इस क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया. लोकगीत और लोक संस्कृति को लेकर देवेंद्र जी में एक जुनून था. उन्होंने इनके लिए अपना पूरा जीवन ही न्यौछावर कर दिया.
साहित्य अकादमी से देवेंद्र सत्यार्थी जी पर एक पुस्तक ‘देवेंद्र सत्यार्थीः रचना-संचयन’ प्रकाशित हुई है. इस पुस्तक का चयन और संपादन वरिष्ठ बाल साहित्यकार प्रकाश मनु ने किया है. इस पुस्तक में देवेंद्र सत्यार्थी जी के लोक निबंध, कहानी, कविता, संस्मरण, रेखाचित्र, यात्रा-वृतांत और आत्मकथाएं शामिल हैं. देवेंद्र सत्यार्थी ने अपने संस्मरणों में कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद से हुई मुलाकातों का जिक्र किया है. प्रस्तुत है गोदान के लेखक के साथ देवेंद्र सत्यार्थी जी की एक भेंट- प्रेमचंदः एक चित्र–
मूंछें घनी और बड़ी-बड़ी सिर पर गांधी टोपी से दोनों तरफ और गर्दन पर निकले हुए बेतरतीब से बाल, आंखों में अनुभव की चमक- इन तीन चीजों का मुझ पर विशेष प्रभाव पड़ा, जब अक्तूबर 1931 में लखनऊ में प्रेमचंद से भेंट हुई. मैं एकदम अज्ञात और अपरिचित वे एक सुविख्यात साहित्यकार.
सुबह के दस बजे होंगे. छुट्टी का दिन था वे फर्श पर बैठे लिख रहे थे. पड़ोस के एक लड़के की मदद से मैं ठीक उस कमरे के दरवाजे पर जा पहुंचा था जिसमें बैठकर वे लिखा करते थे. परिचय हुआ.
“सीधा बनारस से आ रहा हूं, लगे हाथों लमही भी देख आया था.” मैंने बताया. कलम छोड़कर वे मेरी तरफ देखने लगे और कहकहा लगाकर बोले, “लखनऊ में रहना पड़ता है. बड़ी मजबूरी है लेकिन मेरा दिल तो लमही में बसता है.”
मैंने कहा, “मैं जल्दी में नहीं हूं आप जो लिखा रहे थे, पूरा कर सकते हैं. फिर मज़े से बातें होंगी.”
उन्होंने कलम उठाकर फिर लिखना शुरू कर दिया. थोड़ा रुककर बोले, “गुस्ताखी माफ! मैं खुद यही कहने वाला था कि एक मुकाम ऐसा भी आता है जहां कलम रोकना कठिन हो जाता है.”
वे लिखते रहे. मैं बैठा देखता रहा. “आप चाहें तो कुछ पढ़ सकते हैं.” कुछ क्षणों के बाद उन्होंने मेरी तरफ देखकर कहा.
“मैं मजे में हूं!” मैंने कहा, “आप लिखिए.”
वे यों लिख रहे थे जैसे कोई अज्ञात शक्ति स्वयं उनकी लेखनी को आगे बढ़ा रही हो. सचमुच मैं यही इच्छा लेकर पहुंचा था कि इन आंखों से ‘सेवा सदन’ और ‘रंगभूमि’ के लेखक को लिखते देख सकूं.
मेरी खुशी का कोई ठिकाना न था. उनकी कुछ कहानियों को तो मैंने तीन-तीन बार पढ़ रखा था. हर बार यही खयाल आया था कि लिखने वाले की कलम चूम ली जाए. अब मौका था. पर अब तो लेखक अपना काम कर रहा था. बैठे-बैठे ख़याल आया कि लेखक की कलम यो दौड़ रही है जैसे ‘रंगभूमि’ का सूरदास दौड़ा करता था. शायद लेखक के सामने यो कहना तो ठीक नहीं होगा, यह सोचकर इस उपमा को वहीं दवा दिया जहां से वह उठी थी. फिर मैंने सोचा कि लेखक की कलम अभी रुकेगी नहीं, आज तो शायद वह अपनी मंजिल पर पहुंचकर ही दम ले सकती है. एक-दो बार ख़याल आया कि झूठ-मूठ के लिए ही सही, कोई किताब उठाकर पन्ने उलटता रहूं. यों खाली बैठना तो हिमाकत की हद है और वह भी- इतने बड़े लेखक के यहां. आखिर वह क्या समझेगा कि अजीब अहमक से वास्ता पड़ा जिसे पढ़ने का ज़रा शौक नहीं और मुंह उठाकर एक लेखक से मिलने चला आया. पर मैं पूरी सचाई बरतना चाहता था. मैं तो ठीक यही भावना लेकर पहुंचा था कि किसी तरह यह मौका जरूर हासिल हो जाए कि लेखक को कलम से काम करते देख सकूं.
घड़ी की सुई बारह पर पहुंची, तो उन्होंने कलम रख दी और कहकहा लगाकर बोले, “लिखना भी बड़ी तपस्या चाहता है!”
“जी हां!” मैंने सुर भरा.
“कमरा बंद रखता हूं लिखते वक्त, आज गलती से खुला रह गया था.”ल
“मेरे लिए रास आई यह गलती.”
“आपकी बात नहीं है. आप तो मेहमान हैं.”
उन्होंने झट अंदर कहला भेजा, “मेहमान आए हैं. आज तो अच्छी-सी दावत मिलनी चाहिए.”
“मुझे दावत नहीं चाहिए” मैंने कहा, “एक इच्छा तो पूरी हुई कि आपको लिखते हुए देख लिया, एक इच्छा और रहती है बस… “
“वह क्या?”
“बातचीत तो अभी हुई ही नहीं.”
“अब हाज़िर हूं उसके लिए. हां भई, दावत की बात इसलिए कहलवाई कि छुट्टी का दिन भी तो है, मज़ा रहेगा.”
“तो आप छुट्टी के दिन भी लिखते हैं.”
“छुट्टी के दिन ज़्यादा लिखता हूं. और दिन तो दफ्तर की मारामारी रहती है. छुट्टी का दिन आता है ख़ास तौर पर अपना काम करने के लिए- रुके हुए काम को पूरा करने के लिए.”
“तो गोया आप छुट्टी नहीं मनाते.”
“अजी, वैसे तो छुट्टी-ही-छुट्टी है, कौन-सी कुदाल चलाता हूं.”
“कलम से कुदाल का काम लेने का फन तो जानते हैं न आप.”
“अब इसके सिवा तो चारा नहीं.”
“क्या मैं पूछ सकता हूं कि लेखक क्यों लिखता है?”
“अजी, लेखक इसलिए लिखता है कि लिखे बिना रह नहीं सकता. अपनी बात कहूं तो सबसे पहले यही साफ करना होगा कि कहानी के लिए अनुभव का होना सबसे ज़रूरी है. मेरा मतलब है, मैं किसी-न-किसी सचाई को व्यक्त करना चाहता हूं अपनी हर कहानी में; और यह काम केवल कोई घटना दिखाकर ही नहीं किया जा सकता. इसमें कोई नुक्ते की बात ज़रूर होनी चाहिए जो ठीक “क्लाइमेक्स’ पर पहुंचा दे.”
“महीने में कितना काम कर लेते हैं?”
“महीने में कम-से-कम दो कहानियों की औसत रखना पसंद करता हूं. ऐसा भी हुआ है कि कई-कई महीने एक भी कहानी शक्ल नहीं दिखाती.”
“तो कहानी भी बड़ी नटखट चीज़ है, उसे लेखक से अठखेलियां करने में मजा आता है.”
“किसी हद तक.”
“आप इस ओर कैसे आए?”
“इसे एक कुदरती लगाव समझ लीजिए.”
“हां, तो लिखते वक्त नएपन के तो आप अवश्य कायल होंगे.”
“अगर नएपन का मतलब है अनुभव की ताज़गी और जीवन की किसी अछूती सचाई की तलाश में कामयाबी पाने की धुन तो मैं हर सूरत में नएपन का कायल रहा हूं.”
“आपकी जो कहानियां सबसे ज़्यादा पसंद की गई, उन्हें लिखते वक्त क्या आपने सोचा था कि उन्हें इतनी सफल कहानियां समझा जाएगा?”
“इसका पता लगना कठिन है. यह पढ़ने वालों पर है कि वे लेखक की कामयाबी की दाद दें और उसके अच्छे-बुरे की परख करें.”
“तो गोया स्वयं लेखक को इसकी परवाह नहीं करनी चाहिए?”
“कर सके तो क्या बुरा है? पर मुझे अपनी आलोचना पर उतना भरोसा नहीं रहता.”
“एक कहानी लिखने में कितनी देर लग जाती है?”
“कहानी तो एक-दो ‘सिटिंग’ से ज़्यादा नहीं मांगती.”
“अब थोड़ा उपन्यास के बारे में भी कहिए.”
“उपन्यास के लिए हर रोज़ ठीक वक्त पर लिखना शुरू करता हूं और ठीक वक्त पर कलम रख देता हूं.”
“पहले दिन के लिखे हुए के साथ दूसरे दिन जोड़ मिलाते वक्त कोई कठिनाई तो नहीं होती.”
“बिलकुल नहीं.” उन्होंने कहकहा लगाया, “उपन्यास का प्लाट तो दिल से उतरता ही नहीं, कलम उठाकर लिखने लगता हूं.”
“तो यह काम हमारे यहां की चरखा कातनेवालियों जैसा ही हुआ!” मैंने गंभीर होकर कहा.
“वह कैसे?”
“हमारे यहां स्त्रियां और कन्याएं मिलकर चरखा कातती हैं. इसे ‘त्रिंजन’ कहते हैं. इस चरखा सम्मेलन का काम ठीक वक्त पर शुरू होता है, ठीक वक्त पर खत्म होता है. हर कातने वाली अपनी-अपनी पूनी को वहीं छोड़ देती है जहां तक वह पहुंच चुकी होती है. दूसरे दिन वहीं से पूनी को खींचा जाता है, तार निकलने लगता है. क्या मजाल कि तार में जरा-सा भी जोड़ मालूम हो सके.”
“यह मिसाल तो खूब रही. मालूम होता है आपने इधर कहानी पढ़ने पर जितना जोर दिया है, उपन्यास पर नहीं. इसीलिए हैरान हो रहे हो. प्लाट दिमाग में फिट बैठ जाता है, तो उपन्यास के पात्र आंखों के आगे जिंदा इनसानों की तरह चलते-फिरते, सांस लेते नजर आने लगते हैं और लिखने में ज्यादा कठिनाई नहीं होती. साथ ही लिखने वाले को यह ध्यान तो रखना ही पड़ता है कि वह क्या कहने जा रहा है.”
पता चला कि भोजन तैयार है. हम हाथ धोकर बैठ गए. भोजन में ख़ास तकल्लुफ नहीं बरता गया था. उन्होंने कहकहा लगाकर कहा, “बस दावते शीराजी समझ लीजिए.”
“मुझे तो यह चिंता हो रही है कि यह सब कैसे ख़त्म करना होगा!” मैंने हँसकर सुर भरा.
भोजन के बाद मैंने जाने के लिए आज्ञा मांगी तो कहकहा लगाकर बोले, “आपका पूरा परिचय तो मिला ही नहीं और इतनी बातें हो गईं.”
“मैं असम-बंगाल की यात्रा के बाद बनारस उतरा था.”
“असम-बंगाल किस सिलसिले में गए थे?”
“ग्रामगीतों की तलाश में.”
“यह तो अच्छा और ज़रूरी काम है.” उन्होंने कहकहा लगाया, “इसीलिए कम उम्र में दाढ़ी बढ़ा रखी है कि देखने वालों पर रौब भी पड़ता रहे. हमारे यहां रामनरेश त्रिपाठी हैं. उन्होंने तो यह काम बिना दाढ़ी बढ़ाए ही कर डाला.”
“रामनरेश जी से मिलने के लिए इलाहाबाद उतरा था.”
“बनारस में कहां ठहरे थे?”
“राय कृष्णदास जी के यहां.”
“उनके आतिथ्य की तो बहुतों ने तारीफ की है. मज़ेदार आदमी हैं. विनोदशंकर व्यास से भी मिले होंगे?”
“जी हां, और व्यास जी ने जयशंकर प्रसाद जी के दर्शन भी करा दिए थे.”
“तो आपकी काशी यात्रा सफल रही. मैं खुश हूं. लमही में किस-किस से मिले?”
“लमही में आपका नाम एक काश्तकार के सामने लिया तो उसकी आंखें चमकने लगीं. जैसे मेरे पास उसके लिए आपका कोई संदेश हो.”
“किसानों के हृदय में मैंने प्रेम की गंगा बहते देखी है. लिखते वक्त मुझे इसी गंगा की लहरें बुलाती हैं.”
“तो आज्ञा दीजिए. मुझे गाड़ी पकड़नी है. अपने गांव पहुंचने की जल्दी में हूं! कोई दो साल बाद घर जा रहा हूं.”
“चलिए जाकर गाड़ी पकड़िए मजे से!” उन्होंने कहकहा लगाया, “पर एक बात तो रह गई. ‘हंस’ तो देखा होगा. उसके लिए कुछ भेजिए. हो सके तो ‘माधुरी’ के लिए भी.”
“‘हंस’ के लिए बनारस के कार्यालय में लेख दे आया हूं.”
“असमिया गीतों पर है क्या?”
“जी नहीं, पंजाबी गीतों पर है. डरते-डरते लिखा था. यह मेरा पहला लेख है. नोक-पलक आप संवार लीजिए.” (नवंबर 1931 के ‘हंस’ में मेरा वह लेख प्रकाशित हुआ था.)
“मैं देख लूंगा,” उन्होंने हँसकर कहा, “और भी लिखिए.”
मैं उनसे आज्ञा लेकर चला आया. उनके कहकहों में मेरे लिए उनका आशीर्वाद निहित है, इसका मुझे विश्वास हो गया था. इस बीच में में दोबारा ‘हंस’ के लिए कुछ न भेज सका. ‘माधुरी’ से तो वे नवंबर 1931 में ही अलग हो गए थे.
जब ‘हंस’ भारतीय साहित्य परिषद की ओर से प्रेमचंद और कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी के संपादन में निकलना शुरू हुआ तो मैंने प्रेमचंद जी के अनुरोध पर दो लेख भेजे-‘हमारे ग्रामगीत’ और ‘शांतिनिकेतन में ग्रामगीत-चर्चा’ जो उन्होंने सहर्ष प्रकाशित किए.
अप्रैल 1936 में प्रेमचंद लाहौर आए तो उनसे दूसरी बार मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ. बोले, “अब कहां की यात्रा का इरादा है?” “देखिए जहां भी पैर का चक्कर ले जाए.”
“खुशकिस्मत हैं वे लोग जो घूम सकते हैं. घूमने से नए-नए मज़मून सूझते हैं.”
” ‘गोदान’ के बाद आप क्या लिख रहे हैं?”
“एक चीज़ शुरू तो करने जा रहा हूं. देखें, ऊंट किस करवट बैठता है.”
‘पंजाब लिटरेरी लीग’ में उनका भाषण सुना, तो यों लगा कि जीवन की भट्टी में तपने के बाद साहित्यकार ने जीवन के महान् सत्य को पा लिया है. उस भाषण की गूंज मैं अपने मस्तिष्क में आज भी सुन सकता हूं. उन्होंने साहित्यकार के सौंदर्यबोध की चर्चा करते हुए कहा था: “सौंदर्य वही है जिस से सत्य की सृष्टि हो. साहित्यकार में सौंदर्य की अनुभूति जितनी अधिक होगी, वह उतना ही बड़ा साहित्यकार होगा. मानव प्रकृति के सूक्ष्म अध्ययन से सौंदर्यबोध पनपता है….”
मुझे अमृतसर जाना था. इसलिए लाहैर में प्रेमचंद जी के अधिक निकट आने का अवसर न मिल सका. आज सोचता हूं कि मैं उनसे केवल दो बार मिला. दोनों बार एक ही चित्र देखा. हां, अप्रैल 1936 में अक्तूबर 1931 के रंग और भी गहरे हो गए थे.
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Tags: Hindi Literature, Hindi Writer, Literature
FIRST PUBLISHED : May 25, 2023, 18:57 IST








