Book Review : हर ‘असंभव के विरुद्ध’ खड़ी हैं प्रकाश देवकुलिश की कविताएं

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1992 के आसपास आकाशवाणी रांची के युवा एकांश में मैं बतौर आकस्मिक उद्घोषक जाता था. वहां जिन चंद लोगों की साहित्यिक अभिरुचि के बारे में मैंने सुना और देखा उनमें कार्यक्रम अधिशासी निवास चंद्र ठाकुर, श्रीप्रकाश और उद्घोषक कुमार बृजेंद्र से यदाकदा मेरी बातचीत होती रही. तीनों में मुझे सबसे ज्यादा चुप रहनेवाले श्रीप्रकाश ही लगते रहे. उन्हें देखकर यह बिल्कुल असंभव लगता था कि उनमें कोई विरोध या समर्थन का भी स्वर होगा. हमेशा धीर-गंभीर, चुप, कटे-कटे से, अपने में मस्त और खोए हुए दिखे. मुमकिन है कि हमदोनों की उम्र के अंतर की वजह से वह मुझसे कभी खुले नहीं और मेरे भीतर यह धारणा बनी हो.

बिल्कुल हाल के वर्षों में मैंने जाना कि श्रीप्रकाश ही प्रकाश देवकुलिश हैं. और जब उनके काव्य संग्रह ‘असम्भव के विरुद्ध’ से गुजरना हुआ तो यह जाना कि जिस श्रीप्रकाश के बारे में विरोध-समर्थन के न होने की मेरी राय थी, वह प्रकाश देवकुलिश वाकई मेरे उस ‘असंभव वाली धारणा’ के विरुद्ध खड़े हैं. तो सबसे पहले बात इनके काव्य संग्रह की, जिसका नाम है ‘असम्भव के विरुद्ध’. यह संग्रह भारतीय ज्ञानपीठ से छपकर आया है. इसमें कुल 89 कविताएं हैं.

इस संग्रह की कविताएं बताती हैं कि प्रकाश देवकुलिश संस्कृति, संस्कार और सरोकार के कवि हैं. उनकी कविताओं में मनुष्यता की ऊष्मा है. आत्मीयता का बहाव है. संवेदनशीलता की गहरी परतें हैं. वे ‘रधिया दाई’ की बात करें या ‘आनन्दी महतो की कुदाल’ की, इनसान और उसकी इनसानियत को बिल्कुल जड़ से पकड़ते हैं. उनकी कविता बताती है कि रधिया दाई जैसी घरेलू सहायिकाएं अब के दौर में भी ‘प्रफेशनल’ नहीं, ‘इमोशनल’ होती हैं. उनके लिए उनके रोजगार की जगह भी घर होती है. उस घर को भी वह अपने घर की तरह ही सजाती-संवारती हैं. घर के सदस्यों के सुख-दुख, उनके पर्व-त्योहार रधिया दाई जैसी सहायिकाओं के रोम-रोम में बसे होते हैं. पढ़ें ‘रधिया दाई’ –

कोई बोले, न बोले
करार हो, न हो
पर्व त्यौहार पर अचानक
आँगन ओसारा जरूर धोने लगती है
रधिया दाई

कोई ोके या टोके तो
उसकी बातों को
शान्ति और स्थिरता के साथ
झाड़ू से सिहार देती हैं
रधिया दाई

‘परब में न धोऐतै?’ बोल देती है
और बूढ़े काले हाथों से
परम्परा की लौ बचाती हुई
भर बाल्टी पानी उढ़ेल देती है
रधिया दाई

सादे जल से भर देती है घर में रंग
हमारे आँगन ओसारे को करके आर्द्र
खुद सूखी रोटी और सब्जी
आँचल में बाँध
खुशी-खुशी चल देती है
रधिया दाई।

प्रकाश देवकुलिश की ऐसी ही संवेदनशील कविता है ‘आनन्दी महतो की कुदाल’. आनन्दी महतो को कुदाल चलाता देख कवि आश्चर्य से भर उठता है. उस कुदाल चलाने में कवि को कला और जादू दोनों नजर आते हैं. और कवि जिस मुग्धता के साथ उसके काम और उस काम के असर का वर्णन करता है, वह अपने आप में जादुई है. वे लिखते हैं –

… पौधों की क्यारियों के बीच चलती है कुदाल
उलट-पुलच होते हैं मिट्टी के टुकड़े
कब पड़ जाती है उनपर उल्टी कुदाल
कब मिट्टी को खींच लेती है कुदाल
और कब अचानक
बेतरतीब बिछी मिट्टी
यहाँ से वहाँ तक
सजी दिखती है पौधों की जड़ों में
खाली टाँगों वाले बच्चों को
झट से पहना दी गयी हो भूरी पैंट जैसे-
फरफराते हरे शर्ट के नीचे
जैसे पौधों को बना दिया गया हो फूल
जैसे बिखरे शब्दों से बना दी गयी हो कविता
कुदाल चलाता है आनन्दी महतो या कलम?

पूरी धरती पर ऐसे ही सिरजन करते हैं
कितने-कितने आनन्दी महतो
मटमैले, झुर्रियाते चेहरे वाले आनन्दी महतो।

प्रकाश देवकुलिश की ऐसी कविताएं जहां बिल्कुल करीब से लोक के दर्शन कराती हैं, वहीं उनके तरकश में राजनीतिक चेतना से लैस कविताएं भी हैं. बल्कि ‘राजनीतिक चेतना से लैस कविता’ लिखते हुए ध्यान जाता है कि ये कविताएं राजनीतिक चेतना से ज्यादा सामाजिक चेतना से लैस हैं. राजनीतिक घटनाक्रमों पर बहुत चुप्पा ढंग से आदर्श का एक रास्ता गढ़ती हैं. जाहिर है यह रास्ता विरोध के औजार से ही बनता है.

वर्तमान राजनीति में नैतिकता का जिस तेजी से क्षरण हुआ है, घात-प्रतिघात के जितने उदाहरण हमारे सामने बार-बार आ रहे हैं, धर्म को जिस तरह से राजनीति साधने का औजार बनाया जा रहा है और ऐसे हालात में जब सुधार की उम्मीद बिल्कुल असंभव बात लगने लगी है, तो इस असंभव के विरुद्ध खड़ी दिखती है देवकुलिश की कविताएं. वे उम्मीद जगाती हैं कि परिवर्तन होगा. विरोध को स्वर देती इस संग्रह की ऐसी ही कविताएं हैं – ‘दूसरा राजा’, ‘प्राण जाए पर वचन न जाए’, ‘शर्तें’, ‘सीता-सी प्रजा’, ‘हे संजय’, ‘इतिहास से डरो’. ऐसी ही कविताओं में है ‘तुम्हारा गणित’. पढ़ें यह कविता –

उसकी पचहत्तरवीं वर्षगाँठ
इसकी दौ सौवीं
उसका दशक
इसकी शताब्दी
इसी गणित में उलझाये रखो
समझ और संवेदना को
जैसे हम खड़िया के स्लेट
तुम हाथ में लिए करतब के चौक
रगड़ देते हो हिसाब हमारे माथे पर
कि हँसना है तौल कर
गाना है गिनकर
जैसे उतनी बार धड़के दिल
जितना तुम कहो
उतना ही बने खून जितना कहे तुम्हारा बहीखाता
क्योंकि हम हो जाते हैं अचम्भित
बाजीगरी देख
पर भूलते हो
सब को कुछ दिन
कुछ को सब दिन
बनाया जा सकता है मूर्ख
सम्भव नहीं है
सब को सब दिन
रख लेना अँधेरे में।

सत्ता से सीधे संवाद करती हुई इस संग्रह में कई कविताएं हैं. लेकिन इन सब से अलग प्रकाश देवकुलिश की कविताओं का जो वैशिष्ट्य है, वह है पौराणिक संदर्भों से आधुनिकता संदर्भों की यात्रा. देवकुलिश अपनी कई कविताओं में पौराणिक संदर्भों से बात शुरू करते हैं, फिर उन संदर्भों से अब के दौर को जोड़ देते हैं. इस पूरे क्रम में कहीं कोई ‘पैच’ नजर नहीं आता, बल्कि तार्किकता इतनी सटीक होती है कि अभिव्यक्ति बेहद सहज हो जाती है. इस संदर्भ में ‘सीता-सी प्रजा’ का पाठ बार-बार किया जाना चाहिए. हालांकि यह कविता देवकुलिश की अन्य कविताओं के मुकाबले थोड़ी लंबी कविता है. ऐसे संदर्भों से रू-ब-रू होना चाहें तो ‘हे संजय’ की भी चर्चा की जा सकती है. पढ़ें यह कविता –

मैं सत्ता मोह से क्यों च्यूत हो जाऊँ
हे संजय!
क्यों मुक्त हो जाऊँ पुत्र मोह से
वो तो मिला है मुझे विरासत में

पितामह शान्तनु
स्त्री मोह में, कहो काम लिप्सा में
भूल गये राज धर्म
‘मैं आपसे विवाह करूँगी इस शर्त पर कि
मेरे किसी कार्य से आप मुझे रोकेंगे नहीं’
और आतुर शान्तनु ने दे दी अनुमति उन्मुक्त स्वच्छन्दता की
राजा पर हावी हो गया व्यक्ति

राजा की सन्तान पर प्रजा के अधिकार का हनन!
एक-एक कर सात पुत्रों की गंगा द्वारा उन्होंने हत्या देखी संजय!
हर हत्या के बाद पुनः उत्पत्ति
हे शान्तनु!!

फिर आया तात भीष्म का पितृ मोह
पिता की कामना पूर्ति के लिए आजीवन ब्रह्मचर्य!
एक बार फिर छली गयी प्रजा
राजकुमार की सन्तान पर
अपने अधिकार से हुई वंचित

तो फिर मैं राज काज को अन्धा होकर
कैसे ने चलाऊँ
अन्धा तो मैं जन्म से ही हूँ
अब पुत्र मोह में ही सही

ये परम्परा चलेगी संजय!
चलती रहेगी
राजा ही नहीं प्रजा को भी अन्धा किया जा सकेगा
जाति,
राष्ट्र सुरक्षा,
धर्म रक्षा के नाम पर,
कंगूरों पर पताका दिखा कर,
गढ़ कर विधान के अपने अर्थ
होंगे उत्सव
समस्याओं के सारे कटु सत्य को
धर्म के सारे अर्थों को
तथ्यों को
दरकिनार कर
प्रजा को हाँक लिया जाएगा

और जीवित रहेगा तुम्हारा
अन्धा धृतराष्ट्र!!

जाहिर है इन कविताओं से गुजरने के बाद यह बात समझ में आती है कि बिल्ली के गले में घंटी बांधना या राजा को नंगा बताने के लिए हमें न तो शोर करने की जरूरत है, न नंगा होने की, बल्कि पूरी शालीनता के साथ ‘असंभव’ सी लगने वाली बात के खिलाफ खड़ा हो जाना चाहिए, मुखर हो जाना चाहिए.

हाल के वर्षों में छप रही पुस्तकों में भाषा और वर्तनी की जितनी अशुद्धियां भरी रहती हैं, उसके मुकाबले यह संग्रह बिल्कुल अलग है. बल्कि कहना चाहिए कि भाषा को लेकर कवि बेहद सजग है. शब्दों की बुनावट-बनावट पर उसकी विशेष निगाह है. यही वजह है कि इस संग्रह की कविताओं से पाठक खुद को जुड़ा हुआ पाता है. वर्तमान समय की हकीकत, राजनीति का विद्रूप, धर्म का छद्म, जिम्मेवारियों का ढकोसला इन कविताओं में करीने से उभरे हैं. समाज और देश को लेकर कवि की वाजिब चिंता से रू-ब-रू करातीं ये कविताएं अपने संदर्भों में नैतिकता और शालीनता जैसे मानवीय मूल्यों की तलाश करती हैं. शुभकामना कि असंभव के विरुद्ध प्रकाश देवकुलिश की आवाज मुखर रहे.

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Up Head Line
Author: Up Head Line

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