
ईशा बिरोरिया/ऋषिकेश: देवभूमि उत्तराखंड में स्थित ऋषिकेश में कई पावन तीर्थ स्थल हैं. हर माह हजारों की संख्या में लोग यहां घूमने आते हैं. यहां कई सारे मंदिर और घाट स्थापित हैं. जबकि हर मंदिर का अपना इतिहास और अपना महत्व है. जबकि श्री नीलकंठ महादेव मंदिर का भी अपना एक रोचक इतिहास है. यहां आने वाले सभी भक्तगण भगवान शिव को गंगा जल चढ़ाते हैं और साथ ही साथ अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए मंदिर परिसर में धागा बांधते हैं. मन्नत पूरी होने पर वे धागा खोलने आते हैं.
ऋषिकेश में स्वर्गाश्रम से करीब 22 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह मंदिर काफी मान्यता है. मंदिर के पुजारी जगदीश प्रपन्नाचार्य बताते हैं कि समुद्र मंथन के दौरान भगवान शिव ने समुद्र मंथन से निकले विष कालकूट को अपनी हथेली पर समेटकर पी लिया था. उन्होंने अपनी शक्ति के प्रभाव से उस विष को अपने कंठ तक ही सीमित रखा और गले से नीचे नहीं जाने दिया. इसीलिए उन्हें नीलकंठ महादेव कहा जाता है. विष ग्रहण करने के बाद वह ऐसे स्थान की तलाश में थे, जहां उन्हें शीतल वायु मिले. घूमते घूमते वह मणिकूट पर्वत पहुंचे और वहां उन्हें वह शीतलता मिली. मान्यता है कि भोलेनाथ 60,000 वर्ष इसी स्थान पर समाधि लगा कर बैठे थे, इसीलिए स्थान को श्री नीलकंठ महादेव मंदिर के रूप में जाना जाता है.
जगदीश प्रपन्नाचार्य आगे बताते हैं कि माता पार्वती संग सभी देवी-देवता भगवान शिव को खोजने में जुट गए. जब उन्हें पता चला कि भोलेनाथ मणिकूट पर्वत पर ध्यानमग्न हैं, तो मां पार्वती वहां पहुंचीं और वहीं अपना आसन लगाकर भगवान शिव के पास बैठ गईं. जिस स्थान पर माता पार्वती बैठी थीं, उस स्थान पर नीलकंठ के निकट ही एक और मंदिर की स्थापना की गई. उन्होंने कहा कि इस मंदिर में सच्चे मन से मांगी गई हर मनोकामना पूरी होती है.
अगर आप ऋषिकेश घूमने आ रहे हैं, तो श्री नीलकंठ महादेव मंदिर के दर्शन जरूर करें. आपकी जानकारी के लिए बता दें कि यह मन्दिर स्वर्गाश्रम से करीब 22 किलोमीटर की दूरी पर है. आपको राम झूला, लक्ष्मण झूला से यहां जाने के लिए वाहन उपलब्ध हो जाएंगे. (NOTE: इस खबर में दी गई सभी जानकारियां और तथ्य मान्यताओं के आधार पर हैं. NEWS18 LOCAL किसी भी तथ्य की पुष्टि नहीं करता है.)
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FIRST PUBLISHED : May 16, 2023, 15:51 IST








