Explainer: सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कितनी बदलेगी स्पीकर और राज्यपाल की भूमिका

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महाराष्ट्र मामले में संविधान पीठ का फैसला राज्यपाल और स्पीकर की भूमिका के साथ राजनीतिक दलों के सिस्टम के बारे में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है. इस फैसले के बाद स्पीकर को विधायकों की अयोग्यता का निर्धारण करना है और स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव के मामलों सुप्रीम कोर्ट के 7 जजों की नई संविधान पीठ सुनवाई करेगी. इस फैसले से काफी कुछ चीजें बदलने वाली हैं. हम यहां ऐसे ही 9 सवालों के जवाब लेकर आए हैं, जो इस फैसले के बाद उठ सकते हैं.

  • इस फैसले के बाद सत्तारूढ़ राजनीतिक दल में दरार पड़ने या तोड़फोड़ पर राज्यपालों की भूमिका पर क्या असर होगा?

    किसी भी राजनीतिक दल में दरार पड़ने या तोड़फोड़ होने पर राज्यपाल की भूमिका पर इस फैसले में कहा गया है कि विधानसभा में फ्लोर टेस्ट कराना इसका सही तरीका नहीं है. इस बारे में राजनीतिक दलों के आंतरिक सिस्टम के अनुसार ही असंतोष के बारे में निर्णय लेना चाहिए. जहां तक राजनीतिक दलों में दरार पड़ने की बात है, उसके लिए संविधान संशोधन करके दलबदल विरोधी कानून बनाया गया था, जिसे संविधान की दसवीं अनुसूची में शामिल किया गया. इस बारे में 2003-04 में एक संशोधन भी हुआ, जिसके बाद एक तिहाई की फूट को भी गलत बताया गया. वर्तमान व्यवस्था के अनुसार दो तिहाई फूट को ही पार्टी में टूट माना जा सकता है. और इसके लिए उनकी दूसरे दल में विलय या दूसरे दल में शामिल होने की शर्त भी होती है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार इस मामले में राज्यपाल ने जल्दबाजी में फ्लोर टेस्ट का निर्णय लिया, जो गलत था.

  • क्या अब राज्यपाल स्पीकर की भूमिका पूरी होने के बाद ही दखल देंगे?

    राज्यपाल की इस मामले में अब भूमिका नहीं बची है क्योंकि राज्यपाल ने फ्लोर टेस्ट का आदेश दिया था. और उन्होंने शिंदे को मुख्यमंत्री पद के लिए बुलाया. उसके पहले उद्धव ठाकरे ने अपना त्यागपत्र दे दिया था. इसलिए इस मामले में अब स्पीकर की भूमिका अभी निर्णायक तौर पर बची हुई है. राज्यपाल की अब ज्यादा भूमिका नहीं बची है.

  • किसी सरकार को अल्पमत में मानने के लिए राज्यपाल को कौन से साक्ष्य देखने चाहिए?

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि संविधान के अनुसार राज्यपाल को मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही काम करना चाहिए. संविधान के अनुसार यदि कोई सरकार अल्पमत में आ गई है तो सारे विकल्पों के बाद ही राष्ट्रपति शासन लगना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने फैसलों के अनुसार अल्पमत का निर्धारण राजभवन की बजाय विधान सभा में होना चाहिए. इसलिए अगर कोई सरकार अल्पमत में आ गई है तो उसके लिए राज्यपाल को अविलंब विधान सभा का सत्र बुलाकर बहुमत का निर्धारण करना चाहिए.

  • एक काल्पनिक सवाल. मान लीजिए कि राजस्थान में अगर कांग्रेस के 40% या 60% विधायक टूट कर दूसरे गुट के साथ चले जाते हैं. तो क्या स्थिति बनेगी?

    राजस्थान या किसी भी अन्य राज्य में अगर पार्टी में टूट होती है तो उसके लिए दलबदल कानून के तहत दूसरे गुट को मान्यता मिलना जरूरी है. बागी गुट को मान्यता बागी या उनकी अयोग्यता के बारे में स्पीकर दसवीं अनुसूची के अनुसार फैसला ले सकते हैं. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद एक और नई बात सामने आ रही है. वह यह है कि पॉलिटिकल पार्टी को विस्तृत नज़रिए से देखने की जरूरत है। उसमें संगठन और पदाधिकारियो के साथ संसदीय दल और विधायी दल शामिल होता है. राज्य में अगर किसी राष्ट्रीय दल में तोड़फोड़ होती है तो फिर मूल दल के बारे में और भी सवाल खड़े हो सकते हैं. उन्हें अपनी मान्यता के लिए दो तिहाई बहुमत के साथ दूसरे दल में विलय करना पड़ सकता है. इसके बाद उनकी अयोग्यता का निर्धारण भी स्पीकर द्वारा किया जाएगा.

  • महाराष्ट्र में शिंदे गुट की ओर से प्रस्तावित भरत गोगावले को ह्विप नियुक्ति किए जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने खासतौर पर उंगली उठाई है. इसे किस तरह से देखने की जरूरत है?

    सुप्रीम कोर्ट के अनुसार स्पीकर ने जिस तरीके से नए व्हिप को मान्यता दी, वह पूरी तरह से गलत है. व्हिप का जो मुख्य का काम होता है, वह एक तरह से विधायकों को निर्देश देना है. व्हिप के आदेश के अनुसार ही विधायकों को मतदान करना होता है. महाराष्ट्र मामले में ठाकरे गुट द्वारा नियुक्त व्हिप के अनुसार 16 विधायकों के डिसक्वालिफिकेशन की मांग हो रही है. और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद शिंदे गुट के व्हिप की नियुक्ति गैरकानूनी हो गई है. इसलिए अब 16 विधायकों की अयोग्यता के बारे में फैसला करना जटिल प्रक्रिया हो जाएगी.

  • विधायक दल में किसी मतभेद को पार्टी में टूट नहीं माना जाना चाहिए. टूट की विवेचना करते हुए स्पीकर को पार्टी संविधान भी देखना चाहिए, इससे स्पीकर के फैसले पर क्या असर होगा?

    पार्टियों के सिस्टम के लिए रिप्रजेंटेशन ऑफ पीपुल एक्ट और चुनाव चिन्ह के लिए अलग नियम-कानून हैं. लेकिन भारत में संगठन, विधायी दल और पदाधिकारियों के सिस्टम के बारे में अभी कोई निश्चित कानूनी व्यवस्था नहीं बनी है. इसीलिए ऐसे मामलों में निर्णय लेने में चुनाव आयोग के सामने भी असमंजस की स्थिति रहती है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार सिर्फ विधायक दल में टूट को पार्टी में टूट नहीं मानना चाहिए. इस फैसले में कहा गया है कि शिवसेना के संविधान को पार्टी के दोनों धड़ों ने माना था. इसलिए संविधान के अनुसार पदाधिकारियों और सदस्यों के आलोक में यह देखने की जरूरत है कि बागी विधायकों के मामले में पार्टी का बहुमत किसके साथ है. इसके आधार पर ही चुनाव आयोग को मूल शिवसेना के बारे में फैसला करना चाहिए. लेकिन ठाकरे गुट की मांग को सुप्रीम कोर्ट ने नहीं माना, जिसमें कहा गया था कि स्पीकर का फैसला आने तक चुनाव आयोग की प्रक्रिया को रोक दिया जाए. इस मांग को भी नहीं माना गया कि डिसक्वालिफकेशन की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट द्वारा ही कर दी जाए. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह स्पीकर का कार्यक्षेत्र है, इसलिए सामान्य परिस्थितियों में कोर्ट को दखलंदाजी नहीं करनी चाहिए.

  • सुप्रीम कोर्ट ने कुछ मामले बड़ी बेंच को रेफर किए हैं. वो पूरा मसला क्या है?

    सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले से जुड़े एक पहलू को 7 जजों की बेंच को भेजा है. रेबिया मामले में 2016 में यह कहा गया था कि स्पीकर या डिप्टी स्पीकर के खिलाफ यदि कोई अविश्वास प्रस्ताव लंबित है तो वह डिस्क्वालिफिकेशन के बारे में निर्णय नहीं ले सकते. इस मामले में महाराष्ट्र में स्पीकर नहीं था और डिप्टी स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लंबित था. इसकी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने डिप्टी स्पीकर के डिसक्वालिफिकेशन प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगा दी थी. महाराष्ट्र मामले के बाद कहा जा रहा है कि स्पीकर डिसक्वालिफिकेशन प्रक्रिया शुरू करते हैं तो उनको रोकने के लिए बागी धड़े के लोग अविश्वास प्रस्ताव दायर कर सकते हैं. इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इस विसंगति से बचने के लिए पुराने फैसले पर पुनर्विचार के लिए 7 जजों की बेंच बनेगी. नई संविधान पीठ इस बारे में निर्धारण करेगी कि क्या स्पीकर या डिप्टी स्पीकर के खिलाफ यदि कोई अविश्वास प्रस्ताव लंबित है तो वो अयोग्यता के मामले में निर्णय ले सकते हैं या नहीं?

  • फैसले में कहा गया है कि दलबदल में विधान सभा से अयोग्यता मसले पर स्पीकर फैसला लें, लेकिन कितनी अवधि के भीतर यह नहीं कहा गया है. क्या इसे लेकर ठाकरे गुट फिर कोर्ट आ सकता है?

    दलबदल के मामले में अयोग्यता का फैसला स्पीकर लेते हैं. लेकिन इसके लिए निश्चित समयसीमा का निर्धारण नहीं किया गया है. चूंकि सुप्रीम कोर्ट में महाराष्ट्र का मामला चल रहा था, इसलिए भी स्पीकर फैसला नहीं ले रहे थे. इस तरह के कई मामले दूसरे राज्यों से भी सुप्रीम कोर्ट में आए हैं, जिसमें यह मांग की गई कि एक निश्चित समयसीमा के भीतर स्पीकर अयोग्यता के बारे में फैसला लें. स्पीकर का फैसला ज्यूडिशियल रिव्यू के दायरे में आता है. स्पीकर के फैसले के खिलाफ जो भी पक्ष प्रभावित होगा, वह सुप्रीम कोर्ट जा सकता है. लेकिन अयोग्यता का फैसला स्पीकर को ही लेना है और इसे लेकर संविधान में कोई समयसीमा निर्धारित नहीं की गई है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले से साफ है कि महाराष्ट्र में स्पीकर को इस मामले में जल्द फैसला लेना होगा.

  • किस तरह से कोई राज्यपाल ये निष्कर्ष निकाले कि राज्य की सरकार अल्पमत में है, संविधान के आलोक में?

    सरकारों के बहुमत के बारे में बोम्मई मामले से लेकर कई अन्य मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसले हैं. उनमें साफ है कि यदि किसी बहुमत वाली सरकार के बारे में अल्पमत का संदेह हो तो फिर तत्काल विधानसभा का सत्र बुलाकर वहां पर बहुमत का निर्धारण होना चाहिए. ऐसे मामलों में एक बड़ी दिक्कत यह है कि बागी गुट को डिसक्वालिफिकेशन प्रक्रिया का सामना करना पड़ता है. ऐसे लोग व्हिप का पालन करें या नहीं करें? बागी गुट को व्हिप का पालन किए बगैर उन्हें दूसरे ग्रुप के तौर पर विधानसभा के सत्र में शामिल होने का मौका कैसे दिया जाए? इस बारे में साफ है कि फैसला विधानसभा के अध्यक्ष को ही लेना होगा. यह उनका कार्यक्षेत्र है. राज्यपाल की भूमिका के बारे में यह स्पष्ट है कि बहुमत का फैसला विधानसभा में ही होना चाहिए, राजभवन में नहीं.

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    FIRST PUBLISHED : May 12, 2023, 20:36 IST

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    Author: Up Head Line

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