
कृष्ण कुमार/ नागौर. राजस्थान में कई ऐसे धर्म स्थल हैं, जहां किसी न किसी समाज की आस्था जुड़ी हुई है. ऐसा ही एक धार्मिक स्थल नागौर के टांकला गांव में भी बना हुआ है, जो कुम्हार/प्रजापत समाज के आस्था का केंद्र है. जी हां यह है श्री श्री यादें माँ का मदिर जहां लोग अपनी शारीरिक पीड़ाओं को दूर करने के लिए आते है. मान्यता है कि यादें माँ ही वहीं स्त्री थी जिसकी विष्णु भक्ति देख प्रह्लाद ने भी भक्ति शुरू की थी और इन्होने प्रह्लाद को अपना दूध भी पिलाया था.
मंदिर के पुजारी सीताराम ने बताया कि श्रीयादे माता का जन्म सतयुग के प्रथम चरण में इन्डावृत्त में लायड जी जालंधर की पुत्री के रूप में माघ सुदी 2 (दूज ) को हुआ वे बचपन से ही धर्म भीरु थी और उनके गुरु उड़न ऋषि थे. श्रीयादे का विवाह गढ़ मुल्तान के सावंत के साथ हुआ. गढ़ मुल्तान हिरण्यकश्यप की राजधानी थी. हिरण्यकश्यप को ब्रह्माजी ने उसकी तपस्या के कारण अमर रहने का वरदान था. सवंतोजी व श्री श्रीयादे माता का परिवार ही वहां गुप्त रूप से भक्ति करते थे व् मिटटी के बर्तन बनाते व् भगवन का भजन करते थे. प्रह्लाद ने जन्म से सात दिन तक माता का दूध नहीं पिया. हिरण्यकश्यप ने घोषणा की कि जो कोई उसे दूध पिलाएगा उसे पुरुस्कार दिया जायेगा , विष्णु भक्त श्रीयादे माता ने प्रह्लाद को दूध पिलाने का जिम्मा लिया व भक्त प्रह्लाद को दूध पिलाया व ईश्वर भक्ति का स्मरण करवाया.
एक अन्य मान्यता के अनुसार एक बार माता ने भूल से बिल्ली के बच्चों वाला मटका न्याव (भट्टी ) में पकने के लिए रख दिया. जिसमें बिल्ली ब्याई हुई थी. बिल्ली के बच्चों की रक्षा के लिए श्रीयादें माता और सांवतों हरि से प्रार्थना कर रहे थे. हरि नाम की महिमा से बिल्ली के बच्चे दहकते हुए न्याव में पकने के बाद जीवित निकल गए. प्रह्लाद ने हरि नाम का प्रभाव अपनी आँखों से देखा व बिल्ली के जीवित बच्चों को देख प्रह्लाद ने जीवित बच्चों वाला मटका देखा, वह एकदम कच्चा था. बाकि सारे पाक गए माता ने दूध व हरि नाम का मंत्र याद दिलाया और हरि नाम लिया. जिसके बाद प्रह्लाद भी हरि नाम जपने लगे.
टांकला गांव में बना श्री श्री यादे मां का मंदिर की मान्यता है कि यहां पर किसी व्यक्ति को दुख या शारीरिक पीड़ा होती है मंदिर में परिक्रमा देने से छुटकारा मिलता है. साथ ही अगर किसी के सिरदर्द, हाथ पैरों में दर्द की समस्या होती है तो उस से भी छुटकारा मिलता है. मंदिर पुजारी सीताराम ने बताया कि इस जगह पर पहले एक मूर्ति थी लेकिन गांव के रहने वाले एक व्यक्ति मंगाराम प्रजापत के सपने में आकर मां ने दर्शन दिए और कहा कि यहां पर मेरा मंदिर बनवाओ तो 2011 में मंदिर का पुर्ननिर्माण करवाया गया.
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FIRST PUBLISHED : May 07, 2023, 16:10 IST








