Pillars of Islam: इस्लाम की बुनियाद पांच स्तंभों पर टिकी है. इनमें तौहीद या शहादा, नमाज़, रोज़ा, ज़कात और हज शामिल हैं. इन्हें अरकान-ए-इस्लाम और अरकान-ए-दीन भी कहा जाता है. हर मुसलमान को ताउम्र इनको अपनी जिंदगी का आधार मानकर चलना होता है. सुन्नी मुसलमान इस्लाम के पांच स्तंभ मानते हैं तो शिया मुस्लिम छह अरकान मानते हैं. सबसे पहले बात करते हैं तौहीद या शहादा की. तौहीद के मायने हैं, एक अल्लाह को मानना. उसकी जात में किसी दूसरे को शरीक ना करना. साथ ही इसका मतलब अल्लाह के नबी को आखिरी पैगंबर मानना है.
तौहीद का मतलब है कि इस ऐलान से हर मुसलमान अल्लाह के एक होने और मुहम्मद के रसूल होने के अपने भरोसे की गवाही देता है. यह इस्लाम का प्रमुख सिद्धांत है. हर मुसलमान के लिए इसे स्वीकार करे. इस्लाम को मानने वालों के मुताबिक, आखिरी पवित्र किताब क़ुरान-ए-पाक है. वहीं, हर मुसलमान आदमी और औरत के लिए पांच वक्त की नमाज़ पढ़ना अनिवार्य बताया गया है. यह अरबी भाषा में विशेष नियम से पढ़ी जानी वाली प्रार्थना, जिसमें इंसान अल्लाह के प्रति अपनी कृतज्ञता दर्शाता है. नमाज़ काबा की तरफ मुंह करके पढ़ी जाती है. सिर्फ खास मजबूरी या बीमारी की हालत में ही इसे टाला जा सकता है.
इस्लाम के पांच स्तंभ.
रोज़ा रखने के इस्लाम में बताए हैं दो मकसद
फिर इस्लाम को मानने वाले हर शख्स के लिए रोज़ा रखना बेहद जरूरी है. इसे रमजान का चांद दिखने से लेकर ईद का चांद दिखने यानी अगले 29 या 30 दिनों तक रखने का हुक्म है. इसे सौम भी कहा जाता है. रमजान का महीना इस्लामी कैलेंडर के नौवें महीने में आता है. रोज़ा में सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक बिना अन्न जल लिए व्रत रखना होता है. यहां तक कि रोज़ेदार को स्लाइवा गटकने की भी मनाही होती है. इस दौरान रोज़ेदार शारीरिक संबंध भी नहीं बना सकते हैं. इस्लाम को मानने वालों के मुताबिक, रोज़ा रखने के दो प्रमुख मकसद होते हैं. पहला दुनियादारी के बंधनों से ध्यान हटाकर अल्लाह से नजदीकी महसूस करना. दूसरा, गरीबों, भिखारियों और भूखों की समस्याओं को सुलझाना.
सक्षम मुसलमान को हर साल करनी है ज़कात
इस्लाम के चौथे अरकान में ज़कात आती है. इसे हर उस मुसलमान का फर्ज बताया गया है, जिसके पास साढ़े सात तोले सोना या साढ़े 52 तोले चांदी या इनके बराबर रकम हो. हर मुसलमान को साल में एक बार ज़कात फर्ज की गई है. इसमें सक्षम मुसलमान गरीब मुसलमानों को दान करता है. ज्यादातर मुसलमान अपनी सालाना आमदनी का 2.5 फीसदी ज़कात में देते हैं. इसे इसलिए जरूरी बताया गया है, क्योंकि इस्लाम के मुताबिक इंसान के पास जो कुछ भी है, वो अल्लाह की देन है. ज़कात देने से जान और माल दोनों की हिफाजत होती है. हालांकि, ज़कात के लिए ये जरूरी है कि बताई गई रकम उसके पास एक साल होनी चाहिए.
इस्लाम में हर मुसलमान के लिए रमजान के महीने में रोज़ा रखना जरूरी बताया गया है.
कम से कम एक बार हज करना फर्ज है
हर सक्षम मुसलमान पर जिंदगी में कम से कम एक बार हज करना फर्ज है. इसमें भी एक शर्त है कि हज पर जाने वाले के पास यात्रा के दौरान रहन-सहन और आने-जाने का खर्च उठाने लायक रकम होनी चाहिए. हज इस्लामी कैलेंडर के 12वें महीने में मक्का में जाकर की जाती है. हर साल पूरी दुनिया से इस्लाम को मानने वाले सऊदी अरब के मक्का में हज के लिए पहुंचते हैं. हज यात्रा में कुल 5 दिन लगते हैं. यात्रा बकरीद के साथ पूरी मानी जाती है. इस्लाम को मानने वालों के मुताबिक, साल 628 में पहली बार पैग़ंबर मोहम्मद ने 1400 अनुयायियों के साथ हज यात्रा शुरू की थी.
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FIRST PUBLISHED : June 27, 2023, 20:12 IST






