इस शहर में बना था बिना घड़ियों का घंटाघर, असहयोग आंदोलन में आजादी के दीवानों ने फहराया था तिरंगा

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प्रदीप धनखड़/झज्जर.हमारे देश में ऐसी कई ऐतिहासिक धरोहर हैं. जो अंग्रेजी हुकूमत के दौरान आजादी की लड़ाई की ग्वाह बनी. हरियाणा के झज्जर जिले में एक ऐसी धरोहर है जो ना सिर्फ जंग-ए-आजादी की बल्कि 101 साल पहले हुए असहयोग आंदोलन की गवाह है. झज्जर जिले में बने टाउन हॉल में 101 साल पहले अंग्रेजों का झंडा हटाकर भारतीय तिरंगे को फहराया गया था. शहर के बीचों-बीच स्थित इस टाउन हॉल यानि की घंटाघर ने न सिर्फ सर्दी,गर्मी के बदले मौसम देखे. बल्कि अपनी जान की बाजी लगा देने वाले देशभक्त भी देखे. घंटाघर में लगी घड़ी की सुइयों ने देश को आजाद होते हुए भी देखा और विकास के पथ पर चलते हुए भी देखा. ये घड़ियां सिर्फ समय नहीं बताती बल्कि समय के साथ हुए बदलाव की भी गवाह हैं. जहां से आज भी युवा आजादी की लड़ाई लड़ने वाले रणबांकुरों के जीवन से प्रेरणा लेते हैं.

झज्जर  इस टाउन हॉल पर 101 साल पहले असहयोग आंदोलन के दौरान स्वतंत्रता सेनानी राव मंगली राम के कंधे पर चढ़कर पंडित श्रीराम शर्मा ने लाला हरीचंद जैन के साथ मिलकर अंग्रेजों के झंडे को उतारकर तिरंगा झंडा फहराया था. तत्कालीन अंग्रेज थाना प्रभारी द्वारा गोली मारने की धमकी की चिंता किए बगैर तिरंगा फहराया था. इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज इस घटना की वजह से झज्जर का टाउन हॉल देशभर में आजादी के परवानों की चर्चा में शामिल हुआ था.

1905 में हुआ था निर्माण
झज्जर का टाउन हॉल घंटाघर नाम से भी प्रसिद्ध है. जब 1905 में टाउन हॉल का निर्माण करवाया गया था .उस दौरान यहां घड़ियां नहीं थी. झज्जर के बारे में ये बात प्रसिद्ध थी कि यहां बिना घड़ियों के घंटाघर है और बिना सेना के छावनी नाम की जगह. लेकिन बाद में अंग्रेजों ने इस टाउन हॉल पर समय देखने के लिए घड़ियां लगवाई .

फिर पुराने स्वरूप में लौटा घंटाघर
1905 में बने इस घंटाघर की हालत कुछ समय पहले खराब हो चुकी थी.2022 में झज्जर जिले के तत्कालीन डीसी श्याम लाल पुनिया ने इस बिल्डिंग को पुराने स्वरूप में लाने का प्रयास किया और यहां लगी घड़ियों को ठीक करवाया, दीवारों की रंग पुताई करवाई गई. यहां तिरंगा फहराने वाले तीनों स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों को भी सम्मानित किया गया. ताकि सूबे के युवा इससे जुड़ी गाथाओं को जान सकें और देशभक्ति की प्रेरणा ले सकें.

क्या था असहयोग आंदोलन ?
अंग्रेजों के शासनकाल को खत्म करने के लिए महात्मा गांधी द्वारा 1920 में असहयोग आंदोलन की शुरुआत की गई थी. आंदोलन के जरिए भारत की ब्रिटिश सरकार को भारत को स्वशासन या स्वराज प्रदान करने के लिए विवश करने का प्रयास किया गया था. यह महात्मा गांधी का बड़े पैमाने पर सविनय अवज्ञा अर्थात सत्याग्रह के पहले संगठित प्रयासों में से एक था. हालांकि हिंसक होने के कारण इस आंदोलन को महात्मा गांधी ने वापिस ले लिया था. आंदोलन वापिस लेने से पहले ही झज्जर के तीन स्वतंत्रता सेनानियों की तिकड़ी ने झज्जर में अपने जान की परवाह किए बगैर टाउन हॉल यानि घंटाघर पर अंग्रेजों का झंडा उतार कर तिरंगा फहराया था.

Tags: Freedom Movement, Haryana news, History of India, Jhajjar news, Local18

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Up Head Line
Author: Up Head Line

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