
मनमोहन सेजू/ बाड़मेर. किसानों का अपने मवेशियों से हमेशा से चोली-दामन का साथ रहा है. मवेशियों के लिए यदि हरे चारे का सही इंतजाम हो तो उनकी सेहत और उत्पादकता में चार चांद लग जाते हैं. साल में एक बार बरसने वाले पानी से उगने वाले बाजरा और ग्वार की सूखी डंठल को चारे के रूप में बरसों से उपयोग में लिया जाता रहा है, लेकिन अब पशुधन के चारे में हुए नवाचार ने आलम बदल दिया है. अब सीमावर्ती बाड़मेर जिले में किसान पशुओं के लिए नेपियर घास उगा रहे है.
वैसे तो किसान हरे चारे के लिए नेपियर, बरसीम, जिरका, गिनी और पैरा जैसी अनेक घास उगाते हैं, लेकिन पोषक तत्वों से भरपूर पशु आहारों में नेपियर घास को सर्वाधिक पोष्टिक तत्वों वाला माना गया है. नेपियर घास बहुत तेज़ी से बढ़ती है और जल्द ही इंसानों से भी ऊंची हो जाती है, इसलिए इसे ‘हाथी घास’ भी कहते हैं. इसमें ‘आम के आम, गुठलियों के दाम’ वाली ख़ूबियां मौजूद हैं. नेपियर घास की एक बार बुवाई करने के बाद यह लगातार पांच साल तक फसल देती है. हर 2 से 3 महीने में घास की उंचाई 15 फीट हो जाती है.
नेपियर घास को बार-बार निराई, गुडाई या रासायनिक खाद व कीटनाशकों की भी जरूरत नहीं होती है. बेहद कम खर्च में तैयार होने वाली इस घास से हर 3 महीने में एक बीघा में कटाई से किसान 20 टन से ज्यादा उपज ले सकता है. इससे किसान को सालाना एक बीघा से एक लाख रुपए तक कमाई हो जाती है.
सरहदी बाड़मेर जिले के सीमावर्ती जानपालिया के किसान बालाराम भाखर बताते है कि नेपियर घास की खेती हर तरह की मिट्टी में होती है. इसे ज़्यादा सिंचाई की ज़रूरत नहीं होती. इसलिए हरे चारे की लागत भी कम बैठती है. इसे एक बार लगाने के बाद पशुपालकों को चार-पांच साल तक लगातार हरा चारा मिलता रहता है. नेपियर घास की पहली कटाई जहां 60-65 दिनों में करते हैं, वहीं इसके बाद हरेक 30-35 दिन पर यानी साल में 6 से 8 बार काट सकते हैं.
कम पानी और मिट्टी से कम पोषक तत्वों की अपेक्षा रखने वाली नेपियर भूमि संरक्षण के लिए उपयुक्त है. इसमें प्रोटीन 8-10 फ़ीसदी, रेशा 30 फ़ीसदी और कैल्सियम 0.5 फ़ीसदी होता है. किसान बालाराम बताते है कि उनके खेत से करीब 400 किसानों ने नेपियर घास ले जाकर लगाई है.
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FIRST PUBLISHED : June 25, 2023, 14:04 IST





