हाइलाइट्स
1980 के दशक में वीपी सिंह कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में गिने जाते थे.
1987 में बोफोर्स घोटाले के मामले को लेकर उन्होंने रक्षा मंत्री पद और फिर कांग्रेस छोड़ दी.
1989 चुनावों में वे बोफोर्स मुद्दे को जनता तक ले गए और सरकार के पतन के कारण बने.
एक समय था जब भ्रष्टाचार एक मुद्दा हुआ करता था. लेकिन अब तो भ्रष्टाचार एक मुद्दा होना सपने जैसा हो गया लगता है. देश में केवल भ्रष्टाचार के नाम पर किसी सरकार को सफलतापूर्वक गिराने की कहानी अगर बताई जाती है तो वह है विश्वनाथ प्रताप सिंह की कहानी. यह देश की विडम्बना ही कही जाएगी कि देश का सबसे चर्चित घोटालों में से एक रहा बोफोर्स घोटाला लंबे समय तक न्याय प्रक्रिया में उलझा रहा. लेकिन विश्वनाथ प्रतापसिंह ने उसे मुद्दा बना कर 1989 के आम चुनाव में कांग्रेस को हरा कर अपने लिए सत्ता की राह बनाई थी. 25 जून को उनकी जन्मतिथि है. इस मौके पर हम उन्हीं की चर्चा करेंगे.
छात्र जीवन में ही राजनीति
विश्वनाथ प्रताप सिंह का जन्म 25 जून 1931 को उत्तरप्रदेश के इलाहबाद (अब प्रयागराज) जिले में मंडा रियासत के राजा बहादुर राय गोपाल सिंह के यहां हुआ था. कर्नल ब्राउन कैम्ब्रिज स्कूल देहरादून में उनकी पढ़ाई हुई और फिर इलाहबाद यूनिवर्सिटी से उन्होंने कला में स्नातक कर कानून की पढ़ाई की. बाद में पुणे यूनिवर्सिटी से उन्होंने भौतिकी में भी स्नातक की डिग्री हासिल की. राजनीति खून में होने के कारण कॉलेज के समय ही वे राजनीति से जुड़ गए थे और छात्र संगठन के उपाध्यक्ष बने.
बढ़ता रहा राजनीती में कद
विश्वनाथ प्रताप सिंह ने 1957 में भूदान आंदोलन में अपनी जमीनें दान में दे दीं. कांग्रेस से वे शुरू से ही जुड़े गए थे. वे इलाहाबाद अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के अधिशासी प्रकोष्ठ के सदस्य भी रहे. धीरे धीरे उनका कांग्रेस में कद बढ़ता चला या. और 1980 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी बन गए . इसके बाद 1983 में केंद्रीय वाणिज्य मंत्री भी बने. उस समय वे प्रधानमंत्री इंदिरागांधी के काफी करीबी नेताओं में से एक माने जाते थे. इंदिरा गांधी की मृत्यु के बाद राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद वे देश के वित्तमंत्री तक बने.
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बोफोर्स घोटाले से बदले हालात
1987 तक सिंह कांग्रेस के शीर्ष और प्रमुख नेता तो थे, और उस समय देश के रक्षा मंत्री थे. लेकिन उसके बाद बोफोर्स घोटालासामने आ गया. पहले तो सिंह ने खुद ही घोटाले से खुद को अलग दिखाते हुए इस्तीफा दे दिया. इसके बाद घोटाले का विरोध करते हुए कांग्रेस के भी विरोधी हो गए और जनता दल नाम की खुद की एक पार्टी बना ली और 1989 में होने वाले चुनाव में भ्रष्टाचार को मुद्दा बना दिया.
वीपी सिंह के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने बोफोर्स के मुद्दे को बखूबी भुनाया था. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Wikimedia Commons)
काम कर गया बोफोर्स मुद्दा
1989 के आमचुनाव में कांग्रेस को बड़ी हार का सामना करना पड़ा और राजीव गांधी सत्ता से हाथ धो बैठे. बोफोर्स का मुद्दा काम कर गया और वीपी सिंह चुनाव में जीतने के बाद भारतीय जनता पार्टी के साथ मिल कर सत्ता हासिल कर देश प्रधानमंत्री बन गए. लेकिन आज के हालात देख कर यह सब आसान नहीं लगाता है. ये वीपी सिंह ही थे जिन्होंने राजीव गांधी और काग्रेस पार्टी के खिलाफ एक जनमानस बनाने में सफलता पाई.
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वीपी सिंह की भूमिका
बोफोर्स का मुद्दा लेकर वे जनता के बीच माइकल लेकर पहुंच गए और लोगों क बोफोर्स घोटाले की जानकारी दी. उन्हीं के प्रयासों का नतीजा था कि उत्तर प्रदेश की जनता कांग्रेस से दूर होती चली गई और प्रदेश से कांग्रेस का सफाया सा हो गया और पांच साल पहले जिस पार्टी ने लोकसभा में उत्तर प्रदेश से 85 में 83 सीटें जीती थीं वह 1989 में 15 पर सिमट गई जबकि सिंह की जनता दल को 54 सीटें मिलीं.
वीपी सिंह का कार्यकाल बहुत अधिक विवादों और अस्थिरता भरा रहा था. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Wikimedia Commons)
सरकार और विवाद
उसके बाद देश भ्रष्टाचार का मुद्दा कभी इतना प्रभावी नहीं दिखाई नहीं दिया. बहरहाल वीपी सिंह की पार्टी को 144 सीटें मिली जिसके बाद जनता दल, वाम मोर्चा और भारतीय जनता पार्टी के सहयोग से राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार बनाने का फैसला हुआ और सिंह प्रधानमंत्री बन गए. उनके कार्यकाल में उन्हें मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू कर वे समाजिक न्याय के पैरौकार बने. इसके अलावा कश्मीर में अशांति, जैसे कई मद्दों के रहते उनका राम मंदिर पर सहयोगी भाजपा से विवाद हो गया और भाजपा ने उनसे समर्थन वापस लेकर उनकी सरकार गिरा दी.
सरकार गिरने के बाद वीपी सिंह के संयुक्त मोर्चे में फूट पड़ गई. खुद जनता दल बिखर गया और फिर वीपी सिंह राजनीति में पहले की सक्रिय नहीं रहे. लेकिन वे गरीबों के लिए अपने कार्य करते रहे, जनता के बीच सामाजिक न्याय की चर्चा करते रहे लेकिन राजनीति में दिखना कम होते गए. 1996 में एक बार फिर उन्हें संयुक्त मोर्चा के नेता के रूप में प्रधानमंत्री पद की पेशकश हुई, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया. फिर उन्होंने समाज सेवा और पेंटिंग परही ध्यान केंद्र रखा, फिर स्वास्थ्य कारणों से वे सक्रिय राजनीति से पूरी तरह से दूर रहे और 27 नवंबर 2008 को उनका देहांत हो गया.
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Tags: India, Indian politics, Research
FIRST PUBLISHED : June 25, 2023, 06:54 IST






