कुमाऊं में इस तरह रखा जाता स्मृतियों को जीवित, वीरता का प्रतीक हैं ‘बिरखम’

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हिमांशु जोशी/पिथौरागढ़. उत्तराखंड का कुमाऊं मंडल अपने में अनेकों इतिहास समेटे हुए है, जहां राजाओं और उनके शासन से जुड़े तमाम प्रतीक और अभिलेख आज भी देखने को मिलते हैं. इतिहासकारों के अनुसार कुमाऊं में सबसे पहले चंद राजाओं का शासन था, जिसकी राजधानी काली कुमाऊं यानी वर्तमान का चंपावत जिला मानी जाती है. यहां के भू- भाग को जीतने के लिए जितनी भी लड़ाइयां लड़ी गयी, उसके प्रतीक के रूप में कुमाऊं में हर जगह बिरखम बनाये गए, जिसे वीर स्तम्भ के रूप में देखा जाता है.

मध्य हिमालयी क्षेत्र में बिरखम को ‘वीर का खंभा’ के नाम से जाना जाता है. चंदकालीन बिरखम अभिलेखों में इन्हें कीर्ति स्तंभ कहा गया है. कुमाऊं का क्षेत्र बिरखम निर्माण की परंपरा की दृष्टि से काफी समृद्ध माना जाता है. स्थानीय मान्यता है कि इन बीरखमों की स्थापना का उद्देश्य पराक्रमी पुरुषों, योद्धाओं तथा वीरों की चिर स्मृतियों को जीवित रखना था. बिरखमों के निर्माण का अन्य मकसद मार्ग संकेतक, धर्मशाला, मंदिर, किले, नौलों की जानकारी लोगों को देना था. इसके अलावा सीमांकन एवं प्रतीकों के रुप में भी इन बिरखमों का निर्माण किया गया था.

क्यों गायब हो गए बिरखम ?
कुमाऊं में मिलने वाले अधिकांश बिरखम ‘कत्यूरी’ एवं ‘चंद शासकों’ के समय बने हुए हैं, चंपावत जिले में तो इन बिरखमों की पूजा भी की जाती है और पिथौरागढ़ जिले की बात करें तो यहां बजेटी गांव में एक बिरखम अभी भी देखा जा सकता है, जिस पर घोड़े में बैठे सैनिक और एक हाथ में तलवार लहराने की आकृति अभी भी देखी जा सकती है. पिथौरागढ़ में भी विभिन्न जगहों पर बिरखमों का निर्माण किया गया था, लेकिन संरक्षण ना मिल पाने के कारण अधिकांश बिरखम गायब हो गए.

पराक्रम की निशानी है बिरखम
जानकारों के मुताबिक अभी यह बिरखम अस्कोट, बजेटी और चंपावत जिले में ही देखने को मिलते हैं. बजेटी निवासी राजीव सिंह डुंगरियाल ने जानकारी देते हुए बताया कि बजेटी में भी चंद राजाओं ने लंबे समय तक शासन किया. यह जगह पुरानी तहसील भी रही है. यहां चंद राजाओं ने बिरखम का निर्माण 12वीं सदी में किया था, जो उस समय राजाओं के पराक्रम की निशानी थे, जिसका संरक्षण करके आज भी जीवित रखा गया है.

Tags: Local18, Pithoragarh news, Uttarakhand news

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Up Head Line
Author: Up Head Line

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