Rani Durgavati: गोंडवाना की रानी जिसने अकबर और मुगलों की नाक में किया था दम

हाइलाइट्स

रानी दुर्गावती ने मुगलों की अधीनता स्वीकारने की जगह उनसे बार बार युद्ध किया.
बार मुगल सेना को हराने के बाद तीसरी बार उन्होंने युद्ध में खुद का बलिदान कर दिया.
वीरता के साथ ही उन्हें उनके जनलकल्याणकारी शासन के लिए याद किया जाता है.

भारत के इतिहास में मुगलों  को चुनौती देने वाले शासकों की सूची में महाराणा प्रताप और शिवाजी महाराज का नाम प्रमुखता से लिया जाता है. लेकिन इस सूची में ये दो नाम अकेले नहीं थे. इसमें एक नाम गोंडवाना की रानी दुर्गावती का भी है जिन्होंने अकबर की सेना में नाक में दम कर दिया था. 24 जून को उनका बलिदान दिवस मनाया जा रहा है. उन्हें ना केवल आखिरी दम तक मुगल सेना को रोकर अकबर की उनके राज्य पर कब्जा करने की हसरत को कभी पूरा नहीं होने दिया. आज भी गोंडवाना क्षेत्र में उन्हें उनकी वीरता और अदम्य साहस के अलावा उनके किए कए जनकल्याण कार्यों के लिए याद किया जाता है.

मां दुर्गा की तरह ही निकली रानी
450 साल पहले मुगल शासक अकबर और उनके सेना का मानमर्दन करने वाली रानी दुर्गावती का जन्म 24 जून को 1524 को बांदा जिले में कलिंजर के चंदेला राजपूत राजा कीर्तिसिंह चंदेल के घर में इकलौती संतान के रूप में हुआ था. दुर्गा अष्टमी के दिन उनका जन्म होने के कारण उनका नाम दुर्गावती रखा गया जो आगे चलकर उनके जीवन चरित में फलीभूत भी होता दिखा. दुर्गा माता जैसे अपने भक्तों की देखभाल करती है, उन्होंने अपनी प्रजा का भी ख्याल रखा.

विवाह के बाद जल्दी ही पति का निधन
उन्होंने बचपन से ही घुड़सवारी, तलवारबाजी, तीरंदाजी जैसी युद्ध कलाओं की शिक्षा ली थी। अकबरनामा में भी रानी दुर्गावती का जिक्र है जिसमें कहा गया है कि वो तीर और बंदूक चलाने में माहिर थीं. दुर्गावती के पति दलपत शाह का मध्य प्रदेश के गोंडवाना क्षेत्र में रहने वाले गोंड वंशजों के 4 राज्यों, गढ़मंडला, देवगढ़, चंदा और खेरला, में से गढ़मंडला पर अधिकार था. दुर्भाग्यवश रानी दुर्गावती से विवाह के 7 वर्ष बाद ही राजा दलपतशाह का निधन हो गया.

पति के निधन के बाद संभाला शासन
पति के निधन के समय समय दुर्गावती के पुत्र नारायण की उम्र मात्र 5 वर्ष की ही थी. इसलिए रानी ने स्वयं ही गढ़मंडला का शासन अपने हाथों में ले लिया.  उनके राज्य का केंद्र वर्तमान जबलपुर था. रानी ने 16 साल तक इस क्षेत्र में शासन किया और एक कुशल प्रशासक की अपनी छवि निर्मित की.

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रानी दुर्गावती बहुत वीर होने के साथ ही बुद्धिमान शासिका भी थी. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Wikimedia Commons)

शेर के शिकार में खासी रुचि
रानी का शासन से अधिक उनके पराक्रम और शौर्य के चर्चे ज्यादा थे. कहा जाता है कि कभी उन्हें कहीं शेर के दिखने की खबर होती थी, वे तुरंत शस्त्र उठा कर चल देती थीं और और जब तक उसे मार नहीं लेती, पानी भी नहीं पीती थीं. लेकिन  मानिकपुर के सूबेदार ख्वाजा अब्दुल मजीद खां ने रानी दुर्गावती के विरुद्ध अकबर को उकसाते हुए उनके सौंदर्य की बहुत तारीफ की. अकबर अन्य राजपूत घरानों की विधवाओं की तरह दुर्गावती को भी रनिवासे की शोभा बनाना चाहता था.

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अकबर का आदेश
बताया जाता है कि अकबर ने रानी दुर्गावती को एक सोने का पिंजरा भेजकर कहा था कि रानियों को महल के अंदर ही सीमित रहना चाहिए, लेकिन दुर्गावती ने तीखा जवाब दिया जिससे अकबर तिलमिला उठा. अकबर वैसे भी अपना साम्राज्य का दक्षिण में विस्तार कर ही रहा था और मालवा पर कब्जाकर चुका था. उसने गोंडवाना को भी अपने कब्जे में करने के लिए आसिफ खां को गोंडवाना में आक्रमण करने का आदेश दिया.

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दुश्मनों के हाथों मरने से पहले उन्होंने खुद को ही मारना बेहतर समझा था. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Wikimedia Commons)

पहले हमले में रानी की जीत
अकबर की सेना द्वारा गोंडवाना में हमले के दौरान दुर्गावती ने अपने बेटे नारायण के साथ घोड़े में सवार होकर तलवार लेकर दुश्मनों पर हमला कर दिया. उनके साहस को देखकर मुगल सेना में भगदड़ मच गई इस हार से घबराकर आसिफ खां ने रानी को शांति का प्रस्ताव भेजा, लेकिन रानी ने प्रस्ताव ठुकरा दिया. लेकिन आसिफ खां ने कुछ दिन बाद दूसरी बार हमला किया  और फिर मुंह की खाई.

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तीसरी बार आसिफ खां ने दोगुनी ताकत से हमला किया. इस युद्ध में रानी के वीर पुत्र वीर नारायण ने सैकड़ों सैनिकों को मारकर वीरगति को प्राप्त की. 24 जून 1564 को हुए हमले में रानी ने केवल 300 सैनिकों साथ सैंकड़ों मुगल सैनिकों को मारा और बहादुरी से लड़ रही थीं कि अचानक एक तीर आकर उनकी आंख में लगा लेकिन उन्होंने खुद को दुश्मनों को जिंदा पकड़ने नहीं दिया अपनी ही कटार छाती में उतार कर बलिदान दे दिया. जबलपुर के पासमंडला रोड पर स्थित रानी की समाधि बनी है.

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Author: Jagran Times

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