आखिरी ख्वाहिश! जब कैंसर पीड़ित ने वायलिन की धुन पर बजाई ‘एक प्यार का नगमा है’… सुनकर आंखों से छलके आंसू


हाइलाइट्स

कोलन कैंसर से जूझ रहे अरविंद पांडेय अपने जीवन के अंतिम दौर में हैं
उनकी इच्छा थी कि वे वायलिन बजाएं और पूरी दुनिया उन्हें सुने

वाराणसी. मौत की वो आखिरी धुन जिसका गवाह बना वाराणसी का महामना मालवीय कैंसर हॉस्पिटल. कहानी पूरी हकीकत है, जहां ‘एक प्यार का नगमा है, मौजों की रवानी है, जिंदगी और कुछ भी नहीं तेरी-मेरी कहानी है…. की धुन वायलिन पर बज रही थी और हर एक शख्स की आंखें आंसूओं से भीगी हुई थीं. कैंसर पीड़ित अरविंद पांडेय जैसे-जैसे मन के भावों को वायलिन के तारों पर छेड़ रहे थे तो जीवन के साथ बहते हुए संगीत की धुन नश्वर जीवन का अहसास करा रही थीं.

कोलन कैंसर से जूझ रहे अरविंद पांडेय अपने जीवन के अंतिम दौर में हैं. अब दवाएं भी काम नहीं कर रही हैं. उनकी अंतिम इच्छा थी कि वह मंच से वायलिन बजाएं और पूरी दुनिया उन्हें सुने. उनको सुनने के लिए कैंसर अस्पताल के चिकित्सक, मरीज और शहर के 150 से ज्यादा लोग मौजूद थे. अरविंद ने जब वायलिन वादन पूरा किया तो सभागार में मौजूद हर शख्स तालियां बजा रहा था, लेकिन उनकी आंखों की कोर नम थी. अरविंद को सुनने के लिए उनके शिष्य अमेरिका, बेंगलुरू और मुंबई से पहुंचे थे.

अरविंद को 2017 में कैंसर का पता चला. उन्होंने बताया कि मुंबई में इलाज के बाद ठीक हो गया था, लेकिन कोविड काल में फिर से यह सामने आ गया. समय से इलाज नहीं मिलने के कारण स्थिति बिगड़ गई. 40 कीमोथेरेपी कराने के बाद भी कोई फायदा नहीं है अब तो बस म्यूजिकोथेरेपी ही मेरा सहारा है. अरविंद ने 1992 में बीएचयू से संगीत की शिक्षा ली. उन्होंने प्राइवेट स्कूल में संगीत टीचर के तौर पर भी काम किया. अरविंद का कैंसर लास्ट स्टेज पर है और वह हर पल को जीना चाहते हैं.

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Author: Jagran Times

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