
देश-देशांतर के सैलानियों को लुभाता खजुराहो…. ये है- चंदेलों का गाँव. प्रेम-प्रतिमाओं से आच्छादित मंदिरों ही नहीं, अब एक नई सौगात लिए पाहुनों के स्वागत में तैयार है. उसकी धरती का आँगन भारत के हृदय राज्य की जनजातीय और लोक स्मृति से जुड़ी धरोहर की धन्यता से गमक उठा है. ये गमक एक ऐसे सांस्कृतिक गाँव की सैर कराती है, जहाँ मध्यप्रदेश की जनपदीय संस्कृति को उसके देशज सौन्दर्य में निरखा जा सकता है. ये है-‘’आदिवर्त’ संग्रहालय. संस्कृति महकमे की जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादेमी की परिकल्पना में साकार हुआ यह संग्रहालय सिर्फ़ अपने सुन्दर वास्तु शिल्प ही नहीं, आदिम विरासत को उसके मौलिक संदर्भों में कौतुहल और जिज्ञासा से भरकर देखने-समझने का आग्रह भी करता है.
बहुत दिन नहीं बीते, चार महीने पहले ही फागुनी रंगतों से भरी एक शाम सैकड़ों जनजातीय लोक कलाकारों की मौजू़दगी में इस अनूठे स्मारक का लोकार्पण हुआ था. ‘आदिवर्त’ के निर्माण के पीछे जो मंशा काम करती रही वो गौरवशाली आंचलिक संपदा के प्रति मान का प्रतीक तो है ही, इस महत्वाकांक्षा का प्रतीक भी कि विश्व धरोहर को निहारने दुनियाभर से खजुराहो आने वाले पर्यटक मध्यप्रदेश की सांस्कृतिक धरोहर पर भी अपना ध्यान केन्द्रित करें.
मध्यप्रदेश, जो बुंदेलखंड, मालवा, निमाड़, बघेलखंड और चंबल जैसे लोक अंचलों की सांस्कृतिक आभा से दमकने वाला प्रांत है. वो राज्य, जिसकी कलात्मक धड़कनें संसार में सुनी जाती हैं. ‘आदिवर्त’ के बसेरे में आकर इसी आदिम गंध को महसूस किया जा सकता है. कला प्रेमी चंदेलों की धरती खजुराहो के मंदिर और उसकी दीवारों पर अंकित हमारी कामनाओं के शिल्प और गर्भगृह में प्रतीक्षारत देवता हमें हर घड़ी अपने से दूरी का एहसास कराते हैं, जिस क्षण हम अपनी अंतहीन कामना से मुक्त होंगे, ठीक उसी क्षण यह मिल जायेगा.
‘आदिवर्त’ में प्रदेश की प्रमुख जनजातियों के प्रतिनिधिक आवासों और जीवन उपयोगी वस्तुओं का निर्माण कर प्रदर्शित किया है. आरंभिक रूप से मध्यप्रदेश के पाँचों सांस्कृतिक जनपदों के भित्ति चित्रों को प्रदर्शित किया गया है. जनजातीय और जनपदीय समुदायों के मान्य देवी-देवता भी इस परिसर में हमारे मंगल की कल्पना करते उपस्थित हैं.
मध्यप्रदेश की प्रमुख जनजातियों के सृष्टि मिथकों के आधार पर संग्रहालय का प्रवेश द्वार जनजातीय समाजों के जीवन की निरन्तरता के प्रतीकों से, सुसज्जित किया गया है. जनजातीय समुदायों की ख़ासियत है कि अपने परिवेश में उपलब्ध वस्तुओं से ही वे अपने घर बनाते हैं और अपने पर्यावरण को बिल्कुल क्षति नहीं पहुँचाते. इसकी गवाही देते हैं जनजातीय समुदायों के आवास.
भीलों के कलाबोध की झलक उनकी घर की दीवारों पर बनाये जाने वाले चित्रों, आनुष्ठानिक पिठौरा चित्रांकन, गातले, उनके परिधान, आभूषण, नृत्य-गान तथा दैनन्दिन उपयोग की वस्तुओं में स्पष्ट देखने को मिलती है.
भारत की प्रमुख और सबसे बड़ी जनजाति है गोण्ड. गोण्ड घरों की दीवारों और फर्श को स्त्रियाँ मिट्टी में विविध आकारों और रंगों से सजाती हैं. घर के बीचों-बीच आँगन होता हैं. ‘कोल्हिन टोला’ में मिट्टी या घास-फूस की मढ़िया या झोपड़ियाँ, आमने-सामने बनायी जाती हैं. आवास में घर-गृहस्थी के सामान के अलावा प्रतिदिन उपयोग के लिए ज़रूरी वस्तुएँ होती हैं. ये कोल समुदाय का घर है, जबकि सहरियाओं का घर एक बड़ा कमरा भर होता है, जिसमें रसोई घर और सोने-बैठने की जगह के साथ जीवन में उपयोगी सभी चीज़ें मौज़ूद होती है. इसी बीच आमने-सामने दो कतारों में बने कोरकू और उनके गेरू, खड़िया और पीली मिट्टी से सजे ओटले ‘कोरकू ढाणा’ को ख़ास पहचान देते हैं. कमरों में नक़्काशी भी देखने मिलती है. आगे बढ़ते ही बैगाओं का घर-संसार हमें ठिठकने पर दिवश कर देता है.
पारम्परिक बैगा घर एक या दो कमरे का और दो ढाल की छत वाला होता है. इन घरों में प्रायः लकड़ी के दरवाज़ों, चीखटों पर पुरुषों की कारीगरी और दीवारों की मिट्टी पर निखरता स्त्रियों का सौन्दर्यबोध, देखते ही बनता है. भारिया ढाना में इनके कच्चे मकान दो कतारों में बने रहते हैं. भारियाओं के घर लकड़ी, घास-फूस और टट्टों के बने होते हैं. घर से सम्बन्धित आवश्यक सामग्री भारिया जंगल से प्राप्त करते हैं. खपरैल भी स्वयं बनाते हैं.
यह भीलों का आध्यात्मिक प्रतीक है. मानता पूरी होने पर, भील परिवार का व्यक्ति गलदेव के ऊपर लगे आड़े खम्भे पर पीठ के बल लटक कर पाँच या सात फेरे लेकर मानता उतारता है.
मण्डला के चौगान नामक स्थान पर सरग नसेनी इस प्रतीक रूप में यहाँ स्थापित है कि स्वर्ग जाने का मार्ग बहुत कठिन है और वह देवी-देवताओं के प्रताप से ही पाया जा सकता है. बड़ा देव और बूढ़ी दाई इन दोनों से ही इस धरती के सभी जीव-जन्तुओं के पैदा होने और फिर इन्हीं में समाहित हो जाने की लोकमान्यता है. इस विराट सृष्टि के रचनाकार और संहारकर्ता के स्वरूप को एक ही शिल्प में अभिव्यक्त किया गया है.
‘स्मृति स्तंभ’ अलग तरह से ध्यान आकर्षित करता है. जनजातीय समुदाय अपने पूर्वजों को अत्यधिक सम्मान की दृष्टि से देखते हैं. वहीं उनके देवता भी होते हैं, जो समय-समय पर उनकी रक्षा करते हैं. इनके लिए विभिन्न जनजाति में अलग-अलग रीति-रिवाज़ प्रचलित हैं.
लोक श्रुति है कि सभी कलाओं के मूल में काम है. कलाओं का जन्म भी इसी से हुआ है. इस प्रतीक का ऊपरी भाग स्त्री का प्रतीक है और निचला पुरुष का. इनके सम्मिलन से ही इस सृष्टि का निर्माण और इसकी निरंतरता है. चाँद-सूरज की साक्षी में यह सब घट रहा है.
‘आदिवर्त’ के ही एक कोने पर बने हैं बाबदेव. मन्नत पूरी होने पर, धन्यवाद स्वरूप घोड़े बाबदेव को चढ़ाए जाते हैं, जो मूलतः देवता को अपनी समस्त शक्तियाँ समर्पित करने के अर्थ में है.
इन प्रतीकों से गुज़रते हुए हमें ठिठकाती हैं- भूरी बाई. मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के पिटोल गाँव के एक अत्यन्त साधारण परिवार में जन्मी भूरी बाई, भील समुदाय की एक प्रमुख चित्रकार हैं. भूरी बाई के जीवन की प्रमुख घटनाओं का चित्रांकन बरबस ही ध्यान खींचता हैं. सामान्य परिवार और ग्रामीण परिवेश से यह यात्रा शुरू होकर स्वचेतना के अनुभव और उसकी अभिव्यक्ति से राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान स्थापित करती है. यह संभावना सबके पास है, इसी बात का प्रतीक है.
पिठोरा जनजातीय चित्र परम्परा में भील समुदाय का सबसे प्रमुख केन्द्रीय और प्रामाणिक अंकन है. यह देवी-देवताओं के आहृवान और पूजा का सबसे पवित्र और प्रमुख अवसर होता है, वस्तुतः यह भील जनजाति का अनुष्ठानिक चित्रण है. भित्ति चित्र के रूप में यह निर्मित होता है. इस चित्रण में कथा-गायन और वादन दोनों साथ होते हैं.
‘आदिवर्त’ के परकोटे की साज-सज्जा का पारम्परिक ताना-बाना बेहद लुभावना है. यह परिसर कहता है कि जनजातियों की नृत्य संरचनाएँ पेड़-पौधों और जीव-जन्तुओं से प्रेरित होती है. जनजातीय समुदायों की नृत्य मुद्राओं में उनकी पूर्ण जीवनशैली को समझा जा सकता है.
ओरछा में अंकित ‘श्रीराम दरबार’ के दृश्य की प्रतिकृति में बुन्देली कलम की सुन्दरता अनुभव की जा सकती है. मध्यप्रदेश के चम्बल जनपद में विवाह के अवसर पर इसका अंकन मुख्य द्वार की सजावट करने के लिए किया जाता है. इस अंकन में शुभ और मांगलिक प्रतीकों को प्रमुखता से बनाया जाता है. मालवी कलम को प्रदर्शित करती शिव-पार्वती की ख्यात मुद्रा ‘रास मंजरी’ का यहाँ पुर्नअंकन किया गया है. यह शैली कभी मालवा के कला बोध को प्रदर्शित करती थी.
गोण्ड जनजाति में माना जाता है कि ‘बड़ा देव’ इसी पेड़ में निवास करते हैं. इसलिये इस वृक्ष को गोण्ड समुदाय द्वारा पवित्र वृक्ष की मान्यता दी गई है. गोण्ड जनजाति में परधान, गोण्डों की ज्ञान परम्परा के संवाहक हैं. इस शिल्प में भी ‘नर्मदा’ का गान करता अमूर्त ‘परधान’ गायक अनुभूत किया जा सकता है, जिसे गोण्डों के देवता हर क्षण ऊपर से देख रहे हैं.
मध्यप्रदेश की संस्कृति वाहिनी नदी नर्मदा के विशाल और लम्बे प्रवाह क्षेत्र में प्रदेश की बैगा, गोण्ड, कोल, भारिया, कोरकू और भील जनजातीय समुदायों का निवास है. मध्यप्रदेश राज्य की संस्कृति के निर्माण में नर्मदा का केन्द्रीय योगदान है. संस्कृति सलिला नर्मदा मध्यप्रदेश की संस्कृति और अनेक परम्पराओं को जन्म देने वाली नदी है. इसी संस्कृति और परम्परा का त्रिआयामी चित्रण यहाँ किया गया है.
गोदने और गहने समृद्ध संस्कृति के संवाहक और कलात्मक रुचि के परिचायक हैं. प्रदेश के जनजातीय और लोक समुदायों द्वारा उपयोग किये जाने वाले इन विभिन्न आकार-प्रकार के गहनों से उन्हें धारण करने वाले लोगों के कला बोध को समझा जा सकता है. सभी समुदायों में यह मान्यता है कि मृत्यु के उपरान्त सिर्फ़ गोदने ही साथ जाते हैं, बाकी सब यहीं रह जाता है. इसलिये सच्चा और वास्तविक आभूषण गोदना ही है.
दरअसल इस संग्रहालय का उद्देश्य मध्यप्रदेश के जनजातीय और लोक समाजों को समग्रता से देखने तथा उनकी जीवन दृष्टि को समझने की कोशिश करना है. जनजातीय और लोक कलाकारों को बदली हुई सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों में निर्वाह हेतु नये बाजार उपलब्ध कराना है. आने वाले समय में यह संग्रहालय स्वयं को एक गतिमान, कल्पनाशील और तमाम तरह के सांस्कृतिक आदान-प्रदान के केन्द्र की भूमिका में देखता है.






