
13 साल पहले जापान के अंतरिक्ष यान हायाबुसा ने इटोकावा क्षुद्रग्रह के नमूने पृथ्वी पर पहुंचाए थे. अब एरिजोना यूनिवर्सिटी की लूनार एंड प्लैनेटरी लैबोरेटरी के शोधकर्ताओं ने इसी नमूनों में नमक के महीन कणों को पाया है. अजीब बात यह है कि यह क्षुद्रग्रह एस प्रकार का होता जिनमें पानी या उससे संबंधित खनिज नहीं होते हैं. इससे ऐसा लगता है कि पृथ्वी की ओर जो क्षुद्रग्रह आ रहे थे वे ज्यादातर उम्मीद से कहीं कम सूखे रहे होंगे. क्षुद्रग्रह में इस तरह से नमक की उपस्थिति से पता चलता है कि नमूनों में किसी भी तरह का संक्रमण की संभावना नहीं है. इससे पृथ्वी पर पानी आने की धारणा में बदलाव आएगा.
हायाबुसा 1 अभियान ने
जापान का हायाबुसा अभियान ने साल 2005 में इटोकावा क्षुद्रग्रह से नमूने हासिल किए थे. इसके विस्तार से विश्लेषण के बाद से शोधकर्ताओं ने पाया कि इसमें पाए गए कण उसी तरह के दिखाई दे रहे हैं कि घर में पाए जाने वाले नमक को माइक्रोस्कोप से देखने पर दिखाई देते हैं. ये बढ़िया वर्गाकार क्रिस्टल रूप में दिखाई दे रहे थे.
पानी मिलता नहीं है ऐसी चट्टानों में
अध्ययन के वरिष्ठ लेखक और एरिजोना लूनार एंड लैबोरेटरी में प्लैनेटरी साइंसेस के प्रोफेसर टॉम जेगा ने बताय कि ये नमूने अंतरिक्ष की एक चट्टान के हैं जिन्हें सामान्य कॉन्ड्रइट कहा जाता है. एस प्रकार के इटोकावा जैसे क्षुद्रग्रहों की चट्टानों से ही पृथ्वी पर जमा किए उल्कापिंडों की 87 फीसद हिस्से बने हैं. उनमें से बहुत ही कम में पानी वाले खनिज पाए गए हैं.
पृथ्वी पर पानी
जेगा का कहना है कि उनकी सोडियम क्लोराइड की खोज बताती है कि ऐसे क्षुद्रग्रहों में जितना समझा जा रहा था उससे कहीं ज्यादा पानी हो सकता है. शोधकर्ताओं का मानना है किपृथ्वी सौर नेबुला के आंतरिक हिस्से में बनी थी जहां तापमान बहुत ज्यादा था जिससे वहां पानी की भाप के संघनित होने की संभावना नहीं थी. इसका मतलब यही हुआ कि सौर नेबुला के बाहरी इलाकों से ही पृथ्वी पर पानी आया होगा.






