
कुंदन कुमार/गया. बिहार के गया जिले में बोधगया से लगभग 12 किलोमीटर उत्तर पूर्व में एक रमणीक पहाड़ी है. यह डुंगेश्वरी पहाड़ी के नाम से जानी जाती है. डुंगेश्वरी पहाड़ी बौद्ध सर्किट के साथ हिंदू सर्किट से भी जुड़ा हुआ है. यह लोगों के लिए आकर्षण का एक प्रमुख केंद्र है. इसकी चोटी पर एक प्राचीन गुफा है. इस गुफा में एक मंदिर है. इस गुफा को महाकाल गुफा और प्राग बोधी गुफा भी कहा जाता है. पर्यटन सीजन में यहां हजारों बौद्ध श्रद्धालु आते हैं, जबकि नवरात्र और सावन महीने में हिंदू समुदाय के लोगों की काफी भीड़ देखी जाती है.
गौतम बुद्ध ने बोधगया जाने से बहुत पहले इस गुफा में 6 वर्षों तक ध्यान किया था. यहां भगवान बुद्ध की खास मूर्ति भी रखी हुई है. गुफा मंदिर के अस्तित्व के पीछे एक दिलचस्प कहानी है, जिसमें कहा गया है कि गौतम बुद्ध अपनी तपस्या के दौरान बेहद कमजोर हो गए थे. उस समय पास के गांव की सुजाता नाम की महिला ने उन्हें खीर खिलाया था. यह माना जाता है कि भगवान बुद्ध को यहीं से मध्यम मार्ग का ज्ञान प्राप्त हुआ था.
मूलतः यह हिन्दू धर्म से जुड़ी गुफा है, जो डुंगेश्वरी देवी के नाम से विख्यात है. यह गुफा पहाड़ पर बनी सबसे खूबसूरत मंदिरों में से एक है. यहां भगवान बुद्ध के साथ हिन्दू-देवी देवताओं की मूर्तियां स्थापित हैं. यहां भगवान बुद्ध की विशेष मूर्ति है. उन्हें यहां ध्यान की अवस्था में कंकाल जैसे ढांचा में बनाया गया है. चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी अपने यात्रा वृतांत में इस गुफा का जिक्र किया है. बोधगया आने वाले बौधिस्ट डुंगेश्वरी मंदिर जरूर आते हैं. क्योंकि ऐसा माना जाता है जब तक वे इस मंदिर में नहीं आएंगे, उनकी यात्रा सफल नहीं होगी. यहां आपको असीम शान्ति और सुख का अनुभव होगा. डुंगेश्वरी पहाड़ी पर तपस्या के बाद ही सिद्धार्थ बोधगया गए थे जहां उन्हें पूर्ण रूप से ज्ञान की प्राप्ति हुई थी.
डुंगेश्वरी पहाड़ की गुफा में बने मंदिर में जाने के लिए सीढ़ियां बनी हुई हैं. वृद्ध पर्यटकों के लिए यहां पालकी की सुविधा सहजता से प्राप्त हो जाती है. गया आनेवाले देशी-विदेशी पर्यटक भी डुंगेश्वरी पहाड़ी जरूर आते हैं. इस मंदिर के पुजारी चंदन कुमार पांडे बताते हैं कि इस जगह को प्राग बोधी गुफा भी कहा जाता है. यह बौद्ध सर्किट के साथ हिंदू सर्किट से भी जुड़ा हुआ है. उन्होंने यह भी बताया कि पहले इस मंदिर का नाम दुर्गेश्वरी था, जो कालांतर में बदल कर डुंगेश्वरी के नाम से चर्चित हो गया. यहां आदि काल से मां दुर्गेश्वरी विराजमान हैं. प्राकृतिक रूप से यह गुफा बना हुआ है. 2500 वर्ष पूर्व सिद्धार्थ गौतम जब ज्ञान की खोज में राजगीर से बोधगया जा रहे थे. तब उन्होंने 6 साल इसी गुफा में तपस्या की थी. यहीं से उन्हें मध्यम मार्ग का ज्ञान प्राप्त हुआ था. बौद्ध सर्किट से जुड़ने के बाद अब यहां प्रत्येक वर्ष हजारों की संख्या में बौद्ध श्रद्धालु आते हैं. इस गुफा को महाकाल गुफा भी कहा जाता है. अनादि काल से यहां मां दुर्गेश्वरी की प्रतिमा होने के कारण हिंदू समुदाय के लोग भी नवरात्र और सावन के महीने में खूब आते हैं.
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FIRST PUBLISHED : June 11, 2023, 13:23 IST









