क्यों इतना शक्तिशाली था रावण, इस योग से हुआ प्रसिद्ध, ज्योतिषी से जानें दशानन की कुंडली

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Kundali of Ravana : महाकाव्य रामायण में वैसे तो कई चरित्र बहुत प्रचलित हैं लेकिन आज हम यहां बात कर रहे हैं रावण के बारे में. मान्यताओं के अनुसार, रावण दुनिया का सबसे बड़ा पंडित महा विद्वान और महा अभिमानी राजा था. रावण भगवान शिव का परम भक्त था रावण को शास्त्रों की जानकारी थी, रावण वेदों का ज्ञाता था. वह ग्रहों से लेकर वनस्पति जगत की छोटी से छोटी बात भी जानता था और जब किसी व्यक्ति की जानकारी का स्तर इतना ज्यादा बढ़ जाता है तो वह व्यक्ति महा अभिमानी हो जाता है. रावण का अहंकार ही उसका एकमात्र दोष था. भोपाल निवासी ज्योतिषी एवं वास्तु विशेषज्ञ पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा बता रहे हैं रावण की कुंडली और उसके चरित्र के बारे में.

किसका पुत्र था रावण?

ब्रह्मा जी के पुत्र पुलस्त्य ऋषि थे और उनके पुत्र का नाम विश्रवा हुआ. विश्रवा ऋषि की दो पत्नियां थी. उनकी पहली पत्नी भारद्वाज की पुत्री देवांगना थी. जिनका पुत्र कुबेर था. विश्रवा ऋषि की दूसरी पत्नी दैत्यराज सुमाली की पुत्री कैकसी थी. रावण, कुंभकरण, विभीषण और सूर्पणखा इन्हीं की संताने थी. ज्योतिषाचार्य बताते हैं कि रावण दो अलग संस्कृतियों की संतान था, इसलिए रावण अद्वितीय और महाशक्तिशाली था.

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रावण की कुंडली

ज्योतिषाचार्य की मानें तो रावण की कुंडली सिंह लग्न की थी. सूर्यदेव, सिंह लग्न के स्वामी होते हैं. इसी कारण रामायण बेहद शक्तिशाली बना. सूर्य के साथ रावण की कुंडली में बृहस्पति भी हैं. बृहस्पति, रावण की कुंडली में पंचम और अष्टम भाव के स्वामी हैं. पंचम भाव में बृहस्पति के होने से रावण पूर्व जन्म के कारण पैदा हुआ माना गया है. जबकि कुंडली के अष्टम भाव में गुरु की उपस्थिति व्यक्ति को गुप्त विद्याओं का मालिक बनाती है. कुंडली के इसी भाव में सूर्य और गुरु के साथ शुक्र भी हैं. गुरु और शुक्र की युति होती है. तो इंसान महापंडित बन जाता है, इसलिए रावण महाज्ञानी और महाविद्वान था. कुंडली में उच्च का बुध द्वितीय भाव में है. द्वितीय भाव का बुध वाणी के बल पर कुछ भी कर सकता है. यही कारण है कि रावण यंत्र, तंत्र और मंत्र के रहस्य को आसानी से समझ लेता था. ऋग्वेद और वैदिक काल के मंत्रों में छिपे रहस्य और विज्ञान को रावण अच्छी तरह से समझ चुका था. उसकी वाणी में अमृत था. इसी कारण भगवान शिव को उसने आसानी से प्रसन्न कर लिया था.

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रावण की कुंडली के तीसरे भाव में शनि के साथ केतु विराजमान हैं. सिंह लग्न के साथ तीसरे भाव में शनि केतु हों, तो इंसान महापराक्रमी बन जाता. ऐसे व्यक्ति परिणामों से नहीं घबराते, ऐसे व्यक्ति पर सिर्फ वीजय का जुनून सवार रहता है. तीसरे भाव में शनि के साथ बैठा केतु इंसान के नियंत्रित दिमाग की वजह बनता है. रावण की कुंडली के छठे भाव में मंगल और चंद्रमा विराजमान है. मंगल और चंद्रमा की युति इंसान को बलशाली बनाती है, और ऐसे व्यक्ति को हरा पाना हर किसी के लिए मुमकिन नहीं होता. रावण की मृत्यु भगवान राम के हाथों हुई थी, लेकिन उसे कभी कोई हरा नहीं पाया था. रावण की कुंडली के नौवें भाव में राहु विराजमान है, ग्रहों की ऐसी स्थिति इंसान को बेहद खास बना देती है.

Tags: Dharma Aastha, Ravan Leela, Religion

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Author: Up Head Line

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