
मंझनपुर|मोहम्मद फैज/इम्तियाज सलमानी
कौशाम्बी। प्राइवेट स्कूलों द्वारा फीस, किताबों और यूनिफॉर्म के नाम पर की जा रही मनमानी वसूली के खिलाफ कांग्रेस ने शुक्रवार को मोर्चा खोल दिया। उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के आह्वान पर ज़िला कांग्रेस कमेटी कौशाम्बी ने ज़ोरदार विरोध प्रदर्शन किया और राज्यपाल को संबोधित ज्ञापन जिलाधिकारी को सौंपते हुए शिक्षा माफियाओं पर नकेल कसने की मांग की।

इस आंदोलन का नेतृत्व ज़िला कांग्रेस अध्यक्ष गौरव पाण्डेय ने किया। उन्होंने कहा, प्रदेश के प्राइवेट स्कूल अब शिक्षा के मंदिर नहीं, बल्कि लूट का अड्डा बन चुके हैं। खुलेआम फीस में मनमानी बढ़ोत्तरी की जा रही है। अभिभावकों को मजबूर किया जा रहा है कि वे स्कूलों द्वारा बताई गई दुकानों से ही महंगी किताबें, यूनिफॉर्म और अन्य सामान खरीदें। यह पूरी व्यवस्था गरीब और मध्यम वर्ग के माता-पिता की जेब पर डाका डालने जैसी है। कांग्रेस पार्टी इसका पुरज़ोर विरोध करती है और इसे अब और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।”
पूर्व विधायक विजय प्रकाश ने भी इस मुद्दे पर सरकार को घेरा और कहा, जहां देश की जनता महंगाई से कराह रही है, वहीं निजी स्कूल शिक्षा के नाम पर खुलेआम शोषण कर रहे हैं। गरीबों की मेहनत की कमाई पर डाका डाला जा रहा है। यदि सरकार और प्रशासन ने समय रहते कोई ठोस कार्रवाई नहीं की तो कांग्रेस पार्टी व्यापक जन आंदोलन खड़ा करेगी।
जिला महासचिव मोहम्मद फरमान ने मांग की कि प्राइवेट स्कूलों की फीस वसूली के लिए एक पारदर्शी और सख्त मानक तय किया जाए, ताकि वे अपनी मर्जी से फीस न वसूल सकें।
इस विरोध प्रदर्शन में जिलेभर से कांग्रेस कार्यकर्ता बड़ी संख्या में पहुंचे। प्रमुख रूप से श्याम मूर्ति, अर्श खुर्शीद, राजेंद्र त्रिपाठी, राम बहादुर त्रिपाठी, अलकमा उस्मानी, आशीष मिश्रा पप्पू, अमित द्रिवेदी आज़ाद, बालेंद्र यादव, कौशलेश द्विवेदी, सैफ मंसूरी, शशि त्रिपाठी, नैयर रिज़वी, गरुड़ पाण्डेय, समर कोहिलहा, कलिका प्रसाद, राम कश्यप, भागीरथी पटेल, रमेश चंद्र केसवानी, सूरज सिंह, शिवम तिवारी, शिव भूषण, निक्की पाण्डेय, और सैकड़ों कांग्रेस कार्यकर्ता शामिल हुए।
प्रदर्शन के अंत में जिलाधिकारी को सौंपे गए ज्ञापन में यह मांग की गई कि शिक्षा के क्षेत्र में व्याप्त इस अव्यवस्था और लूट-तंत्र पर तत्काल प्रभाव से लगाम लगाई जाए और दोषी स्कूलों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।
कुल मिलाकर कांग्रेस का यह प्रदर्शन न केवल अभिभावकों की आवाज़ को बुलंद करने वाला रहा, बल्कि यह संदेश भी दे गया कि अब शिक्षा के नाम पर शोषण नहीं सहा जाएगा।








