दिल्ली के 55 साल पुराने डियर पार्क पर लगेगा ताला… राजस्थान के जंगलों में भेजे जाएंगे हिरण, जानें क्यों लिया यह फैसला

नई दिल्ली: दिल्ली में रहने वाले या यहां घूमने आने वालों के लिए बीच शहर में एक ऐसी जगह, जहां वह भरी गर्मी में भी ठंडक का अहसास कर सकते हैं. ऐसी जगह जहां शहर के बीच में हिरण अठखेलियां करते नज़र आ जाते हैं, जहां दिन में तितलियां मंडराती हैं तो रात में जुगनू जगह को रोशन करते हैं. खरगोश, गिलहरी जैसे ना जाने कितने जानवरों की पनाहगाह रहा दिल्ली के हौज खास का डियर यानी हिरण पार्क यहां रहने वाले बाशिंदों के लिए एक अलग मायने रखता है. लेकिन अब ये हिरण यहां नहीं होंगे.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण ने हाल ही में ए. एन. झा डियर पार्क की ‘मिनी जू या छोटे चिड़ियाघर’ के तौर पर मान्यता रद्द कर दी है. अब इनमें मौजूद करीब 600 हिरणों को राजस्थान और दिल्ली के वन क्षेत्रों में शिकार का आधार बढ़ाने के लिए स्थानांतरित किया जाएगा. हालांकि इस पार्क को संरक्षित वन के रूप में रखा जाएगा, यह जिम्मेदारी दिल्ली विकास प्राधिकरण की होगी. इस कदम को उठाने के पीछे की एक अहम वजह हिरणों की बढ़ती आबादी है क्योंकि यहां पर उनका प्राकृतिक रूप से शिकार करने वाला कोई जानवर नहीं है.

राजस्थान और दिल्ली के अभ्यारण्य में घूमेंगे हिरण
2022 में पहले यह प्रस्ताव रखा गया था कि सभी हिरणों को राजस्थान के जंगलों में स्थानांन्तरित किया जाए, लेकिन बाद में केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण के अधिकारियों ने बैठक में यह फैसला लिया कि इनमें से कुछ हिरणों को दिल्ली की असोला भट्टी वन्यजीव अभ्यारण्य में ले जाया जाएगा. इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक दिल्ली के मुख्य वन्यजीव वार्डन सुनील बक्शी का कहना था कि असोला भट्टी वन्यजीव अभ्यारण्य में तेंदुओं की संख्या बहुत बढ़ गई है ऐसे में उनके खाने के लिए शिकार की पूर्ति करने की जरूरत भी है. इसलिए यह फैसला लिया गया है.

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केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण के सदस्य सचिव का कहना है कि चित्तीदार हिरण की आबादी 2022 में 565 पाई गई थी जो अब बढ़कर 600 के करीब हो सकती है. इन्हें अब 70:30 के अनुपात में राजस्थान वन विभाग और एनसीटी दिल्ली के वन विभाग को सौंपा जाएगा.

पार्क को बंद करने की जरूरत क्यों पड़ी
दरअसल 1960 के दशक में इस पार्क की शुरुआत हुई तब यहां पर कुछ हिरणों को लाया गया था. तब से इनकी आबादी में लगातार इजाफा हुआ है, लेकिन दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) के कर्मचारी इतनी बड़ी संख्या में हिरणों को संभालने के लिए प्रशिक्षित नहीं हैं. दूसरा वन्य अभ्यारण्य में शिकारियों के शिकार की आपूर्ति करने कि लिए भी यह जरूरी है ताकि पारिस्थतिकीय तंत्र में संतुलन स्थापित हो सके. जहां तक हिरणों के स्थानांतरण की बात है तो यह दिल्ली और राजस्थान के वनविभाग पर निर्भर करता है. दिल्ली वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि फिलहाल जानवरों के प्रजनन का मौसम है तो उन्हें इसके बाद ही ले जाया जा सकता है, ऐसे में सर्दियों का मौसम मुफीद होगा. चूंकि जानवरों को चरने के लिए घास और विचरने के लिए खुली जगह की जरूरत होती है ऐसे में असोला वन्य अभ्यारण्य उनके लिए बेहतर जगह साबित होगी. वहीं जहां तक राजस्थान का सवाल पैदा होता है तो वहां पर इन्हें मुकुंदरा और रामगढ़-विषधारी बाघ अभ्यारण्य में ले जाया जाएगा ताकि शिकार आधारित संवर्धन हो सके.

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हौज खास के पार्क का क्या होगा
इसे लेकर अधिकारियों का मानना है कि चिड़ियाघर एक अहम हरियाली से भरी जगह है जिसे संरक्षित किया जाना चाहिए. डीडीए की बैठक में इस साइट को संरक्षित वन के रूप में अधिसूचित किया गया है और इसे जंगल के रूप में संरक्षित रखा जाएगा.

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Author: Jagran Times

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