
उधव कृष्ण/पटना. किसी भी चीज के सृजन में वक्त, कला, गुण और धैर्य के साथ एक और महत्वपूर्ण चीज की जरूरत पड़ती है, जिसे अनुभव कहा जाता है. यह अनुभव तब प्राप्त होता है, जब किसी काम को बारंबार अथवा लंबे अरसे तक किया जाए.
माना जाता है कि किसी भी काम को बार बार करने से लोग उक्त काम में निष्णाद हो जाते हैं. नाव बनाने की कला भी कुछ ऐसी ही है, इसमें हुनर के साथ अनुभव की भी उतनी ही आवश्कता होती है. जी हां, हम बात कर रहें हैं पटना के एक ऐसे गांव की जहां लोग पुस्त दर पुस्त नाव बनाते आ रहे हैं.
जामुन और सखुआ से ही क्यों बनती है नाव
नाव बनाने वाले कारीगरों की माने तो पहले कुएं अथवा तालाब में जामुन की लकड़ी का ही जमौठ दिया जाता था. ऐसा इसलिए क्योंकि जामुन की लकड़ी वर्षों पानी में रहने पर भी खराब नहीं होती. पटना सिटी के खंगरपर निवासी भगवान चौधरी उर्फ पहलवान जी ने Local 18 को बताया कि ज्यादातर नाव में सखुआ की लकड़ियों का भी प्रयोग किया जाता है. पर सखुआ की बनी नाव में भी पेंदी में जामुन की लकड़ी का ही प्रयोग किया जाता है. ऐसा इसलिए क्योंकि जामुन की लड़की ही पानी से लिए उपयुक्त मानी जाती है.
जानिए क्या कहते हैं स्थानीय कारीगर
नाव बनाने वाले बैजनाथ चौधरी बताते हैं कि वे पुस्तों से यह काम कर रहे हैं. पर पिछले कई सालों से टेंडर नहीं मिलने के कारण उन लोगों को भारी दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है. 80 वर्ष से अधिक उम्र के महेंद्र चौधरी की माने तो ठेकेदार जिस 20 फीट और 25 फीट वाली नाव का सरकार से 01 लाख रुपए लेते हैं, उस नाव को वे लोग पचास हजार में तैयार कर सकते हैं. जबकि ठिकेदार द्वारा उनको काम के बदले 30 से 40 हजार रुपए की मजदूरी भी नसीब नहीं होती.
बैजनाथ चौधरी उर्फ धन्नो की माने तो लकड़ियों के अलावा वे लोग लोहे की भी नाव बनाते हैं. बरसात में नाव बनाने के लिए सरकार द्वारा टेंडर दिया जाता है. अगर उन लोगों को सीधे टेंडर मिले तो वे कम कीमत में अच्छी नाव तैयार कर सकते हैं. इसके अलावा अन्य लोगों के ऑर्डर पर भी वे विभिन्न आकार प्रकार के नाव, बोट और स्टीमर तैयार कर सकते हैं. इच्छुक लोग नाव कारीगरों से सीधे 73718 60870 पर संपर्क कर सकते हैं.
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FIRST PUBLISHED : June 14, 2023, 19:56 IST






