
सृजित अवस्थी/पीलीभीत. उत्तरप्रदेश के पीलीभीत ज़िले की आबादी का एक बड़ा हिस्सा कृषि पर निर्भर है. लेकिन आधुनिक दौर में अधिक उत्पादन के लालच में किसान जाने-अनजाने कृषि भूमि को ज़हरीला बनाते जा रहे हैं. कृषि वैज्ञानिकों द्वारा हाल ही में लिए गए कृषि भूमि की मिट्टी के सैंपल में इस बात का ख़ुलासा हुआ है.दरअसल, पीलीभीत जिला हिमालय की शिवालिक पर्वतमाला की तलहटी में बसा है. पीलीभीत तराई क्षेत्र के अंतर्गत आता है और यहां कृषि का रकबा 2.20 लाख हेक्टेयर के करीब है. ऐसे में यहां की अधिकांश आबादी कृषि व उससे जुड़े कार्यों पर निर्भर है.
हर एक किसान चाहता है कि उसके खेत में अधिक से अधिक उत्पादन हो. अधिक उत्पादन कि इसी चाह में जाने अनजाने तराई के किसान यहां की मिट्टी को दिन पर दिन जहरीला बनाते जा रहे हैं. असंतुलित अनुपात में उर्वरक का उपयोग तराई की मिट्टी में जहर घोलने का काम कर रहे हैं. कृषि वैज्ञानिकों की मानें तो आमतौर पर यह देखा जाता है कि किसान अधिक उत्पादन के लिए खेतों में नाइट्रोजन का अत्यधिक इस्तेमाल करते हैं. लेकिन उत्पादन बढ़ाने को इस्तेमाल की गई नाइट्रोजन कृषि भूमि पर इतना बुरा प्रभाव डालती है कि एक समय पर यह उत्पादन घटने लगता है. साथ ही साथ मिट्टी में मौजूद जीवांश कार्बन की मात्रा भी घटने लगती है.
नाइट्रोजन का उपयोग साबित होगा घातक
पीलीभीत के कृषि वैज्ञानिक शैलेन्द्र सिंह ने बताया कि किसान उपज बढ़ाने के लिए असंतुलित मात्रा में उर्वरक का उपयोग करते हैं. आमतौर पर नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटास के उपयोग का अनुपात 4:2:1 होना चाहिए. लेकिन पीलीभीत में किसानों द्वारा इसके उपयोग का औसत अनुपात 19:2:1 देखा गया है. ऐसे में नाइट्रोजन का कई गुना इस्तेमाल कृषि भूमि के लिए घातक साबित हो रहा है.
जैविक खाद हो सकता है अच्छा विकल्प
अगर बीते कुछ साल के आंकड़ों को देखें तो पीलीभीत जिले की कृषि भूमि में जीवांश कार्बन की मात्रा में भारी गिरावट आई है. उपजाऊ जमीन में जीवांश कार्बन की आदर्श मात्रा .8% होनी चाहिए लेकिन तराई में यह घट कर महज .2% के आसपास रह गई है. किसानों को संतुलित अनुपात में ही उर्वरक का उपयोग करना चाहिए वहीं अधिक से अधिक जैविक खाद का उपयोग करना चाहिए. नहीं तो आने वाले समय के परिणाम बहुत अधिक घातक साबित हो सकते हैं.
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FIRST PUBLISHED : June 14, 2023, 21:23 IST






