स्वाद का सफ़रनामा: ब्लड ग्लूकोज़ कंट्रोल करती है पिपली, लिवर के लिए भी है लाभकारी, गुणों से भरपूर है यह मसाला

हाइलाइट्स

पिपली में बैक्टीरिया से लड़ने की क्षमता है, यानी इसमें जीवाणुरोधी गुण पाए जाते हैं.
जितने भी गरम मसाले हैं उनमें पिपली को सबसे बढ़िया माना जाता है.

Swad Ka Safarnama: भारत की रसोई में पिपली या पिप्पली को मसाले के रूप में प्रयोग में लाया जाता है. यह भोजन में स्वाद तो भरती ही है, उसे पौष्टिक भी बनाती है. इसका नियमित सेवन शरीर को कई बीमारियों और परेशानियों से दूर रखता है. इसे शरीर के लिए रामबाण माना जाता है. इसके उपयोग से ब्लड में ग्लूकोज की मात्रा कंट्रोल में रहती है तो इसे लिवर के लिए भी बेहद लाभकारी माना जाता है. यह मौसम विशेष में शरीर को जीवाणुओं (Bacteria) से भी बचाती है. इसका उत्पत्ति स्थल भारत माना जाता है. आयुर्वेदिक दवाओं में पिप्पली का खूब प्रयोग किया जाता है.

च्यवनप्राश में भी प्रयोग होती है पिपली

देश विदेश में पिपली (Long Pepper) को वही सम्मान प्राप्त है, जो काली मिर्च को है. तीखेपन में पिपली थोड़ी कूल होती है, लेकिन खाते वक्त यह मुंह में अधिक लार पैदा करती है. यह काली मिर्च के समान बहुत मशहूर न हो, लेकिन इसमें गुण काली मिर्च से ज्यादा हैं. जो लोग पिपली के गुणों को जानते हैं, वे अपनी रसोई और आहार में इसका खूब प्रयोग करते हैं. यह एक मसाला है और इसका उपयोग काली मिर्च, इलायची, दालचीनी आदि के समान भी होता है.

Long Pepper

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तीखा भोजन बनाने के लिए भी पिपली का इस्तेमाल किया जाता है. Image-Canva

आयुर्वेद ने भी इसे विशेष सम्मान दिया है और कई जीवाणु व शक्तिवर्धक औषधियों में इसका प्रयोग किया जाता है. शक्तिवर्धक च्यवनप्राश को बनाने में जिन अवयवों और बूटियों का प्रयोग किया जाता है, नें पिपली भी शामिल है. भारतीय व्यंजनों में जो भी तीखा भोजन बनाया जाता है, उनमें पिपली का इस्तेमाल किया जाता है. इनमें मसालेदार दाल, सूप, रसम के अलावा नॉनवेज के अधिकतर आइटम शामिल हैं, इनमें निहारी, कोरमा, व मटन स्टू विशेष हैं.

भारत है पिपली का उत्पत्ति स्थल

पिपली की उत्पत्ति निर्बाध रूप से भारत में मानी जाती है. भारत के प्राचीन ग्रंथों में तो इसका वर्णन है ही, विदेशी लेखन में इसकी जानकारी दी गई है. सातवीं-आठवीं ईसा पूर्व लिखे गए भारत के प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथ पिपली (पिप्पली) का वर्णन है. इसे मधुर, कफवर्धक, स्निग्ध व गरम बताया गया है. अन्य प्राचीन ग्रंथ ‘सुश्रुतसंहिता’ में कुछ ऐसे आहार बताए गए हैं, जिनमें पिपली का उपयोग किया जाता है. दूसरी ओर मसाला प्रोद्योगिकी के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाने वाले व भारत की एग्मार्क लेब के संस्थापक निदेशक जीवन सिंह प्रुथी ने अपनी पुस्तक ‘Spcices And Condiments’ में जानकारी दी है कि भारत में अधिकांश पिपली जंगली पौधों से प्राप्त होती है. इसके पौधे असम, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, चेरापूंजी आदि इलाकों में खूब उगते हैं.

इसमें पाए जाने वाले रसायनिक संघटक मुंह में अधिक लार पैदा करने, सुन्न करने और मुंह की श्लेष्मा झिल्ली में चरपरेपन का संवेदन पैदा करने के गुण हैं. इसमें औषधिय गुण भी हैं. इसका इस्तेमाल श्वासनली के रोगों, मांसपेशियों में दर्द व सूजन रोकने के अलावा बलवर्धक दवाओं में किया जाता है. फूड हिस्टोरियन मानते हैं कि जिस तरह हजारों वर्ष पूर्व भारत से काली मिर्च दूसरे देशों में पहुंची, ऐसे ही पिपली भी वहां पहुंची, लेकिन ऐसे देशों की संख्या सीमित थी. यूनानी व मिस्र की सभ्यता में इसे मसाले के अलावा औषधि के रूप में भी प्रयोग में लाया गया.

कई विशेष तत्व पिपली को बनाते हैं गुणकारी

पिपली को शरीर के लिए रामबाण माना जाता है और यह भी कहा जाता है कि जितने भी गरम मसाले हैं, उनमें पिपली उत्तम है. वैद्यराज व मुंबई यूनिवर्सिटी के पूर्व डीन दीनानाथ उपाध्याय के अनुसार आयुर्वेद में तो पिपली को सम्मान प्राप्त है, विज्ञान की आधुनिक खोजों ने भी माना है कि पिपली शरीर के लिए गुणों की खान है.

Long Pepper

पिपली एंटी-अमीबिक गुण पाए जाते हैं, जो पेट में पैदा होने वाले जीवाणुओं को क्षतिग्रस्त करते रहते हैं. Image-Canva

रिसर्च बताती हैं कि पिपली में अल्कलॉइड (विषाणुरोधी), बीटा साइटोस्टेरॉल (कोलेस्ट्रॉलरोधी), एनाल्जेसिक (दर्दनिवारक), यूजोनॉल (प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट) तत्व पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं, जो इसको विशेष बनाते हैं. इसमें आश्चर्यजनक रूप से ब्लड में ग्लुकोज को कंट्रोल करने की क्षमता है. पिपली में कुछ ऐसे घटक मौजूद होंते हैं जो लिवर को स्वस्थ बनाए रखते हैं. अगर शरीर में कुछ ऐसा विषैला पदार्थ पहुंच गया है जो लिवर को नुकसान पहुंचा सकता है, तो पिपली उसे पदार्थ को न्यूट्रल कर देती है. इसी विशेषता के चलते शरीर पीलिया जैसे रोगों से बचा रहता है.

शरीर के बैक्टीरिया खत्म करने की है क्षमता

पिपली में बैक्टीरिया से लड़ने की क्षमता है, यानी इसमें जीवाणुरोधी गुण पाए जाते हैं. इसके चलते शरीर सामान्य बीमारियों से बचा रहता है. इसमें एंटी-अमीबिक गुण पाए जाते हैं, जो पेट में पैदा होने वाले जीवाणुओं को क्षतिग्रस्त करते रहते हैं. इसमें शरीर में फैट को कम करने की भी क्षमता है. अगर पिपली के सेवन के साथ नियमित व्यायाम किया जाए तो यह मोटापा कम कर सकती है. इसकी एक अन्य विशेषता ने आयुर्वेद को बेहद प्रभावित किया है. असल में यह मस्तिष्क और शरीर के अंगों को पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन का प्रवाह बनाए रखने में मदद करती है, इसके चलते शरीर में ब्लड का प्रेशर नॉर्मल बना रहता है. पिपली का सामान्य तौर पर कोई साइड इफेक्ट नहीं है, क्योंकि यह प्राकृतिक और जैविक जड़ी बूटी है और यह शरीर के लिए खतरा पैदा नहीं करती है. लेकिन अधिक मात्रा में सेवन करने पर यह पेट में तेज जलन पैदा कर सकती है. एलर्जी की भी आशंका बढ़ सकती है.

Tags: Food, Lifestyle

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Author: Jagran Times

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