तब इंदिरा गांधी को लगने लगा था कि शास्त्री मंत्रिमंडल से हो जाएगी उनकी छुट्टी

हाइलाइट्स

लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी के रिश्तों में 1965 में तनाव आने की अटकलें फैलने लगी थीं
ये माना जाने लगा था कि शास्त्री ताशकंद से लौटने के बाद इंदिरा को मंत्री पद से हटाकर इंग्लैंड में हाई कमिश्नर बना देंगे

1965 खत्म होते होते देश के सियासी गलियारों में ये अटकलें आम थीं कि प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री अपने मंत्रिमंडल से इंदिरा गांधी को हटा सकते हैं. इंदिरा तब इस सरकार में सूचना और प्रसारण मंत्री थे. ये कहा जाने लगा था कि जनवरी 1966 में जब शास्त्री ताशकंद से लौटेंगे तो मंत्रिमंडल में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है शायद इसमें नेहरू की बेटी से मंत्री पद लेकर उन्हें कोई और जिम्मेदारी दे दी जाए. दोनों के बीच रिश्तों के असहज होने की खबरें भी फैलने लगीं थीं.

शास्त्री के प्रधानमंत्री काल को नजदीक से देखने वाले दो जाने माने पत्रकारों ने अपनी किताबों में इस बारे में विस्तार से लिखा है. हिंदुस्तान टाइम्स के संपादक रहे दुर्गादास ने अपनी किताब “कर्जन टू नेहरू” में लिखा.

“जब लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने इंदिरा को मंत्रिमंडल में शामिल होने के लिए तैयार कर लिया.  शास्त्री ने नेहरू की याद में और उनके प्रति आदर प्रगट करने के लिए ऐसा किया था.”

तो इंदिरा को शास्त्री से मिलने नहीं दिया गया
किताब लिखती है, “कुछ ही समय में इंदिरा के प्रति शास्त्री का रुख बदल गया. इंदिरा को उम्मीद थी कि राजकीय मामलों में शास्त्री उनकी राय लेंगे. लेकिन शास्त्री उनकी ओर से उदासीन हो गए. वास्तव में 1965 में कॉमनवेल्थ प्रधानमंत्रियों के सम्मेलन से कुछ पहले जब शास्त्री बीमार पड़े और इंदिरा उनसे मिलने गईं तो और लोगों की तरह उन्हें भी शास्त्री से मिलने नहीं दिया गया.”

किताब के अनुसार, “शास्त्री से इंदिरा की मुलाकातें इतनी कम हो पाती थीं कि इंदिरा को ये लगने लगा था कि शास्त्री जानबूझकर उनसे कतराते थे.” 

लाल बहादुर शास्त्री ने नेहरू के निधन के बाद प्रधानमंत्री बनने पर इंदिरा गांधी को मंत्री तो बनाया लेकिन जल्दी ही दोनों के रिश्तों में एक ठंडापन आने लगा. (news18 gfx)

ये कहा जाने लगा था कि इंदिरा को कोई और जिम्मेदारी मिलेगी
दुर्गादास ने इस किताब में ये बात खुद की शास्त्री से हुई बातचीत के हवाले से कही कि शास्त्री ने स्पष्ट रूप में मुझसे ये स्वीकार किया कि उनमें इंदिरा के प्रति हीनभाव पैदा हो गया था. उनका खयाल था कि अपनी सशक्त सार्वजनिक प्रतिमा वह केवल तभी बना सकते थे जब वह प्रकट रूप से ये स्थापित कर दें कि वह इंदिरा पर निर्भर नहीं हैं. शास्त्री के ताशकंद जाने से पहले जानकार लोगों के बीच ये बात दबे तौर पर कही जा रही थी कि इंदिरा गांधी को शायद मंत्रिमंडल से हटाकर इंग्लैंड में हाईकमिश्नर के पद पर नियुक्त किया जाए.

तब शास्त्री को इंदिरा से मिलने के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता था
हालांकि किताब ने ये उल्लेख भी किया, एक जमाना वो भी था जब नेहरू जिंदा थे और उन्होंने केंद्रीय मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों से कह दिया कि वह अपनी समस्याएं इंदिरा द्वारा उन तक पहुंचा दिया करें. ये बात कांग्रेस कुछ नेताओं को बहुत खराब भी लगती थीं.

इस दौरान शास्त्री कभी कभी घंटे भर के लिए इंदिरा से मिलने के लिए प्रतीक्षा करते रहते थे. इंदिरा के बुलावे पर फौरन पहुंच जाते थे और जो भी बात उन्हें नेहरू से मनवानी होती थी, उसे इंदिरा द्वारा उन तक पहुंचवा देते थे.

वर्ष 1965 के अंत तक इंदिरा गांधी को लगने लगा था कि उन्हें शास्त्री मंत्रिमंडल से निकाला जा सकता है. उन्होंने तब इंग्लैंड में बसने की तैयारी शुरू कर दी थी. (news18 gfx)

शास्त्री ने कहा – तो इंदिरा देश की प्रधानमंत्री होंगी
जाने माने पत्रकार कुलदीप नैयर ने अपनी किताब “बियांड द लाइंस – एन आटोबॉयोग्राफी” में लिखा, प्रधानमंत्री बनने के कुछ ही दिन बाद शास्त्री को दिल का हल्का दौरा पड़ा. उनका ये दूसरा दौरा था. बहुत ज्यादा मानसिक दबाव के कारण डॉक्टरों ने प्रधानमंत्री को आराम करने की सलाह दी. मैं उन थोड़े से लोगों में था, जो तबीयत बिगडने के कुछ ही दिनों बाद उनसे मिले थे. वह थोड़े कुम्हलाए से लग रहे थे लेकिन कुल मिलाकर ठीक ठाक थे.

मैने शास्त्री से कहा कि अमेरिकी पत्रकार वेलेस हेंजन ने 1963 में एक  किताब लिखी थी- “आफ्टर नेहरू हू”. भगवान उन्हें लंबी उम्र दे लेकिन अगर उन्हें कुछ हो गया तो आफ्टर शास्त्री हू? शास्त्री सोच में डूब गए और कुछ देर बाद बोले, अगर मैं एक दो साल में चला गया तो इंदिरा गांधी तुम्हारी प्रधानमंत्री होंगी लेकिन अगर मैं तीन-चार तक जिंदा रहा तो वाईबी चव्हाण प्रधानमंत्री बनेंगे.

इंदिरा का नाम सुझाने पर क्या थी शास्त्री की प्रतिक्रिया
शास्त्री ने जानना चाहा कि मेरी नजर में सबसे अच्छा विदेश मंत्री कौन हो सकता था. ये विभाग उन्हीं के पास था. मैने इंदिरा गांधी का नाम सुझाया. शास्त्री बोले, नैयर साहब, आप राजनीति नहीं समझते. वो प्रधानमंत्री बनना चाहती हैं. विदेश मंत्रालय की कमान मिलने से उनका महत्व बहुत बढ़ जाएगा.

टीटीके का इस्तीफा ले लिया गया
इस किताब में आगे फिर ये जिक्र किया गया कि किस तरह ताशकंद जाने से पहले शास्त्री ने वित्त मंत्री टीटी कृष्णामचारी को इस्तीफा देने के लिए लिखा. किताब के अनुसार, शास्त्री को संदेह था कि टीटीके उनकी पीठ पीछे उनकी हंसी उड़ाते थे. इससे भी चिंताजनक बात ये थी कि टीटीके ने इंदिरा गांधी के साथ मिलकर उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया था.

इंदिरा को लगने लगा उनका भी पत्ता कट सकता है
वैसे ये पहली बार नहीं था कि जब टीटी कृष्णामचारी को कैबिनेट छोड़ना पड़ा हो. कुलदीप नैयर ने किताब में लिखा, टीटीके के इस्तीफ के बाद इंदिरा गांधी को लगने लगा कि अब उनके दिन भी पूरे हो गए थे. किसी भी दिन उनका भी पत्ता कट सकता था. उनके काफी नजदीक माने जाने वाले दिनेश सिंह के अनुसार वह इंग्लैंड में बसने की सोचने लगी थीं. उन्होंने वहां के रहन-सहन के खर्चे और नेहरू की किताबों की रायल्टी के बारे में पता करवाया था. इंदिरा को अहसास हो चुका था कि लड़ाई के बाद शास्त्री की ताकत बहुत बढ़ गई थी. हर जगह देश में उन्हें हीरो के रूप में देखा जाने लगा था.

शास्त्री की अपनी अंतरंग गोष्ठी थी
दुर्गादास की किताब प्रधानमंत्री के तौर पर लाल बहादुर शास्त्री की कार्यशैली के बारे में कहती है, शास्त्री की भी अपनी एक अंतरंग गोष्ठी थी लेकिन अपने निर्णय वह खुद ही लेते थे. वह समस्याओं पर काफी देर तक विचार करते थे. काफी समझबूझ कर फैसले लेते थे. वह केवल उन्हीं समस्याओं की ओर ध्यान देते थे, जिन्हें फौरन हल करना जरूरी होता था बाकि को टाल देते थे. उनका अंग्रेजी ज्ञान उतना अच्छा नहीं था लेकिन उचित शब्द प्रयोग करने की प्रतिभा उनमें थी.

सचिवालय द्वारा भेजे गए ऐसे ड्राफ्टों को वह स्वीकार नहीं करते थे, जिसमें घिसे पिटे वाक्य या शब्द इस्तेमाल किए जाते थे. ऐसे ड्राफ्टों में वह संशोधन करते थे. उन्हें स्वाभाविक तौर पर ये इस बात का ज्ञान था कि लोग क्या चाहते हैं और वो ये जानते थे कि उनकी ये आशाएं कैसे पूरी की जाएं.

Tags: Indira Gandhi, Lal Bahadur Shastri, Prime minister

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Author: Jagran Times

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