News18 Open Mic: मिलिए चित्रसेन साहू से, जिन्होंने पहाड़ की चोटियों पर लगाया नारा ‘छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया’

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छत्तीसगढ़ के भाटापारा रेलवे स्टेशन पर एक ट्रेन हादसे में चित्रसेन साहू ने अपने दोनों पैर गंवा दिए. जिंदगी उदास हो गई. क्योंकि ट्रेन एक्सीडेंट ने चित्रसेन को जीवनभर का दर्द दिया था. उनके दोनों पैर इस हादसे में कट गए. न्यूज 18 के मंच ओपन माइक में इस घटना को याद करते हुए पर्वतारोही चित्रसेन साहू ने बताया कि वह पल उन्हें हमेशा याद रहेगा. उन्होंने बताया कि इसके पहले भी जीवन में संघर्ष रहा. लेकिन बड़ा संघर्ष यह रहा कि उस ट्रेन हादसे के समय मैं होश में था. उन्होंने बताया कि एंबुलेंस से जब मुझे ले जाया जा रहा था, उस दौरान एक और एक्सीडेंट हुआ.

महीनेभर से ज्यादा मैं अस्पताल में रहा, लेकिन अच्छी बात यह रही कि मेरा परिवार और मेरे दोस्त हमेशा साथ रहे. यह मेरे लिए सबसे अच्छी बात रही. न्यूज18 के कार्यक्रम के दौरान चित्रसेन साहू के परिजनों ने कहा कि वह बड़ा तकलीफदेह वक्त था. कार्यक्रम में मौजूद चित्रसेन के माता-पिता की आंखें नम हो गईं. उनकी मां ने कहा कि बेटे ने हिम्मत दिखाई, उसने हौसला नहीं टूटने दिया, लेकिन हादसे को याद कर आज भी रूह कांप जाती है.

पर्वतारोही कैसे बने चित्रसेन साहू
चित्रसेन साहू ने बताया कि मैं हमेशा से खेल में जाना चाहता था. लेकिन हादसे के बाद इसकी उम्मीदें थोड़ी धूमिल हुईं. लेकिन फिर भी मैं आगे बढ़ा. मैं माउंटेनियरिंग की नहीं सोचता था. लेकिन स्पोर्ट्सपर्सन था. इसलिए कुछ दिनों की मेहनत के बाद मैं व्हीलचेयर बॉस्केटबॉल टीम में आ गया. फिर दूसरे खेलों में भी मैंने शिरकत की.

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जब मम्मी को पहली बार पता चला
चित्रसेन ने न्यूज 18 के मंच पर बताया कि बेटे के साथ हादसे की बात माता-पिता के लिए सबसे कष्टकर होती है. मैंने हादसे के बारे में मम्मी को नहीं बताया था. 27-28 दिनों तक उन्हें नहीं मालूम था. लेकिन जिस दिन मैं व्हील चेयर पर शिफ्ट होने वाला था, उस दिन मम्मी आ गईं और उन्हें मेरे पैर न होने के बारे में पता चल गया.

कभी सोचा नहीं था पहाड़ पर चढूंगा
माउंट किलिमंजारो पर मैंने सबसे पहले चढ़ाई की थी. मैंने कभी ऐसा सोचा नहीं था कि पहाड़ पर चढूंगा. हादसे के बाद मेरे लिए यह चुनौती बन गई. लेकिन पहले व्हीलचेयर बास्केटबॉल और पैरास्वीमिंग टीम में आने के बाद हौसला बढ़ा. व्हीलचेयर बास्केटबॉल की टीम बनाई और दो-तीन साल चलाया. इसके बाद माउंटेनियरिंग में आया. अब तो हमारी टीम में ऐसे कई लोग हैं. 14 साल की बच्ची जिसके पैर नहीं है, वह भी हमारी टीम में है. ट्रांसजेंडर भी हमारी टीम मैं हैं, और मेरे लिए यह अनोखा अनुभव है. एवरेस्ट मिशन पर अपनी टीम के साथ जाने से पहले हमारे सामने बड़ा चैलेंज होता है. आप जब अकेले जाते हैं तो चुनौतियां अलग होती हैं. लेकिन टीम के साथ जिम्मेदारी बढ़ जाती है. उस समय मानसिक और शारीरिक, दोनों ही तरह से आपको मजबूत होना होता है.

आपके साथ आर्टिफिशियल-लेग भी होता है, उसका वजन भी उठाना होता है. बर्फीले पहाड़, मौसम और माहौल को देखते हुए चुनौतियां काफी बढ़ जाती हैं. एडवेंचर स्पोर्ट्स अब मेरी लाइफ का हिस्सा बन गया है. उम्मीद करता हूं कि दुनिया के सर्वोच्च शिखर पर आप लोग हमें देख पाएंगे, यही आशा है. मैं सेना में जाना चाहता था, लेकिन ऐसा नहीं हो सका. इसलिए जब आप किसी जगह पर तिरंगा फहराते हैं तो बड़ी अच्छी फीलिंग आती है.

Tags: Raipur news

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Author: Up Head Line

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