
हाइलाइट्स
डॉ हेडगेवार ने बचपन में स्कूल में अंग्रेज निरीक्षक के सामने वंदेमातरम गाया तो स्कूल से निकाल दिए गए
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना भी उन्होंने आजादी की लड़ाई के उद्देश्य से की
उनकी आजादी ऐसी आजादी थी, जिसमें देश आजाद हो और सही मायनों में जागरण हो
कई बार कोई शख्स अपने एक काम से इतना ज्यादा पहचाना जाता है कि उसकी पूरा व्यक्तित्व और इतिहास उसी में छिप जाता है. डॉ केशव बलिराम हेडगेवार ऐसे ही शख्स हैं. अगर डॉ हेडगेवार को सही तरह से जानने के लिए उन्हें अलग तरह से देखना होगा, खासकर उनके पूरे काम और जज्बे को. आमतौर पर लोग उन्हें राष्ट्रीय स्वयं सेवक के संस्थापक के तौर पर जानने के बाद रुक से जाते हैं. हालांकि ये उनका पूरा परिचय नहीं है. वह तो अपने दौर के जोर शोर से आजादी की लड़ाई में योगदान देने वाले कार्यकर्ता भी थे, ऐसी शख्सियत जिसने देश की आजादी और सेवा को ही अपना सब कुछ समझा था.
बचपन से देशभक्ति की भावना
हेडगेवार का जन्म नागपुर में तेलुगु बोलने वाले देशस्थ ऋग्वेदी सामान्य ब्राह्मण परिवार में एक अप्रैल 1889 को हुआ था. उनके पिता का नाम बलिराम पंत हेडगेवार और माता का नाम रेवतीबाई था. बचपन की पढ़ाई नील सिटी हाई स्कूल नागपुर में की थी यहां उन्होंने एक अंग्रेजी अधिकारी के निरीक्षण के दौरान वंदेमातरम गीत गाया, जिस पर उन्हें स्कूल से निष्कासित कर दिया गया.
डॉक्टर बनने के बाद बने क्रांतिकारी
उन्होंने अपनी पढ़ाई यवतमाल और फिर पुणे में की. मैट्रिक के बाद उन्होंने कलकत्ता में डॉक्टरी की पढ़ाई की. कम लोग जानते हैं कि हेडगेवार एक क्रांतिकारी भी रहे थे. उनके बारे में चर्चा होती है तो यह दलील दी जाती है कि वे कांग्रेस में काफी समय तक पूरी तरह से समर्पित भाव से सक्रिय थे. लेकिन यह भी बहुत सीमित जानकारी है. दरअसल डॉक्टरी की शिक्षा पूरी करने के बाद वह बंगाल की अनुशीलन समिति में भी शामिल हुए थे.
क्रांतिकारी गतिविधियों से मोहभंग
उन्हें देश भर में क्रांतिकारी सामग्री और शस्त्र आदि के वितरण का जिम्मा सौंपा गया था. कहा जाता है कि अनुशीलन समिति के अनुभवों से ही उन्होंने संगठनात्मक क्षमता सीखी थी. लेकिन अनुशीलन समिति से जल्दी ही वे दूर हो गए, क्योंकि उन्हें तब महसूस हुआ कि क्रांतिकारी गतिविधियों के जरिए लोंगो को जोड़ना बहुत मुश्किल है. इसीलिए उन्होंने कांग्रेस से जुड़ने का फैसला किया, ताकि लोगों को देश की आजादी के लिए जोड़ सकें.
कांग्रेस में सक्रियता
डॉ हेडगेवार 1916 के कानपुर अधिवेशन में शामिल हुए थे. वे समकालीन हिंदू नेताओं के साथ हिंदू बाल गंगाधर तिलक,बंकिम चंद्र चटर्जी जैसे नेताओं से भी बहुत प्रभावित हुए. कांग्रेस में शामिल होने के बाद उन्होंने युवाओं को एकजुट करने का काम किया. 1920 में नागपुर के राष्ट्रीय अधिवेशन में कांग्रेस में उन्होंने पहली बार पूर्ण स्वतंत्रता को लक्ष्य बनाने के बारे में प्रस्ताव पेश किया, जो तब पारित नहीं हुआ.
पूर्ण स्वतंत्रता के लिए प्रस्ताव
डॉ हेडगेवार का नाम उन लोगों में भी शामिल है जो कांग्रेस में रहते हुए देश के लिए जेल गए थे. 1921 में उन्होंने भी गांधी जी के असहयोग आंदोलन में भाग लिया. अन्य नेताओं की तरह अंग्रेजों ने उन्हें भी गिरफ्तार कर जेल में डाला. वह करीब एक साल तक जेल में रहे थे. इस दौरान यह साफ था कि उनका लक्ष्य देश को आजादी दिलाना ही है. हालांकि वह कांग्रेस के नेताओं का आंख मूंदकर अनुसरण करने वाले नहीं थे.
कांग्रेस से मोहभंग
जल्दी ही देश के दूसरे लोगों की तरह उनका भी कांग्रस से मोहभंग हो गया. असहयोग आंदोलन वापस ले लिया गया. उन्होंने देखा कि किस तरह से खिलाफत आंदोलन को तवज्जो दी गई जबकि देश के हिंदुओं के जागरण की जरूरत है. ऐसे में उन्हें इस नतीजे पर पहुंचने में देर नहीं लगी कि उनके और कांग्रेस के रास्ते अलग अलग हैं.
हिंदुओं के उत्थान की ओर
गौर किया जाए तो असहयोग आंदोलन के खत्म होने के बाद का समय ही देश के लोगों का कांग्रेस दूर जाने का समय था. युवा क्रांतिकारी बनने की राह पर थे. ऐसे में डॉ हेडगेवार ने हिंदुओं के जागरण का रास्ता अपनाने का फैसला किया. उनका कहना था कि सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत ही भारत की राष्ट्रीयता की पहचान होनी चाहिए.
अपने तरीके से आजादी की लड़ाई लड़ी
1925 को उन्होंने दशहरे के दिन राष्ट्रीय स्वयं सेवक की स्थापना की जिसका लक्ष्य हिंदु समुदाय का सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पुनरुत्थान था जिसके जरिए एकीकृत भारत की स्वतंत्रता को हासिल किया जा सकता है. जब 1929 को कांग्रस ने लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वतंत्रता का लक्ष्य अपनाया तो डॉ हेडगेवार की खुशी का ठिकाना नहीं रहा.26 जनवरी 1930 को काग्रेस की तरह संघ ने भी स्वतंत्रता दिवस मनाया था. इसके बाद भी डॉ हेडगेवार और उनके संघ ने अपने तरीकों से स्वतंत्रता आंदोलन और हिदुंओं के जागरण का अपना काम और समर्पण जारी रखा.
हिंदुओं के लिए मंच
1922 और उसके बाद के समय जब देश के लोगों को गांधी जी से निराशा मिली तो देश में साम्प्रदायिकता ने सिर उठाना शुरू किया. कई जगह दंगे हुए जिसमें हिंदू बड़ी संख्या में पीड़ित थे. ऐसे में डॉ हेडगेवार ने हिदुओं के लिए एक मंच के निर्माण की जरूरत महसूस की. यहीं से स्वयं सेवक संघ की स्थापना के बीज पड़े, जिसमें डॉ हेडगेवार ने साम्प्रदायिकता का शिकार होने की जगह हिंदुओं के आत्म उत्थान और जागरण पर ज्यादा ध्यान दिया.
देश को चैतन्य करने के लिए संघ को कैसे आगे बढ़ाया
हेडगेवार का काम हिंदुओं को केवल संघ से जोड़ना ही नहीं था बल्कि अंग्रेजों के अत्याचारों के खिलाफ भी माहौल तैयार करना और उसका मुकाबला करना था.
अंग्रेजों का रुक उन्हें लेकर कैसा रहता था
उन पर अंग्रेजों की पूरी नजर रहती थी. 1930 को जंगल सत्याग्रह में भाग लेते हुए उन्होंने गिरफ्तारी दी. इसमें उन्हें 9 महीने की सजा भी हुई.
क्या उन्होंने आगे कांग्रेस के आंदोलनों का समर्थन दिया
कांग्रेस से मतभेद होने के बाद भी उन्होंने कई मौकों पर स्वतंत्रता आंदोलन में कांग्रेस का समर्थन किया. उनके स्वयंसेवकों पर कोई बंधन नहीं था. हेडगेवार देश में जागृति के लिए हमेशा लगे रहे.
हेडगेवार के निधन के बाद संघ का रास्ता क्या रहा
संघ ने देशसेवा और देशप्रेम का वही रास्ता अपनाया जो हेडगेवार उन्हें विरासत में दे गए. 1962 और 1965 के युद्ध में संघ ने बड़ी भूमिका निभाई थी. इसीलिए पंडित जवाहरलाल नेहरू को 1963 में 26 जनवरी की परेड में संघ को शामिल होने का न्योता दिया. 1965 में सेना की मदद के लिए देशभर से संघ के स्वयंसेवक आगे आए. पाकिस्तान के खिलाफ इस युद्ध में लालबहादुर शास्त्री ने संघ को याद किया.
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Tags: History of India, India, Religion, Research
FIRST PUBLISHED : June 10, 2023, 17:23 IST








