
मनमोहन सेजू/ बाड़मेर. तेजी से बदलते परिवेश, परिधान और परम्पराओ के बीच अगर कुछ नहींबदला है तो वह है चूड़ा. भारत- पाकिस्तान सीमा पर बसे बाड़मेर ही नहीं राज्य के अधिकांश जगहों पर चूड़े के बिना कोई भी शादी पूरी नही होती है. आज भी वर पक्ष की तरफ से वधु के लिए सबसे पहला उपहार चूड़ा होता है. जिसे सात फेरे लेने के बाद दुल्हन सबसे पहले पहनती है.
चूड़ा हर सुहागिन का सबसे महत्वपूर्ण श्रृंगार है. शादी के बाद महिलाएं बड़े शौक के साथइसे पहनती है. सात पीढ़ियों से चूड़े का व्यवसाय कर रहे भगवानदास बताते है कि उनकी शुरुआती दुकान हैदराबाद, पाकिस्तान में हुआ करती थी. साल 1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद वह सपरिवार बाड़मेर आ गए और उसके बाद उनके पिता आसनदास फिर इनके भाई प्रताप कुमार और देवन दास ने इस व्यवसाय को आगे बढ़ाया है.
भगवान दास बताते है कि 15 से 20 बंगड़ियो वाले चूड़े पर कभी हाथी दाँत और सोने की परत लगा करती थी. राजस्थान के राजपूत, चारण और राजपुरोहित समुदाय में आज भी कुछ लोग सोने की परत वाले चूड़े को खरीदते है. ऐसा नहीं है कि चूड़े की अहमियत केवल हिन्दू सम्प्रदाय में होती है बल्कि सिंधी मुसलमान, मायला कुम्हार, माग्निहार सहित कई मुस्लिम समुदाय में भी चूड़ा जरूरी होता है. वह बताते है कि उनकी दुकान पर 400 रुपये से लेकर करीब 2 हजार रुपये तक के चूड़े उपलब्ध है. हालांकि अभी बाड़मेर में चूड़े पर सोने व हीरे की परत नही चढाई जाती है.
भगवान दास बताते है कि बाड़मेर में आज भी शादी की सीजन में उनके दुकान पर पैर रखने की जगह नहीं रहती है. महिलाओं के लिए सुहाग का प्रतीक होने के साथ-साथ श्रंगार का प्रतीक है. कभी हाथी दांत और लाख के चूड़े आज प्लास्टिक में तब्दील हो गया है. 15 से 20 बंगडिया 5 से 10 तक आ गई,लेकिन चूड़े का चलन आज भी हर शादी का अहम हिस्सा होता है.
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FIRST PUBLISHED : June 09, 2023, 17:59 IST








