
Kazi Nazrul Islam Krishna Bhajansः काज़ी नज़रुल सांप्रदायिक सद्भाव की मिसाल थे. उनकी रचनाओं चाहें वे कविता हों, गीत हों, उपन्यास या फिर कहानियों में मानवता, समानता और धार्मिक भक्ति के संदेश से ओत-प्रोत हैं. नजरुल ने लगभग 3000 गानों की रचना की. इनमें से अधिकांश गीतों में खुद उन्होंने ही संगीत और स्वर दिया है. क़ाज़ी नज़रुल इस्लाम साब के गीतों को ‘नजरुल संगीत’ या “नजरुल गीति” नाम से जाना जाता है.
पश्चिम बंगाल के चुरुलिया गांव में 24 मई, 1899 को काज़ी नज़रुल इस्लाम का जन्म हुआ था. इनके पिता का नाम फ़कीर अहमद एक इमाम और स्थानीय मस्जिद के कार्यवाहक थे. काज़ी नज़रुल की शुरुआती तालीम मस्जिद द्वारा चलाये जा रहे मदरसे में हुई थी. नज़रुल पर उनके चाचा फज़ले करीम का बहुत असर पड़ा. फज़ले करीम की एक संगीत मंडली थी जो जगह-जगह घूमती हुई गीत-संगीत का प्रदर्शन करती थी. काज़ी नज़रुल भी अपने चाचा की इस मंडली में शामिल हो गए और गाना गाने लगे. उन्हें मंडली के लिए गीत भी लिखे. यह मंडली पूर्वी भारत में छोटी-छोटी नृत्य नाटिकाएं करती थीं जो स्थानीय लोककथाओं खासकर हिंदू धार्मिक ग्रंथों पर आधारित होती थीं. मंडली के साथ विचरण करते हुए काज़ी नज़रुल ने संस्कृत और बांग्ला भाषा का भी ज्ञान लिया और रामायण-महाभारत का अध्ययन किया. वे हिंदू पुराणों से बहुत प्रभावित हुए. उन्होंने अपनी मंडली के लिए ‘युधिष्ठिर गीत’, ‘दाता कर्ण’ और ‘शकुनि का वध’ जैसे नाटक लिखे.
इस तरह काज़ी नज़रुल इस्लाम धीरे-धीरे कृष्ण भक्ति की तरफ आकर्षित होते चले गए. उन्होंने कृष्ण के बहुत से भजनों की रचना की. कृष्ण पर लिखे उनके भजन बहुत मशहूर हुए. आइए, पढ़ते हैं काज़ी नज़रुल इस्लाम के कृष्ण भजन-
कृष्ण कन्हइया आओ मन में मोहन मुरली बजाओ।
कान्ति अनुपम नील पद्मसम सुन्दर रूप दिखाओ।
सुनाओ सुमधुर नूपुर गुंजन
“राधा, राधा” करि फिर फिर वन वन
प्रेम-कुंज में फूलसेज पर मोहन रास रचाओ;
मोहन मुरली बजाओ।
राधा नाम लिखे अंग अंग में,
वृन्दावन में फिरो गोपी-संग में,
पहरो गले वनफूल की माला प्रेम का गीत सुनाओ,
मोहन मुरली बजाओ।
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जयतू श्रीकृष्ण श्रीकृष्ण मुरारी शंखचक्र गदा पद्मधारी।
गोपाल गोविन्द मुकुन्द नारायण परमेश्वर प्रभू विश्व-बिहारी।।
सूर नर योगी ऋषि वही नाम गावे,
संसार दुख शोक सब भूल जावे,
ब्रह्मा महेश्वर आनन्द पावे गावत अनन्त ग्रह-नभचारी।।
जनम लेके सब आया ये धराधाम
रोते रोते मैं प्रथम लिया वो नाम।
जाउंगा छोड़ मैं इस संसार को सुनकर कानों में भयहारी।।
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जगजन मोहन संकटहारी
कृष्णमुरारी श्रीकृष्णमुरारी।
राम रचावत श्यामबिहारी
परम योगी प्रभू भवभय-हारी।।
गोपी-जन-रंजन ब्रज-भयहारी,
पुरुषोत्तम प्रभु गोलक-चारी।।
बंसी बजावत बन बन-चारी
त्रिभुवन-पालक भक्त-भिखारी,
राधाकान्त हरि शिखि-पाखाधारी
कमलापति जय गोपी मनहारी।।
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FIRST PUBLISHED : June 03, 2023, 17:14 IST








